सरकार ने गूगल से कई ऐसे फायरबेस वेब डेवलपमेंट अकाउंट्स हटाने को कहा है, जो प्रमुख सरकारी और निजी बैंकों तथा अन्य वित्तीय संस्थानों की वेबसाइट और मोबाइल ऐप की नकल कर रहे थे। सूत्रों के मुताबिक, गृह मंत्रालय के भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) ने इस संबंध में नोटिस भेजे हैं। इन फर्जी वेबसाइट और डेटाबेस का इस्तेमाल बड़े बैंकों के एंड्रॉयड ऐप जैसा दिखाकर लोगों से धोखाधड़ी करने के लिए किया जा रहा था। स्कैमर्स रिवॉर्ड पॉइंट रिडीम कराने, क्रेडिट कार्ड की लिमिट बढ़ाने और अन्य झांसे देकर लोगों को निशाना बना रहे थे।
इस मामले की खबर सबसे पहले रॉयटर्स ने दी थी। गूगल फायरबेस (Google Firebase), गूगल के क्लाउड बिजनेस का हिस्सा है, जिसका इस्तेमाल मोबाइल ऐप और वेबसाइट बनाने तथा होस्ट करने के लिए किया जाता है। सरकारी नोटिस पर प्रतिक्रिया देते हुए गूगल के प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी की ऐसी गतिविधियों के खिलाफ सख्त नीति है, जिसमें फिशिंग, मैलवेयर और वित्तीय धोखाधड़ी के लिए उसकी सेवाओं के इस्तेमाल की अनुमति नहीं है।
गूगल के प्रवक्ता ने कहा, “हम यूजर्स की सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं और भारत में कानून प्रवर्तन एजेंसियों व सरकारी संस्थानों, जिनमें I4C भी शामिल है, के साथ मिलकर काम करते हैं। हमें मिलने वाले सभी सरकारी नोटिस की समीक्षा की जाती है और लागू कानूनों व हमारी तय प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई की जाती है।”
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में देश को साइबर धोखाधड़ी के कारण करीब 52,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। सिर्फ 2025 में डिजिटल और साइबर फ्रॉड से लगभग 22,500 करोड़ रुपये का नुकसान दर्ज किया गया, जबकि इस दौरान 28 लाख साइबर फ्रॉड शिकायतें दर्ज हुईं।
इस साल की शुरुआत में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने डिजिटल और साइबर फ्रॉड के पीड़ितों के लिए संशोधित मुआवजा ढांचा लागू किया। इसके तहत डिजिटल धोखाधड़ी में 50,000 रुपये तक का नुकसान उठाने वाले पात्र पीड़ितों को एकमुश्त 25,000 रुपये तक का मुआवजा दिया जा सकता है।
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आरबीआई की धोखाधड़ी रोकने की व्यवस्था मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों पर आधारित है। पहला है ऑथेंटिकेशन और सिस्टम सुरक्षा। डिजिटल भुगतान के लिए अतिरिक्त सुरक्षा सत्यापन (AFA), जो अभी ज्यादातर SMS OTP के जरिए होता है, उसे अन्य सुरक्षित सत्यापन तरीकों तक बढ़ाया जा रहा है। इसके अलावा, आरबीआई के डिजिटल पेमेंट सुरक्षा नियम ग्राहकों और भुगतान से जुड़े डेटा की सुरक्षा के लिए न्यूनतम मानक तय करते हैं। .bank.in डोमेन ग्राहकों को असली बैंक वेबसाइट पहचानने में मदद करता है, जबकि अन्य वित्तीय संस्थानों के लिए .fin.in डोमेन लाने की योजना है।
दूसरा क्षेत्र है ग्राहक सुरक्षा। आरबीआई के नियमों के तहत अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन की स्थिति में ग्राहकों की जिम्मेदारी शून्य या सीमित हो सकती है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि घटना की जानकारी कितनी जल्दी दी गई। छोटे मूल्य के फर्जी इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग लेनदेन के लिए पात्र ग्राहकों को तय शर्तों के तहत 25,000 रुपये तक का मुआवजा भी दिया जा सकता है।
तीसरा क्षेत्र है फ्रॉड डेटा और जागरूकता। बैंक और गैर-बैंक प्रीपेड पेमेंट इंस्ट्रूमेंट (PPI) जारी करने वाली कंपनियां भुगतान धोखाधड़ी के मामलों की जानकारी आरबीआई को देती हैं। वहीं, आरबीआई का BE(A)WARE अभियान लोगों को डिजिटल भुगतान से जुड़े आम साइबर फ्रॉड के बारे में जागरूक करता है।
आगे आरबीआई अनधिकृत लेनदेन में साझी जिम्मेदारी की व्यवस्था पर विचार कर रहा है। इसके तहत फर्जी लेनदेन होने पर जिम्मेदारी पैसा भेजने वाले बैंक और पैसा पाने वाले बैंक के बीच बांटी जा सकती है।