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उदारीकरण के 35 साल: ​1991 के बाद टेलीविजन ने कैसे बदला भारतीय मीडिया

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1991 में एक असफल अमेरिकी उपग्रह ने भारत के अस्तित्वहीन मीडिया क्षेत्र को पहला बड़ा अवसर दिया था। अब एक नेटवर्कयुक्त, वैश्विक बाजार अगला अवसर ला रहा है

Last Updated- August 21, 2026 | 11:07 PM IST
Indian Media
भारतीय मीडिया और मनोरंजन कारोबार की कहानी कम नाटकीय नहीं रही है। इस कहानी की शुरुआत तीन अहम किरदारों की वजह से हुई। एक नाकाम अमेरिकी उपग्रह, एक चीनी अरबपति और दिवालिया होता भारत।

भारतीय मीडिया और मनोरंजन कारोबार की कहानी कम नाटकीय नहीं रही है। इस कहानी की शुरुआत तीन अहम किरदारों की वजह से हुई। एक नाकाम अमेरिकी उपग्रह, एक चीनी अरबपति और दिवालिया होता भारत। अस्सी के दशक के आरंभ में ह्यूज स्पेस ऐंड कम्युनिकेशंस समूह ने वेस्टर्न यूनियन टेलीग्राफ कंपनी के लिए तीन उपग्रह बनाए। उनमें से एक, वेस्टर 6 फरवरी, 1984 में उड़ान के बाद विफल हो गया। इसके फंसे हुए रॉकेट को बचाकर दोबारा तैयार किया गया और एशियाई निवेशकों के एक समूह को बेच दिया गया। इनमें हॉन्ग कॉन्ग के अरबपति ली का-शिंग भी शामिल थे।

अप्रैल 1990 में इसे चीन के एक रॉकेट के जरिये एशियासैट1 के रूप में दोबारा लॉन्च किया गया। यह पहला जियोस्टेशनरी (भूस्थिर) उपग्रह था जिसने चीन और भारत सहित 38 एशियाई देशों के 2.7 अरब लोगों को कवर किया। का शिंग के छोटे बेटे रिचर्ड ली ने इसी उपग्रह पर सैटेलाइट टेलीविजन एशियन रीजन या स्टार टीवी की स्थापना की। अगस्त 1991 में इसने 24 घंटे चलने वाले पांच चैनल शुरू किए- स्टार प्लस (अंग्रेजी और चीनी भाषा की एक बोली कैंटोनीज ), प्राइम स्पोर्ट, बीबीसी न्यूज और एमटीवी की शुरुआत चीन, भारत तथा कुछ अन्य देशों में की।

एक ऐसे देश में जो विदेशी मीडिया को संदेह की नजर से देखता था, स्टार का प्रवेश आसान था क्योंकि इसके साथ दो संयोग जुड़े थे। पहला, अस्सी के दशक के मध्य से केबल ऑपरेटर मुंबई की ऊंची इमारतों में केबल बिछाकर हिंदी फिल्मों की पायरेटेड कॉपी वीसीआर के जरिये दिखाने लगे थे। इसका अर्थ यह था कि वे सैटेलाइट टीवी के लिए तैयार थे जो देश में खाड़ी युद्ध और सीएनएन के साथ जनवरी 1991 में आया। उसके बाद स्टार टीवी का आगमन हुआ। उन्होंने खुशी-खुशी डिश एंटीना स्थापित किए, सिग्नल पकड़े और उन्हें केबल के जरिये प्रसारित किया।

दूसरा, जुलाई 1991 में भारत ने वित्तीय संकट के बाद आर्थिक उदारीकरण को अपनाया। इस हलचल के बीच विदेशी टीवी चैनलों की आमद की अनदेखी कर दी गई। भारत का ब्रिटिश कालीन नियमन सैटेलाइट टीवी की कल्पना नहीं कर पाया था। इसलिए यह तकनीकी रूप से वैध नहीं था।

सबसे पहले उद्योगपति सुभाष चंद्रा ने यह समझा को सरकार को जल्दी ही इस क्षेत्र को खोलना होगा और चैनलों की बाढ़ आ जाएगी। वह इस क्षेत्र में बढ़त हासिल करना चाहते थे। 2 अक्टूबर 1992 को देश के पहले निजी सैटेलाइट चैनल ज़ी टीवी का प्रसारण शुरू हुआ। अगले वर्ष यानी 1993 में कलानिधि मारन का सन टीवी अस्तित्व में आया।

ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज के संस्थापक और मानद चेयरमैन चंद्रा कहते हैं, ‘मीडिया और मनोरंजन कारोबार आज 2.8 लाख करोड़ रुपये (2025 के राजस्व) की एक बड़ी ताकत बन चुका है, जो देशभर में 1.2 करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका का आधार है।’

एक सरकारी चैनल, चंद अखबारों और जर्जर सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघरों से शुरू हुई यह यात्रा आज 960 टीवी चैनलों, 60 से अधिक वीडियो स्ट्रीमिंग ऐप्स, करीब छह ऑडियो स्ट्रीमिंग ऐप्स, 3,500 मल्टीप्लेक्स स्क्रीन, 860 रेडियो स्टेशनों और एमी अवॉर्ड जीतने वाले कार्यक्रमों तक पहुंच चुकी है। इस पूरी यात्रा को मोटे तौर पर दो चरणों में बांटा जा सकता है प्रसारण का दौर और स्ट्रीमिंग का दौर। इसमें बाद वाला पहले दौर की सफलता के सहारे आगे बढ़ा।

मीडिया-विहीन स्थिति से चकाचौंध तक 

जब स्टार टीवी और ज़ी टीवी की शुरुआत हुई थी तब देश में लगभग 3.5 करोड़ टीवी घर थे। यदि उस समय एक परिवार में औसतन पांच सदस्य मानें तो 84.6 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में टीवी की पहुंच करीब 17.5 करोड़ लोगों तक थी। इसमें अखबार, फिल्म और रेडियो को भी जोड़ दें तो पूरे मीडिया एवं मनोरंजन कारोबार का अनुमानित आकार 2,000 करोड़ रुपये था। अगले दो दशकों में जैसे-जैसे भारतीय और विदेशी कंपनियों ने कोल्ड ड्रिंक से लेकर कार तक हर तरह की उपभोक्ता वस्तुएं बाजार में उतारनी शुरू कीं वैसे-वैसे उपभोक्ता बाजार का विस्तार और मीडिया का उभार समानांतर रूप से आगे बढ़ता गया। 

नब्बे के दशक में सांता बारबरा, सांस, चिट्ठी और बनेगी अपनी बात, अगले दशक में तिरुमति सेल्वम, कौन बनेगा करोड़पति, क्योंकि सास भी कभी बहू थी और जस्सी जैसी कोई नहीं और उसके बाद के दशक में इंडियन प्रीमियर लीग, कबड्डी, सत्यमेव जयते और बिगबॉस जैसे कार्यक्रमों ने उन विकल्पों को आकार दिया जिन्हें विज्ञापनदाताओं और उपभोक्ताओं दोनों ने चुना।

हर मीडिया कंपनी ने अपने पारंपरिक दायरे से बाहर निकलना शुरू कर दिया। दैनिक भास्कर गुजरात और महाराष्ट्र पहुंचा, दैनिक जागरण मुंबई पहुंचा और द टाइम्स ऑफ इंडिया ने चेन्नई और बेंगलूरु में विस्तार किया। दूसरी ओर टेलीविजन ने भाषाओं और राज्यों की सीमाएं पार करते हुए मराठी, तमिल, तेलुगु, बंगाली, ओड़िया आदि भाषाओं में अपनी पहुंच बनाई और तकनीक के स्तर पर भी डीटीएच तक पहुंच गया।

25 से अधिक वर्षों तक ‘अपॉइंटमेंट टेलीविजन’ या लीनियर टीवी का दबदबा रहा। इसने मीडिया एवं मनोरंजन कारोबार की लगभग आधी दर्शक संख्या और राजस्व अपने हिस्से में रखा। इससे भी महत्वपूर्ण यह था कि इसने लोगों के मीडिया उपभोग का संदर्भ और तौर-तरीका तय किया। वैसे ही जैसे सिनेमा करता है (जिस पर एक अन्य लेख में चर्चा की गई है)। यह स्थिति 2015 में हॉटस्टार और 2016 में नेटफ्लिक्स तथा एमेजॉन प्राइम वीडियो के आने के बाद भी बनी रही। 2016 वही साल था जब जियो लॉन्च हुआ। डेटा की कीमतें तेजी से गिरीं और ब्रॉडबैंड बाजार ने रफ्तार पकड़ी।

