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Editorial: अक्टूबर में दरों में बढ़ोतरी का बन सकता है आधार

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रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने दलील दी कि व्यापक स्तर पर मुद्रास्फीति में वृद्धि और अपेक्षाओं के असंतुलन को लेकर सतर्क रहने की आवश्यकता है

Last Updated- August 20, 2026 | 10:50 PM IST
Reserve Bank of India (RBI)
प्रतीकात्मक तस्वीर

भारतीय रिजर्व बैंक की छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने इस माह के आरंभ में अपनी बैठक में नीतिगत रीपो दर को अपरिवर्तित रहने देने का निर्णय लिया था। वह समझदारी भरा निर्णय था। हालांकि जून में मुद्रास्फीति की दर तय लक्ष्य को पार कर गई थी लेकिन लगातार 16 महीनों तक वह लक्ष्य से नीचे भी रही। इतना ही नहीं अंतरराष्ट्रीय और घरेलू मोर्चों पर स्पष्टता की प्रतीक्षा भी समझदारी भरी बात रही। पश्चिम एशिया के हालात में कोई खास सुधार होता नहीं दिख रहा है और कच्चे तेल की कीमतें लगातार उतार-चढ़ाव दर्शा रही हैं। उसकी निरंतर निगरानी करने की आवश्यकता है।

अगली बैठक तक कृषि उत्पादन पर कमजोर मॉनसून के संभावित असर को लेकर भी और अधिक स्पष्टता आएगी। बहरहाल, जैसा कि इस समाचार पत्र ने भी कहा, रिजर्व बैंक के मुद्रास्फीति संबंधी अनुमान यह सुझाते हैं कि नीतिगत दर लंबे समय तक मौ​जूदा स्तर पर नहीं रहेगी। बैठक का ब्योरा बुधवार को जारी किया गया और उसकी व्याख्या भी कमोबेश इसी तर्ज पर की जा रही है।

इसमें रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने दलील दी कि व्यापक स्तर पर मुद्रास्फीति में वृद्धि और अपेक्षाओं के असंतुलन को लेकर सतर्क रहने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, ‘यदि इन जोखिमों के वास्तविक होने के कोई प्रमाण मिलते हैं तो नीतिगत सख्ती की आवश्यकता पड़ सकती है।’ डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने और स्पष्ट रूप से कहा, ‘वर्तमान समय में किसी भी अतिरिक्त नरमी की गुंजाइश दिखाई नहीं देती। बल्कि, यह देखते हुए कि समग्र मुद्रास्फीति 2026-27 की तीसरी तिमाही में 5.9 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान है, वर्ष के दौरान दर वृद्धि का मामला बन सकता है।’

वर्तमान वित्तीय वर्ष के लिए रिजर्व बैंक का मुद्रास्फीति अनुमान 10 आधार अंक घटाकर 5 फीसदी कर दिया गया। यद्यपि दर के वर्तमान वित्तीय वर्ष की तीसरी तिमाही से शुरू होकर लगातार तीन तिमाहियों तक 5 फीसदी से ऊपर रहने का अनुमान है। 2027-28 की पहली तिमाही से आगे के अनुमानों को देखना दिलचस्प होगा। अधिक स्पष्टता संभवतः अक्टूबर में होने वाली अगली एमपीसी बैठक और अर्धवार्षिक मौद्रिक नीति रिपोर्ट के जारी होने पर सामने आएगी।

वर्तमान स्थिति में मूल्य दबाव बढ़ने का अनुमान है। हेडलाइन यानी समग्र मुद्रास्फीति के 5 फीसदी से ऊपर जाकर तीसरी तिमाही में 5.9 फीसदी तक पहुंचने की आशंका है। इस स्थिति में 5.25 फीसदी की नीतिगत रीपो दर वास्तविक रूप से ऋणात्मक हो जाएगी। यह अवांछनीय है। रिजर्व बैंक का उद्देश्य यह है कि वास्तविक नीतिगत दर ऋणात्मक क्षेत्र में न जाए। खासकर तब जब वृद्धि जोखिम में न हो।

इसलिए नीतिगत दरों में समायोजन आवश्यक होगा। आने वाले हफ्तों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि एमपीसी अक्टूबर में सख्ती शुरू करेगा या कुछ समय और प्रतीक्षा की गुंजाइश होगी। अगले वित्त वर्ष के लिए मुद्रास्फीति के अनुमान निर्णायक होंगे। ध्यान देने योग्य है कि मौद्रिक नीति का असर विलंब से होता है, और यदि दर अगले वित्तीय वर्ष में ऊंची रहने की उम्मीद है, तो सख्ती अक्टूबर से ही शुरू हो सकती है।

हालांकि भारत में मौद्रिक नीति मुद्रा बाजार के विकास से संचालित नहीं होती लेकिन मुद्रास्फीति की स्थिति से निपटने के लिए किए गए नीतिगत समायोजन इसमें मदद कर सकते हैं। उच्च मुद्रास्फीति दर और अधिक राजकोषीय घाटे की चिंताओं के कारण विकसित बाजारों में यील्ड बढ़ रही हैं। उदाहरण के लिए अमेरिका सरकार ने यील्ड कम करने के लिए बॉन्ड पुनर्खरीद बढ़ाने का निर्णय लिया है।

इस सप्ताह की शुरुआत में 30-वर्षीय अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की यील्ड 5.3 फीसदी से ऊपर चली गई, जो 2007 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है। यील्ड में कम अंतर विकसित देशों से उभरते बाजारों में ऋण पूंजी प्रवाह को हतोत्साहित करता है। हालांकि कम से कम निकट भविष्य में, भारत मुद्रा मोर्चे पर बेहतर स्थिति में है। रिजर्व बैंक द्वारा घोषित स्वैप व्यवस्था के माध्यम से पर्याप्त धन जुटाया जा रहा है। फिर भी नीतिगत दरों में समायोजन ऋण प्रवाह में मदद कर सकता है।

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First Published - August 20, 2026 | 10:50 PM IST

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