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Editorial: सोने पर बढ़ा शुल्क मांग घटाने में कितना असरदार होगा?

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सरकार ने सोने और चांदी पर आयात शुल्क बढ़ाकर बाहरी खाते पर दबाव कम करने की कोशिश की है, लेकिन सांस्कृतिक और निवेश मांग के कारण इसका असर सीमित रह सकता है।

Last Updated- May 15, 2026 | 8:34 AM IST
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश में ईंधन और सोने की खपत कम करने की अपील के बाद सरकार ने कई कदम उठाए हैं। एक ओर जहां सरकार कई स्तरों पर ईंधन खपत कम करने का प्रयास कर रही है वहीं केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने बुधवार को सोने और चांदी पर प्रभावी आयात शुल्क को 6 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया। चूंकि कच्चे तेल के बाद सोना आयात बास्केट में दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा रखता है इसलिए उम्मीद है कि उच्च शुल्क के कारण देश के लोग सोना खरीदने को लेकर हतोत्साहित होंगे और बाहरी संतुलन में सुधार लाने में मदद मिलेगी। वित्त वर्ष 26 में 72 अरब डॉलर मूल्य का सोना आयात किया गया और आयात बिल वित्त वर्ष 23 से अब तक दोगुना हो चुका है। ऐसे में इसमें तो कोई दोराय है ही नहीं कि सोने का आयात बाहरी खाते पर बोझ डालता है और मुश्किल वक्त में उसका असर होता है। हालांकि, शुल्क वृद्धि शायद वांछित असर न डाल सके।

भारत दुनिया में सोने की सबसे अधिक खपत करने वाले देशों में से एक है और इसका अधिकांश हिस्सा आयात किया जाता है। हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और धार्मिक कारक इस मांग को बढ़ाते हैं। शुल्क वृद्धि के कारण इसमें कोई बड़ा बदलाव होने की संभावना नहीं है। चांदी का भी देश में महत्त्वपूर्ण औद्योगिक उपयोग है और अधिक शुल्क अंतिम तौर पर तैयार वस्तुओं की कीमतें बढ़ा देगा। सोने को भंडारण मूल्य और मुद्रास्फीति के विरुद्ध सुरक्षा के रूप में देखा जाता है और इसकी विशुद्ध आर्थिक वजहें हैं। नकदी की अधिक समस्या न होने के कारण गरीब परिवार भी कुछ बचत सोने में रखना पसंद करते हैं जिसे कठिन समय में उपयोग में लाया जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि निवेश के उद्देश्य से सोने की मांग समय के साथ काफी बढ़ी है। उदाहरण के लिए वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड की मांग 2025 की पहली तिमाही के लगभग 7 टन से बढ़कर 2026 की पहली तिमाही में लगभग 20 टन हो गई। यह मांग कुछ हद तक कम हो सकती है क्योंकि उम्मीद है कि शुल्क वृद्धि परिस्थितियों के सुधरने पर वापस ली जा सकती है, जिससे होल्डिंग्स का मूल्य घट जाएगा। यह देखना होगा कि अन्य मांग कारक कैसे व्यवहार करते हैं।

उल्लेखनीय है कि सोने की अंतरराष्ट्रीय कीमतें वित्त वर्ष 2026 में लगभग 50 फीसदी बढ़ीं। यद्यपि भौतिक मांग पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 5 फीसदी घट गई, लेकिन इस पर खर्च 24 फीसदी से अधिक बढ़ गया। इस प्रकार, भारत के लिए शुल्क वृद्धि की तुलना में अंतरराष्ट्रीय मूल्य में उतार-चढ़ाव अधिक महत्त्वपूर्ण होगा। इसके अलावा, अन्य जटिलताएं भी हैं। यह सर्वविदित है कि अधिक शुल्क तस्करी को प्रोत्साहित करता है। राजस्व खुफिया निदेशालय के मुताबिक जुलाई 2024 में सरकार द्वारा शुल्क घटाने के बाद 2024-25 में सोने की जब्ती में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई थी। अब इसका उल्टा होने की आशंका है।

इसके अतिरिक्त, भारत-यूएई व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते के तहत, भारत से अपेक्षा की जाती है कि वह 10 वर्षों की अवधि में धीरे-धीरे चांदी पर आयात शुल्क को शून्य कर दे। सोना तरजीही मुल्क की दर से एक फीसदी अंक कम शुल्क पर आयात किया जा सकता है। वित्त वर्ष 23 और 25 के बीच भारत के सोने के आयात में यूएई की हिस्सेदारी दोगुने से अधिक हो गई। संभावना है कि वहां से अधिक आयात किया जाएगा।

इसलिए, समग्र नीतिगत ढांचे में, सोने के आयात को एक संरचनात्मक कारक के रूप में देखा जाना चाहिए और समय के साथ यथासंभव समाधान होना चाहिए। सरकार ने सॉवरिन गोल्ड बॉन्ड के माध्यम से इस मुद्दे को हल करने का प्रयास किया, लेकिन यह योजना विभिन्न कारणों से सफल नहीं हो सकी। यह बहस योग्य है कि क्या वित्तीय दबाव को कम करना मददगार होगा। बैंकों को सांविधिक तरलता अनुपात (एसएलआर) के तहत सरकारी बॉन्ड में निवेश करने का आदेश दिया गया है जो कृत्रिम रूप से बाजार ब्याज दरों को कम रखता है। यह सरकार और व्यवसायों की मदद करता है, लेकिन बचतकर्ताओं को नुकसान पहुंचाता है। बेहतर बाजार-निर्धारित ब्याज दरें और अधिक वित्तीय समावेशन निवेश की मांग को सोने से दूर ले जाने में मदद कर सकते हैं।

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First Published - May 15, 2026 | 8:34 AM IST

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