सेक्रेड गेम्स जैसे ओरिजिनल कार्यक्रमों और बोर्गेन जैसी लाइसेंस प्राप्त अंतरराष्ट्रीय सामग्री की उपलब्धता ने ऐसे बाजार में मनोरंजन की एक पूरी नई दुनिया खोल दी जबकि मूल्य-नियमन के कारण टीवी काफी हद तक सास-बहू धारावाहिकों तक सीमित होकर रह गया था। नेटफ्लिक्स भारत में एचबीओ जैसा एक नया दौर लेकर आया। ऐसा चरण, जिसमें प्रीमियम प्रोग्रामिंग तेजी से आगे बढ़ी। लेकिन 2019 तक इनमें से कोई भी बदलाव टीवी के प्रभुत्व को हिला नहीं पाया। फिर कई अन्य कारोबारों की तरह महामारी ने मीडिया और मनोरंजन उद्योग की दिशा बदल दी। 

कॉमस्कोर के आंकड़ों के अनुसार इस साल अप्रैल में डिजिटल माध्यमों तक पहुंचने वाले यूनीक विजिटर्स की संख्या 56.6 करोड़ थी। इससे डिजिटल की पहुंच टीवी के बहुत करीब आ गई है जिसकी पहुंच 65 करोड़ है।

मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग के कुल 2.8 लाख करोड़ रुपये (लगभग 30 अरब डॉलर) के राजस्व में टेलीविजन की हिस्सेदारी अब सिर्फ पांचवें हिस्से से थोड़ी अधिक रह गई है। पहले यह हिस्सेदारी 40-50 प्रतिशत हुआ करती थी। दूसरी ओर डिजिटल माध्यमों की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत है और यही कारोबार का सबसे तेजी से बढ़ने वाला हिस्सा बना हुआ है। हालांकि डिजिटल का प्रभाव केवल उसके आकार और बाजार हिस्सेदारी तक सीमित नहीं है।

डिजिटल आच्छादन

इंटरनेट, बैंडविड्थ और उपकरणों की सर्वव्यापकता ने हमारे जीवन के हर क्षेत्र में स्थान बना लिया है। इसने मीडिया कंपनी की पूरी अवधारणा को ही

पुनर्परिभाषित कर दिया है। अब आप समाचार पढ़ सकते हैं, देख सकते हैं या सुन सकते हैं। पराठा बनाने का तरीका जान सकते हैं, फिल्म देख सकते हैं, संगीत सुन सकते हैं, मजेदार वीडियो पर हंस सकते हैं, दोस्तों या परिवार के साथ समय बिता सकते हैं या ऑनलाइन बैठक कर सकते हैं। दुनिया भर के पांच अरब से अधिक उपयोगकर्ता गूगल और उसके यूट्यूब पर खोज करने, संगीत सुनने या वीडियो देखने आए। इससे 2025 में उसे 403 अरब डॉलर की आय हुई। एमेजॉन ने 717 अब डॉलर का राजस्व जुटाया और उसके 31 करोड़ खरीदारों में से 20 करोड़ संगीत सुनने या वीडियो देखने आए।

मेटा ने 201 अरब डॉलर का राजस्व कमाया और लगभग 3.6 अरब उपयोगकर्ता व्हाट्सऐप, फेसबुक या इंस्टाग्राम पर एक दूसरे से बातचीत करते हुए समाचार या वीडियो देखते रहे। तो गूगल, मेटा या एमेजॉन क्या हैं? टेक कंपनी या मीडिया कंपनी? सरल भाषा में कहें तो अब कोई भी कंपनी जो दर्शकों को खोज रही है वह एक मीडिया कंपनी है। यह खोज दर्शकों को विज्ञापन या भुगतान राजस्व के माध्यम से मुद्रीकृत करने के लिए हो सकती है, जैसे नेटफ्लिक्स और डिज्नी। वैकल्पिक रूप से, यह किसी अन्य व्यवसाय के लिए स्थायित्व पैदा करने के लिए हो सकती है, जैसे एमेजॉन या एक बंद लूप के भीतर उपयोगकर्ताओं का समुदाय बनाने के लिए मसलन ऐपल।

