बैटरी अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2022 बैटरी उत्पादकों (और आयातकों) को यह जिम्मेदारी सौंपता है कि वे पुरानी पड़ चुकी बैटरियों को एकत्रित करें, उनका पुनर्चक्रण अथवा नवीनीकरण सुनिश्चित करें और नई बैटरियों में पुन: प्राप्त सामग्रियों के उपयोग को प्रोत्साहित करें। हालांकि सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैनुफैक्चरर्स (सायम) ने हाल ही में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को चेतावनी दी है कि इस प्रारूप का अनुपालन इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की कीमतों को 3 से 5 फीसदी तक बढ़ा सकता है और औसतन 35 से 40 किलोवॉट-घंटा (केडब्ल्यूएच) बैटरी पैक की लागत में 8,000 से 25,000 रुपये तक का इजाफा कर सकता है।
ऐसे समय में जब भारत में ईवी का प्रसार अभी भी सीमित है तो यात्री कारों में लगभग 2 से 3 फीसदी और दोपहिया व तीन-पहिया वाहनों में कहीं अधिक लागत बढ़ाने वाले नियम उपभोक्ताओं द्वारा इसे अपनाने की गति को धीमा कर सकते हैं। साथ ही, ये सरकार के व्यापक अकार्बनीकरण लक्ष्यों को कमजोर करने का जोखिम पैदा करते हैं।
दूसरी ओर, बैटरी निर्माता चिंतित हैं कि सबको एक ही तराजू में तौलने वाला यह अनुपालन ढांचा घरेलू बैटरी उत्पादन की व्यावसायिक व्यवहार्यता को कमजोर कर सकता है। पैनासोनिक एनर्जी इंडिया ने चेतावनी दी है कि मौजूदा नियम भारत में उसके एकमात्र ड्राई-सेल जिंक-कार्बन बैटरी निर्माण संयंत्र को बंद करने पर विवश कर सकते हैं क्योंकि अनुपालन लागत लाभ से अधिक हो सकती है और कुछ मामलों में पुनर्चक्रण की बाध्यता पुनः प्राप्त सामग्रियों के मूल्य से भी अधिक महंगी पड़ सकती है।
कंपनी ने यह भी संकेत किया है कि नियम विभिन्न रसायन संरचनाओं वाली बैटरी श्रेणियों के बीच पर्याप्त भेद नहीं करते। इसके अलावा छोटे आकार की बैटरियों को एकत्र करने के लिए कोई मजबूत तंत्र भी नहीं है।
वाहन क्षेत्र की चिंता यह है कि मौजूदा नियम विनिर्माताओं को आठ वर्षों के उपयोग के बाद 70 फीसदी बैटरियों को एकत्रित करना शुरू करने के लिए बाध्य करते हैं। हालांकि लीथियम आयरन फॉस्फेट बैटरियां जो किफ़ायती ईवी के लिए तेजी से पसंदीदा विकल्प बन रही हैं, वे आठ वर्षों के बाद भी अपनी मूल क्षमता का 70 से 80 फीसदी बनाए रखती हैं और वाहनों में सेवा जारी रख सकती हैं।
इसके अलावा इनको स्थिर ऊर्जा भंडारण के लिए दोबारा प्रयोग में लाया जा सकता है। केवल आयु के आधार पर संग्रहण को अनिवार्य करना, वास्तविक बैटरी स्वास्थ्य को अनदेखा करता है और यह गलत धारणा पैदा कर सकता है कि बैटरियों को बदलना आवश्यक है जबकि वे पूरी तरह से उपयोग करने लायक बनी रहती हैं।
यही वजह है कि भारत की पुनर्चक्रण नीति को जमीनी हालात और तकनीकी विकास को भी ध्यान में रखना चाहिए। इसी तरह विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (ईपीआर) प्रमाणपत्रों की कीमत को पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति (दंड) से जोड़ने के बजाय बैटरी पुनर्चक्रण को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए आवश्यक वास्तविक राशि से जोड़ा जाना चाहिए। इससे अनुपालन लागत का अनुमान लग सकेगा और पुनर्चक्रण अधोसंरचना ढांचे में निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा।
ऐसे सुधार भारत के बैटरी पारिस्थितिकी तंत्र के विस्तार के साथ लगातार महत्त्वपूर्ण होते जा रहे हैं। नीति आयोग का अनुमान है कि 2030 तक उन्नत रसायन वाली बैटरियों की मांग सालाना 260 गीगावॉट-घंटा (जीडब्ल्यूएच) से अधिक हो सकती है जबकि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार 2050 तक वैश्विक स्तर पर महत्त्वपूर्ण खनिजों की मांग तीन गुना से अधिक बढ़ सकती है। इसलिए इन सामग्रियों को कुशल पुनर्चक्रण के माध्यम से पुनः प्राप्त करना आयात निर्भरता को कम करने और आपूर्ति श्रृंखला के लचीलेपन को मजबूत करने के लिए एक रणनीतिक जरूरत है।
यूरोपीय संघ के बैटरी विनियमन ने डिजिटल बैटरी पासपोर्ट पेश किए हैं जो बैटरी की संरचना, स्वास्थ्य और उसके जीवनचक्र को दर्ज करते हैं, जिससे पुनः उपयोग, नवीनीकरण और पुनर्चक्रण पर अधिक बेहतर निर्णय लेना संभव होता है।
अमेरिका अपने ऊर्जा विभाग के रीसेल कार्यक्रम के माध्यम से उन्नत पुनर्चक्रण तकनीकों में निवेश कर रहा है जो सामग्री की अधिकतम पुनः प्राप्ति सुनिश्चित करती हैं और ऐसी बैटरी डिजाइन को समर्थन देती हैं जिसका पुनर्चक्रण आसान हो।
आगे का रास्ता डिजिटल ट्रैकिंग के माध्यम से बैटरी को ट्रेस करने, अधिकृत पुनर्चक्रण क्षमता का विस्तार, अनौपचारिक पुनर्चक्रण की मजबूत निगरानी और विकसित होती बैटरी तकनीकों के आधार पर तकनीकी मानकों की समय-समय पर समीक्षा में निहित है। एक लचीला, विज्ञान-आधारित पुनर्चक्रण ढांचा भारत की पर्यावरण के अनुकूल गतिशीलता महत्त्वाकांक्षाओं को बेहतर समर्थन देगा। महत्त्वपूर्ण खनिज सुरक्षा को मजबूत करेगा और एक वास्तविक चक्रीय बैटरी प्रणाली का निर्माण करेगा।