भारत के औषधि उद्योग ने उदारीकरण से पैदा हुए अवसरों का उपयोग करते हुए सक्रिय फार्मास्यूटिकल घटकों (एपीआई), फॉर्म्युलेशन्स, जेनेरिक्स और बायोसिमिलर्स में पूरी दुनिया से होड़ करना शुरू कर दिया। उद्योग का अगला बड़ा कदम नवाचार की ओर होना चाहिए। यह कहना है डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज के चेयरमैन सतीश रेड्डी का। सोहिनी दास के साथ वीडियो साक्षात्कार में रेड्डी ने कंपनी की शुरुआती अंतरराष्ट्रीय महत्त्वाकांक्षाओं, वर्ष 1991 के सुधारों के प्रभाव, चीन के हाथों एपीआई की बढ़त गंवाने और दवा खोज को समर्थन देने के लिए आवश्यक नीतिगत ढांचे पर विस्तृत चर्चा की। प्रमुख अंश:
वर्ष 1991 के सुधारों को लेकर आपका अनुभव क्या था?
मैं दिसंबर 1990 में अपनी शिक्षा पूरी करके अमेरिका से लौटा था। हालात तेजी से बदले। 1993 के आरंभ में शोध एवं विकास की एक टीम जो उस समय कंपनी की जान हुआ करती थी, उसने अचानक काम छोड़ दिया। मेरे पिता डॉ. अंजी रेड्डी ने मुझे तुरंत हालात ठीक करने का काम सौंप दिया। इस तरह मैं एक सक्रिय परिचालन भूमिका में आ गया।
सामान्य अध्ययन में अपनी रुचि के चलते मैं सुधारों से परिचित था। इसकी एक वजह यह भी थी कि मेरे पिता दफ्तर और घर में कारोबार की बातें किया करते थे। मैंने सुधारों के पहले कड़े नियंत्रण वाले माहौल में कारोबार करने की दिक्कतों के बारे में सुना था। 1992 से मैं कंपनी को एक अलग दिशा में ले जाने की यात्रा का हिस्सा बन गया क्योंकि नए अवसर सामने आने लगे थे।
क्या डॉ. रेड्डीज ने उदारीकरण से बने अवसरों को तत्काल पहचान लिया?
कंपनी ने 1984 में एपीआई के उत्पादक के रूप में काम शुरू किया और उसके बाद दवा निर्माण में शामिल हुई। 1990 में भी यानी सुधारों के ठीक पहले राजस्व और मुनाफे का बड़ा हिस्सा एपीआई से आता था। हम तब भी निर्यात कर रहे थे। 1986 में हमारी कंपनी भारत में सूचीबद्ध हुई और मुझे याद है कि 1987 में हमें अमेरिकी खाद्य एंव औषधि प्रशासन यानी यूएसएफडीए से संयंत्र के लिए पहली मंजूरी मिली।
उदारीकरण से पहले हम पेटेंट समाप्ति वाले एपीआई अमेरिका को निर्यात कर रहे थे। हमने आइबुप्रोफेन और मेथिलडोपा जैसे उत्पादों के लिए बेहतर, उच्च-गुणवत्ता वाली प्रक्रियाएं विकसित कीं। आइबुप्रोफेन में हमने इटली और जापान के आपूर्तिकर्ताओं को पीछे छोड़ दिया और अमेरिका में तीसरे सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता बन गए। उदारीकरण ने वह महत्त्वाकांक्षा पैदा नहीं की। उसने जो किया, वह था फॉर्म्युलेशन्स और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कहीं बड़ा अवसर खोलना। मूल दवा खोज हमारी वैज्ञानिक क्षमताओं का स्वाभाविक विस्तार था, जबकि ट्रिप्स समझौता और भारत के पेटेंट व्यवस्था में होने वाले बदलाव ने इसे और बढ़ावा दिया।
क्या पूंजी तक बेहतर पहुंच ने कंपनी की शोध संबंधी महत्त्वाकांक्षा को गति दी?