नेटफ्लिक्स पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। 32.5 करोड़ सब्सक्राइबर और 45 अरब डॉलर के राजस्व के साथ नेटफ्लिक्स दुनिया की सबसे बड़ी अकेली स्ट्रीमिंग सेवा है। अब यह आगे कैसे बढ़ेगा? नए बाजारों में नए उपयोगकर्ताओं को खोजकर और ऐसे नए तरीक़े अपनाकर जिनसे लोग नेटफ्लिक्स पर अधिक समय बिताएं। यही वजह है कि नेटफ्लिक्स ने विज्ञापन (अब तक 12 बाजारों में), खेल और अधिक फ़िल्मों की ओर रुख किया है। संक्षेप में कहें तो टीवी जैसा बनने की दिशा में। हर बड़ी सशुल्क स्ट्रीमिंग सेवा ने विज्ञापन-स्तर पेश किया है। पिछले साल अमेरिका में सशुल्क ओटीटी की 24 प्रतिशत आय विज्ञापन-स्तर से आई।

दुनिया में हमारी स्थिति

भारत में भी यही नजर आ रहा है। 2025 में संपूर्ण स्ट्रीमिंग वीडियो व्यवसाय लगभग 43,500 करोड़ रुपये का था और यह 27 करोड़ सब्सक्राइबर तक पहुंचा। इस आय का लगभग आधा हिस्सा शो बनाने और फिल्में खरीदने पर खर्च हुआ। आश्चर्य नहीं कि शायद यूट्यूब और सोनीलिव को छोड़कर कोई सेवा लाभ नहीं कमा सकी।

जैसे-जैसे स्ट्रीमिंग अपने अगले चरण में प्रवेश कर रही है यह बिल्कुल प्रसारण जैसी बनती जा रही है। इसकी वृद्धि का आधार हैं अधिक भाषाएं, जनसामान्य के लिए कार्यक्रम, सस्ते उत्पाद संस्करण, खेल और ढेर सारी निशुल्क सामग्री। नेटफ्लिक्स इंडिया की कंटेंट उप प्रमुख मोनिका शेरगिल कहती हैं, ‘सबको लगा कि कपिल शर्मा को नेटफ्लिक्स पर लाना पागलपन है। लेकिन स्ट्रीमिंग को टीवी बनना ही होगा क्योंकि आप उसी को पूरक बना रहे हैं।’ यह दो कारणों से अनिवार्य है। पहला, व्यवसाय अब पहले से कहीं अधिक वैश्विक हो गया है। दूसरा, इसमें महंगी तकनीक शामिल है, जिसमें आर्टिफिशल इंटेलिजेंस भी है।

भारत में जियोस्टार को छोड़कर शायद कोई भी कंपनी पैमाने के मामले में किसी भी टेक-मीडिया दिग्गज का मुकाबला नहीं कर सकती। तो भारत की भूमिका कहां है? शायद इसकी क्षमता में। अच्छी और विविध कहानियां सुनाने की क्षमता। हॉलीवुड से भरी दुनिया में भारत का रचनात्मक व्यवसाय सौ वर्षों से अपनी स्थानीय प्रामाणिक कहानियों के साथ खड़ा है। नेटफ्लिक्स या एमेजॉन प्राइम वीडियो द्वारा पेश किए गए हर शो और फिल्म एक ही समय में 200 से अधिक देशों में लॉन्च होते हैं।

भारतीय कहानियों को दुनिया तक पहुंचाना ही वह है जिसे मीडिया पार्टनर्स एशिया के कार्यकारी निदेशक विवेक कौटो भारतीय मीडिया का केबीसी क्षण कहते हैं। 2000 में स्टार टीवी के कौन बनेगा करोड़पति (केबीसी) की सफलता ने भारत में प्रसारण वृद्धि को आगे बढ़ाया। स्ट्रीमिंग भी वही कर सकती है। जैसे हम फ्रेंच या आइसलैंडिक शो देख रहे हैं, वैसे ही दुनिया भर के लोग हीरामंडी या द फैमिली मैन देख रहे हैं, जिससे हमारी कहानियों का आधार व्यापक हो रहा है। भारतीय कहानीकारों के पास दुनिया तक पहुंचने का अवसर है। क्या वे इसका लाभ उठाएंगे?

1991 में एक असफल अमेरिकी उपग्रह ने भारत के अस्तित्वहीन मीडिया क्षेत्र को पहला बड़ा अवसर दिया था। अब एक नेटवर्कयुक्त, वैश्विक बाजार अगला अवसर ला रहा है।

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First Published - August 21, 2026 | 11:07 PM IST

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