भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने मंगलवार को अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों की एक सूची के जरिये स्पष्ट किया कि बैंक विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) जमा या एफसीएनआर (बी) जुटाने के लिए क्या कर सकते हैं। यह वाणिज्यिक बैंकों को अत्यंत आवश्यक स्पष्टता प्रदान करेगा लेकिन साथ ही यह कई प्रश्न भी उठाता है। बैंकों को, जिनमें उनकी विदेशी शाखाएं भी शामिल हैं, रिजर्व बैंक द्वारा घोषित स्वैप सुविधा के अंतर्गत जुटाई गई एफसीएनआर (बी) जमा राशि के विरुद्ध विदेशी ऋणदाताओं को ऋण देने या स्टैंडबाय लेटर ऑफ क्रेडिट (एक तरह की गारंटी) जारी करने की अनुमति दी गई है।
इसका उद्देश्य स्वाभाविक रूप से ऐसी जमा राशि को प्रवासी भारतीयों के लिए आकर्षक बनाना है। इस सुविधा को शुरू करने का मूल कारण केंद्रीय बैंक की विदेशी प्रवाह आकर्षित करने की इच्छा थी ताकि संभावित भुगतान संतुलन घाटे को कवर किया जा सके। पिछले वित्तीय वर्ष में भी भुगतान संतुलन घाटे में था और रिजर्व बैंक को हाजिर बाजर में शुद्ध स्तर पर 50 अरब डॉलर से अधिक विदेशी मुद्रा बेचनी पड़ी।
ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि हुई। चूंकि भारत अपनी अधिकांश कच्चे तेल की जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है इसलिए चालू वित्त वर्ष में चालू खाता घाटा (सीएडी) सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग 2 फीसदी तक बढ़ने की उम्मीद थी। भारत विभिन्न कारणों से बड़े पैमाने पर पूंजी बहिर्गमन का भी सामना कर रहा है जिससे भुगतान संतुलन पर दबाव पड़ने की संभावना थी।
यह मुद्रा बाजार में रुपये की कमजोरी में परिलक्षित हुआ। यद्यपि भारत के पास बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार है फिर भी विदेशी मुद्रा प्रवाह को प्रोत्साहित करने का विचार एक एहतियाती कदम के रूप में उचित ठहराया जा सकता था। हालांकि तब से बहुत कुछ बदल गया है। पश्चिम एशिया में अभी भी जोखिम हैं लेकिन स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। वह कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 30 फीसदी की गिरावट में भी नजर आता है।
इस प्रकार प्रश्न उठता है कि क्या भारत को अभी भी महंगी विदेशी मुद्रा उधारी के उच्च स्तर की आवश्यकता है जिसके लिए बैंकों को अनिवासी भारतीयों को ऋण देने की अनुमति भी दी जा रही है। ऐसी जमा राशि पर मुद्रा जोखिम रिजर्व बैंक द्वारा वहन किया जाएगा। इस समाचार पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार भारतीय स्टेट बैंक 10 लाख डॉलर से अधिक की जमा राशि पर नौ गुना तक लीवरेज की पेशकश कर रहा है।
गणनाएं बताती हैं कि यह 14 फीसदी से अधिक के रिटर्न में बदल सकता है। अन्य बैंक भी अनिवासी भारतीयों के लिए इसी तरह की योजनाएं लेकर आ सकते हैं। बैंकरों ने इस समाचार पत्र को बताया कि 2013 में भी इसी तरह की संरचना की पेशकश की गई थी जब भारत तथाकथित टेपर टैंट्रम प्रकरण के दौरान मुद्रा संकट का सामना कर रहा था। हालांकि आज परिस्थितियां कहीं बेहतर हैं और इन्हीं के आधार पर बैंकों को ऐसी जमा राशि स्वीकार करने की अनुमति दी जानी चाहिए थी।
चूंकि बैंकों को अनिवासी भारतीयों को लीवरेज और अन्य सुविधाएं देने की अनुमति दी गई है इसलिए कई ऐसे सवाल हैं जो बहसतलब हैं। पहला, क्या वर्तमान स्तर पर 670 अरब डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार निकट और मध्यम अवधि की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए अपर्याप्त है?
दूसरा, केंद्रीय बैंक विभिन्न रियायतों और प्रोत्साहनों के माध्यम से अनिवासी भारतीयों और अन्य चैनलों से कितनी विदेशी मुद्रा जुटाने की अपेक्षा करता है और क्या वह पर्याप्त होगी?
तीसरा, क्या संभावित बड़े प्रवाह मुद्रा बाजार पर असर नहीं डालेंगे और आर्थिक समायोजन प्रक्रिया को बाधित नहीं करेंगे?
चौथा, यह सुनिश्चित करने के लिए कौन-से कदम उठाने होंगे कि पुनर्भुगतान सुचारु रूप से हो? और अंत में अनिवासी भारतीयों को मिलने वाले लाभ/सब्सिडी का स्तर क्या होगा?
स्वैप विंडो के माध्यम से जुटाए जाने वाले पूरे कोष के आंकड़े पाना उपयोगी होगा। यह भी ध्यान देने योग्य है कि अल्पकालिक समस्या से निपटने के प्रयास भारतीय नीति-निर्माताओं का ध्यान उन दीर्घकालिक उपायों से नहीं हटाना चाहिए जो पश्चिम एशिया संकट से उजागर हुई आर्थिक कमजोरियों को दूर करने के लिए जरूरी हैं।