हमने भारतीय बाजार से पहले ही पैसे जुटा लिए थे, लेकिन उदारीकरण ने अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजार से पैसे जुटाने में मदद की। 1990 के दशक में हमने लक्जमबर्ग स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध वैश्विक डिपॉजिटरी रिसीट इश्यू से 4.8 करोड़ डॉलर की राशि जुटाई।
हमने 1992 के आसपास अपना दवा खोज कार्यक्रम शुरू कर दिया था। यह एक ऐसी कंपनी के लिए जोखिम भरा दांव था जिसका मुनाफा ज्यादातर एपीआई से आता था। डिस्कवरी के लिए काफी पूंजी की जरूरत थी और इससे तत्काल रिटर्न नहीं मिलना था। नाकामी की आशंका भी अधिक थी। डॉ. रेड्डीज बिना कर्ज के बोझ तले दबे उस महत्त्वाकांक्षा को आगे बढ़ाने के लिए पूंजी चाहती थी। अंतरराष्ट्रीय संस्थागत निवेशकों ने भी ऊंचे मानकों की अपेक्षा की थी। उसके चलते तिमाही प्रकटीकरण, अंकेक्षण मानक और संचालन सहित हमारे तमाम व्यवहार बदल गए। औद्योगिक लाइसेंसिंग समाप्त कर दी गई थी। पहले हर क्षमता विस्तार के लिए अनुमति लेनी पड़ती थी जिसे सरकार सीमित कर सकती थी या अस्वीकार कर सकती थी। आयात शुल्क कम कर दिए गए, जिससे उन्नत उपकरण हासिल करना आसान हो गया। विदेशी मुद्रा और यात्रा पर नियंत्रण भी ढीले कर दिए गए, जिससे हमें तकनीक, सलाहकार, साझेदारियां और विशेषज्ञ प्रतिभा तक अधिक आसानी से पहुंच मिल सकी।
उदारीकरण ने डॉ. रेड्डीज को वैश्विक कारोबारी बनने में कैसे मदद की?
एपीआई कारोबार ने पहले ही हमें सिखाया था कि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कैसे की जाती है। आइबुप्रोफेन जैसे उत्पाद के मामले में रासायनिक कौशल ने हमें कम लागत वाली प्रक्रिया दी लेकिन केवल लागत पर्याप्त नहीं थी। हमें यूएसएफडीए मानकों का भी पालन करना था, संयंत्रों का निरीक्षण करवाना था और नियामकीय प्रक्रिया को भी समझना था।
हमने 1991 से पहले ही ये क्षमताएं हासिल कर ली थीं। हमने फिर उन अनुभवों को फॉर्म्युलेशन्स में लागू किया। अमेरिका में अवसर आंशिक रूप से हैच-वैक्समैन अधिनियम से पैदा हुआ लेकिन उदारीकरण ने उस निवेश को संभव बनाया जिसकी आवश्यकता इसे आगे बढ़ाने के लिए थी।
अमेरिकी बाजार के लिए बचुपल्ली संयंत्र पर काम लगभग 1996 में शुरू हुआ। इसमें आयातित उपकरण, विशेषज्ञता, पैमाना और पूंजी की जरूरत थी। पहली व्यावसायिक बिक्री 2001 में हुई। जीडीआर से प्राप्त धन ने इन निवेशों और अनुसंधान को वित्तपोषित करने में मदद की। हमने अपनी एपीआई क्षमताओं-गुणवत्ता, लागत, दक्षता और प्रक्रिया नवाचार को फॉर्म्युलेशन्स में स्थानांतरित किया। पेटेंट चुनौतियों ने बौद्धिक संपदा कौशल की भी मांग की। डॉ. रेड्डीज ने फ्लुओक्सेटीन 40 एमजी के साथ 180 दिन की अपनी पहली विशिष्टता हासिल की। हमने उत्पाद-दर-उत्पाद पैमाना बनाया न केवल अमेरिका में बल्कि यूरोप, लैटिन अमेरिका और अन्य बाजारों में भी। आज हम लगभग 80 देशों को आपूर्ति करते हैं क्योंकि उस दौर में नींव रखी गई थी।
कंपनी ने विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में विस्तार कैसे किया?
