Ethanol Production Policy: चीनी और चावल के दाम बढ़ने के साथ ही इथेनॉल उत्पादन और उसकी नीति पर सवाल खड़े हो रहे हैं। सरकार देश में इथेनॉल उत्पादन पर काफी जोर दे रही है। लेकिन चीनी और चावल के दाम बढ़ने से इथेनॉल पर बहस छिड़ गई है। उद्योग जगत के लोगों का मानना है कि जब देश में चीनी के करीब डेढ़ अरब उपभोक्ता हों और एक-दो साल सूखा पड़ जाए, तो इथेनॉल ब्लेंडिंग जैसे कार्यक्रम जोखिम भरे हो जाते हैं।
ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (AIDA) के अध्यक्ष विजेंद्र सिंह कहते हैं कि गन्ने को इथेनॉल में बदलना कोई पक्का कमिटमेंट नहीं है । यह एक ऐसा विकल्प है जिसे मिलें तभी चुनती हैं जब उनके पास अतिरिक्त चीनी हो। चीनी की कीमतें ज़्यादा होने के कारण आने वाले ESY 2026-27 में इथेनॉल की ओर डाइवर्जन कम होने की उम्मीद है, क्योंकि मिल मालिक गन्ने के रस से बनने वाले इथेनॉल के बजाय चीनी का उत्पादन करना पसंद करते हैं।
डाइवर्जन को फिर से आकर्षक बनाने के लिए सरकार को इथेनॉल की कीमतें बढ़ानी होंगी। इथेनॉल प्रोग्राम ने अकेले चीनी की सप्लाई पर कोई बड़ा असर नहीं डाला है, बल्कि इस बार सप्लाई की कमी और चीनी का दूसरे कामों में इस्तेमाल (डायवर्जन) एक ही समय पर हो गया। कीमतें बढ़ती है, तो उसका डायवर्जन कम हो जाता है, और गन्ने का इस्तेमाल वापस चीनी बनाने में होने लगता है।
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इस साल इथेनॉल इंडस्ट्री कच्चे माल (फीडस्टॉक) के तौर पर मक्का और चावल पर ज़्यादा निर्भर है। मुनाफा देखकर किसानों की दिलचस्पी मक्के की तरफ बढ़ी , जिससे मक्का का उत्पादन बढ़ा है। अधिक उत्पादन होने के कारण मक्का के दाम एमएसपी के नीचे चले गए । इथेनॉल बनाने वालों ने भी मक्के के बजाय एफसीआई के चावल को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है, क्योंकि चावल से कन्वर्जन रेट बेहतर मिलता है, और सरकार ने ESY 2025-26 में चावल से बनने वाले इथेनॉल की कीमत बढ़ा दी है, जिससे यह और भी आकर्षक हो गया है।
किसान कीमतों के संकेतों के आधार पर खेती के रकबे में तेजी से बदलाव कर सकते हैं। अगर मक्के की कीमतें मौजूदा निचले स्तर से बढ़ती हैं, तो एक ही सीजन में खेती बढ़ाई जा सकती है, जबकि गन्ने की फसल का चक्र बहुत लंबा होता है और एक साल से ज़्यादा समय लगता है। इथेनॉल प्रोडक्शन में मक्के की हिस्सेदारी ESY 2022-23 में 6.2% से बढ़कर ESY 2024-25 में लगभग 50% हो गई है, जो दिखाता है कि सही इंसेंटिव मिलने पर फीडस्टॉक का आधार तेज़ी से बदला जा सकता है। अनाज-आधारित इथेनॉल (मक्का और चावल मिलाकर) अब देश के कुल प्रोडक्शन का लगभग 65% है, और बाकी हिस्सा गन्ने से आता है, इसलिए यह प्रोग्राम अब किसी एक फसल पर बहुत ज़्यादा निर्भर नहीं है।
इथेनॉल बनाने में गन्ने के रस एवं अनाज के अधिशेष का इस्तेमाल कच्चे माल के रूप में होता है। वहीं टूटे हुए चावल और मक्का से भी इथेनॉल बनाया जा रहा है। सरकार का तर्क है कि पेट्रोल में इथेनॉल के इस्तेमाल से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होगी जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी। वहीं ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाना और किसानों को उपज का बेहतर मूल्य देना भी इथेनॉल प्रोडक्शन में शामिल है। यह गन्ने और अनाज के अधिशेष के लिए एक स्थिर, सरकार-समर्थित मांग पैदा करता है, जिससे किसानों को आय का एक भरोसेमंद स्रोत मिलता है।
कच्चे तेल के आयात को कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने, आत्मनिर्भरता बढ़ाने और प्रदूषण कम करने के लिए केंद्र सरकार ने 2018 में पेट्रोल में मिलाए जाने वाले इथेनॉल की मात्रा को 10 फीसदी से बढ़ाकर 20 फ़ीसदी करने का फैसला किया था । यह लक्ष्य 2030 में हासिल किया जाना था, लेकिन सरकार ने इसे जुलाई 2025 में ही हासिल कर लिया। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2025-26 के चीनी वर्ष में 30 लाख टन चीनी का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने के लिए किया गया। यह देश में चीनी के कुल उत्पादन का करीब 10 फ़ीसदी है।
चीनी मिलों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था नेशनल फेडरेशन ऑफ को-ऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड के उपाध्यक्ष केतन पटेल का कहना है कि जब देश में चीनी के करीब डेढ़ अरब उपभोक्ता हों और एक-दो साल सूखा पड़ जाए, तो इथेनॉल ब्लेंडिंग जैसे कार्यक्रम जोखिम भरे हो जाते हैं। इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम है और यह चीनी मिलों को नकदी उपलब्ध कराता है, लेकिन सरकार इस बात को लेकर स्पष्ट रही है कि चीनी का उत्पादन हमेशा पहली प्राथमिकता है।
असर सिर्फ चीनी पर ही नहीं, बल्कि चावल पर भी दिखाई दे रहा है। भारत के चावल की निर्यात कीमतों में इस सप्ताह तेजी देखने को मिली है। भारतीय चावल की कीमतें करीब एक साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं। सीमित आपूर्ति, नई फसल को लेकर चिंता और अफ्रीकी देशों से बनी हुई मांग ने कीमतों को समर्थन दिया है। वहीं, वियतनाम के चावल की कीमतों में लगातार तीसरे सप्ताह बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ग्लोबल सप्लाई पर मौसम का असर भी दिखाई दे रहा है।
मक्का को लेकर विशेष चिंता जताई गई है। एथेनॉल उत्पादक मक्के का अधिक इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि यह मुर्गीपालन और पशुपालन उद्योग के लिए भी एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है। डिस्टिलरी की ओर से मक्के की मांग बढ़ने से इसकी कीमतों पर असर पड़ सकता है और किसानों के फसल चयन के फैसले भी बदल सकते हैं।
मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन और आर्थिक मामलों के विभाग के सलाहकार आकाश पूजारी ने हाल ही में कहा नीति बनाते समय केवल डिस्टिलरी में इस्तेमाल होने वाले पानी को नहीं देखना चाहिए, बल्कि एथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली फसलों को उगाने में लगने वाले पानी का भी हिसाब रखना चाहिए। यह मुद्दा खास तौर पर गन्ने के मामले में महत्वपूर्ण है, क्योंकि गन्ने की खेती में बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है।