हमें हर बाजार के लिए अलग दृष्टिकोण अपनाना पड़ा। उस समय यूरोप एक एकीकृत बाजार नहीं था। हर देश की अपनी नियामक प्रणाली थी और अलग-अलग फाइलिंग करनी पड़ती थी। यूके ने जेनेरिक दवाओं की ओर तेजी से कदम बढ़ाया जबकि फ्रांस, स्पेन और इटली बाद में आए। रूस पूरी तरह अलग ब्रांडेड जेनेरिक्स का बाजार था। हम उन शुरुआती कंपनियों में से थे जिन्होंने वहां महत्त्वपूर्ण उपस्थिति स्थापित की। सोवियत संघ के विभाजन ने अवसर पैदा किया। सरकारी खरीद महत्वपूर्ण थी और हमने सही समय पर अपने उत्पाद पंजीकृत किए। अंतरराष्ट्रीय विस्तार के लिए कोई एकल सूत्र नहीं था।
भारत एपीआई के लिए चीन पर कैसे निर्भर हुआ?
चीन के उभार के पहले भारत एपीआई उत्पादन में दबदबा रखता था। हम नए उत्पादों, पेटेंट समाप्त हो चुके उत्पादों और उन देशों को उत्पाद आपूर्ति करने में अग्रणी थे जो उस समय पेटेंट को मान्य नहीं करते थे। डॉ. रेड्डीज शीर्ष एपीआई कंपनियों में से एक थी। चीन का उभार राज्य समर्थित था। तकनीक तक पहुंच थी लेकिन चीन ने इतने बड़े पैमाने पर संयंत्र स्थापित किए कि भारतीय उत्पादक कई उत्पाद श्रेणियों में बाजार से बाहर हो गए।
हम कभी सिप्रोफ्लॉक्सासिन के सबसे बड़े उत्पादकों में से थे लेकिन अंततः इसका निर्माण बंद कर दिया और इसे चीन से मंगाना शुरू किया। सरकारी समर्थन ने चीनी उत्पादकों को दूसरों से आगे निकलने में सक्षम बनाया। भारत के पास तुलनीय सब्सिडी या पर्याप्त प्रभावी नीतिगत प्रतिक्रियाएं नहीं थीं, जिनमें ऐंटी-डंपिंग उपाय भी शामिल हैं। महामारी से पहले ही डॉ. रेड्डीज ने एक ही देश पर निर्भर रहने के बजाय स्रोतों में विविधता लाना शुरू कर दिया था। भारत की निर्भरता अब भी काफी अधिक है विशेषकर मुख्य प्रारंभिक सामग्रियों के लिए। अब स्थिति बदलने लगी है।
डॉ. रेड्डीज की अनुसंधान रणनीति और फार्मा उद्योग पर उत्पाद-पेटेंट व्यवस्था में बदलाव का क्या प्रभाव पड़ा?
बदलाव के बारे में 2005 के पहले से जानकारी थी। भारत ने 1995 में जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ ऐंड ट्रेड (गैट) पर हस्ताक्षर किए थे इसलिए कंपनियों के पास तैयारी का समय था। कुछ कंपनियां मूल शोध के काम में लग गईं। डॉ. रेड्डीज उनमें पहली थी। हमने 1996-97 में यह संभावना प्रदर्शित की जब हमने एक मॉलीक्यूल का लाइसेंस नोवो नॉर्डिस्क को दिया। अन्य कंपनियों ग्लेनमार्क, वॉकहार्ट, ल्युपिन, टॉरंट और जायडस आदि ने डिस्कवारी शोध के क्षेत्र में प्रवेश किया। परंतु नीतिगत व्यवस्था में इतना विकास नहीं हुआ कि वह उस महत्वाकांक्षा को पूरा समर्थन दे सके। बहरहाल भारतीय कंपनियां एपीआई, फॉर्म्युलेशन, जेनेरिक और बायोसिमिलर्स में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन गईं।
भारत को फार्मास्युटिकल नवाचार में अगली बड़ी छलांग लगाने के लिए किन नीतिगत बदलावों की आवश्यकता है?
भारत को फार्मास्यूटिकल नवाचार के क्षेत्र में अगली बड़ी छलांग लगाने के लिए चार प्रमुख स्तंभों पर आधारित एक सुविचारित नवाचार ढांचा विकसित करने की जरूरत है। ये स्तंभ हैं- नियमन, वित्तपोषण, अधोसंरचना और अकादमिक-उद्योग सहयोग पर आधारित एक सुविचारित नवाचार ढांचा विकसित करना होगा। पहला, दवा खोज से संबंधित नियामक प्रणाली में और सुधार की आवश्यकता है। पहले दवाओं की मंजूरी में काफी समय लगता था क्योंकि नियामक संस्था के पास पर्याप्त आंतरिक वैज्ञानिक विशेषज्ञता नहीं थी और उसे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जैसे संस्थानों के विशेषज्ञों पर निर्भर रहना पड़ता था।
इन विशेषज्ञों को वैश्विक क्लीनिकल परीक्षणों का सीमित अनुभव था। यहां तक कि वैश्विक स्तर पर दवा विकास का अनुभव रखने वाली भारतीय कंपनियों को भी मंजूरी में देरी का सामना करना पड़ता था, जिसके कारण उन्हें अपने पहले चरण के क्लीनिकल परीक्षण ऑस्ट्रेलिया और मलेशिया जैसे देशों में कराने पड़ते थे। अब स्थिति में सुधार आने लगा है। फिर भी आवश्यक है कि केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संस्थान (सीडीएससीओ) के भीतर ही एक मजबूत वैज्ञानिक विशेषज्ञों का समूह हो ताकि निर्णय आवश्यक विशेषज्ञता और गति के साथ लिए जा सकें।
दूसरा, दवा खोज के विभिन्न चरणों के लिए पर्याप्त वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए और यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि यह एक अत्यधिक जोखिम वाला क्षेत्र है। स्टार्टअप की चुनौतियां अलग हैं जबकि सूचीबद्ध बड़ी कंपनियों की समस्याएं अलग हैं। अनुसंधान एवं विकास पर होने वाला खर्च सीधे व्यय के रूप में दर्ज होता है। यदि अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते तो शेयर बाजार के दबाव के कारण सूचीबद्ध कंपनियों के लिए लंबे समय तक अनुसंधान में निवेश बनाए रखना कठिन हो जाता है। सरकार की प्रमोशन ऑफ रिसर्च ऐंड इनोवेशन इन फार्मा-मेडटेक (पीआरआईपी) योजना एक अच्छी शुरुआत है।
हालांकि 5,000 करोड़ रुपये की राशि आवश्यकता की तुलना में कम है। इसी तरह बायोफार्मा शक्ति भी महत्त्वपूर्ण पहल है। भारत में दवा खोज के लिए वेंचर कैपिटल की व्यवस्था अभी पर्याप्त विकसित नहीं है। इसके विपरीत, चीन ने निजी वेंचर फंड्स के साथ स्वयं निवेश कर उनका जोखिम कम किया। उसने सरकारी अनुदान, वेंचर कैपिटल और सफल दवाओं के लिए प्रतिपूर्ति प्रणाली को जोड़कर घरेलू बाजार भी विकसित किया।
तीसरा, भारत को विशेष रूप से दवा खोज के लिए समर्पित अनुसंधान अवसंरचना विकसित करनी होगी। वर्तमान शोध पार्क बिखरे हुए हैं और उनमें विशेष सुविधाओं, विशेषज्ञ मार्गदर्शन तथा विश्वविद्यालयों के साथ मजबूत साझेदारी का अभाव है। भारत को अपनी परिस्थितियों के अनुरूप ऐसा मॉडल विकसित करना चाहिए, जिसमें बोस्टन जैसे वैश्विक नवाचार केंद्रों की तरह विश्वविद्यालय, स्टार्टअप, अनुसंधान अवसंरचना और बड़ी दवा कंपनियाँ मिलकर काम करें।
चौथा, अनुसंधान एवं विकास के लिए कर प्रोत्साहनों को फिर से लागू कर उन्हें और बेहतर बनाया जाना चाहिए। पहले अनुसंधान एवं विकास पर 200 प्रतिशत भारित कर कटौती की सुविधा उपलब्ध थी, लेकिन कुछ कंपनियों द्वारा दुरुपयोग किए जाने के कारण इसे समाप्त कर दिया गया। इसका नुकसान पूरे उद्योग को नहीं उठाना चाहिए।
क्या भारत का कम कीमत वाला बाजार नवाचार की लागत वसूलना कठिन बना देता है?
भारतीय बाजार मूल अनुसंधान की लागत और जोखिम वसूलने के लिए पर्याप्त अनुकूल नहीं है। केवल भारत में लॉन्च किया गया कोई उत्पाद कुछ सौ करोड़ रुपये ही कमा सकता है जो विकास लागत को पूरा नहीं करता और पहले की असफलताओं की लागत तो और भी नहीं। बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी कुछ नई दवाएं भारत में लॉन्च करने से हिचकती हैं। उनके पास इसकी सीमा होती है कि आखिर दवा की कीमत कितनी कम रखी जा सकती है क्योंकि भारत में कम कीमत अन्य बाजारों को संदर्भ मूल्य निर्धारण के माध्यम से प्रभावित कर सकती है।
मरीज पहुंच कार्यक्रम पहुंच बढ़ा सकते हैं लेकिन वे बाजार की समस्या का समाधान नहीं करते। नई दवाएं मूल्य नियंत्रण के तहत नहीं आतीं लेकिन सवाल यह है कि उन्हें खरीदेगा कौन। सरकारी खरीद बहुत छोटी है और मुख्यत: सीजीएचएस तथा कुछ राज्य योजनाओं तक सीमित है। हमने सरकार से अनुरोध किया है कि नवाचारी उत्पादों के लिए एक समर्पित खरीद कोष बनाया जाए चाहे वे भारतीय कंपनियों द्वारा विकसित हों या बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा। एक पूर्वानुमेय सार्वजनिक बाजार रोगियों की पहुंच बेहतर करेगा और नवाचारकर्ताओं को कम से कम अपनी लागत का कुछ हिस्सा वसूलने देगा।
क्या अगली नवाचार लहर स्टार्टअप से आएगी न कि बड़ी सूचीबद्ध फार्मा कंपनियों से?
भारत को एक जीवंत पारिस्थितिकी चाहिए जिसमें स्टार्टअप और बड़ी कंपनियां दोनों शामिल हों। बड़ी कंपनियों के लिए सरकार को पूरे जोखिम का बोझ उठाने की जरूरत नहीं है लेकिन उसका कुछ हिस्सा उठाया जा सकता है। हालांकि इसका पैमाना चीन जैसे देशों की तुलना में सार्थक होना चाहिए। फार्मास्यूटिकल कंपनियां देश के कुल अनुसंधान व्यय में निजी क्षेत्र के खर्च का लगभग 30 फीसदी हिस्सा रखती हैं, जबकि भारत का कुल अनुसंधान एवं विकास खर्च सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.7 फीसदी है। कंपनियां खर्च कर रही हैं, लेकिन शेयर बाजार उन्हें खोज अनुसंधान के लिए अतिरिक्त मूल्यांकन नहीं देता जबकि वेंचर फंड्स आमतौर पर बाद के चरण में प्रवेश करना पसंद करते हैं।
पैंतीस वर्ष बाद क्या भारत के फार्मा उद्योग ने उदारीकरण से बने अवसरों का पूरा लाभ उठा लिया है?
पहला चरण जेनेरिक्स था। भारत ने एपीआई, फॉर्म्युलेशन्स, जेनेरिक्स और बायोसिमिलर्स में वैश्विक प्रतिस्पर्धी क्षमताएं विकसित कीं। लेकिन उन क्षेत्रों में हम पीछे रह गए हैं जहां कभी हम अग्रणी थे। भारत ने मूल दवाओं की खोज चीन से कहीं पहले शुरू की थी फिर भी चीन वर्षों आगे निकल चुका है। भारत में क्षमताएं अब भी मौजूद हैं और बड़ी कंपनियों ने दिखाया है कि वे नए अणु खोज सकती हैं।