Indian Bonds Market: केंद्र सरकार की ओर से विदेशी निवेशकों को टैक्स में राहत देने, बॉन्ड पर ओपरशिप संबंधी सीमाएं हटाने और रुपये को स्थिर करने के लिए उठाए गए कदमों के बाद वैश्विक निवेशकों (ग्लोबल फंड्स) की भारतीय सरकारी बॉन्ड में दिलचस्पी तेजी से बढ़ी है। क्लियरिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (CCIL) के ताजा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 5 जून को घोषित सुधारों के बाद इंडेक्स में शामिल होने योग्य सरकारी बॉन्ड में विदेशी निवेश 32,630 करोड़ रुपये (करीब 3.5 अरब डॉलर) बढ़ गया है। हालांकि, इस बढ़ोतरी का एक हिस्सा ज्यादा से ज्यादा बॉन्ड के इस कैटेगरी में शामिल होने की वजह से भी है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, पिक्टेट एसेट मैनेजमेंट (Pictet Asset Management) और न्यूबर्गर बरमन ग्रुप एलएलसी ने भारतीय बॉन्ड में अपना निवेश बढ़ाने की इच्छा जताई है। वहीं एमएंडजी इन्वेस्टमेंट्स ने हाल में उठाए गए सरकारी कदमों के बाद भारत को लेकर अपना नजरिया और सकारात्मक किया है। सिंगापुर स्थित एमएंडजी इन्वेस्टमेंट्स में एशिया फिक्स्ड इनकम प्रमुख लो गुआन यी ने कहा, “भारत अब अन्य उभरते बॉन्ड बाजारों की तुलना में ज्यादा आकर्षक दिख रहा है, जहां नीतिगत फ्लैक्सिबिलिटी और विश्वसनीयता अपेक्षाकृत सीमित है।”
इस महीने की शुरुआत में केंद्र सरकार ने विदेशी निवेशकों के लिए कुछ सरकारी बॉन्ड पर लगने वाला टैक्स खत्म कर दिया और उनके स्वामित्व की सीमा भी हटा दी। वहीं भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कहा कि वह नॉन-रेजिडेंट डिपॉजिट्स और कंपनियों की विदेशी उधारी पर हेजिंग लागत के लिए सब्सिडी देगा।
ये कदम ऐसे समय उठाए गए जब ऊंची ऊर्जा कीमतों और रिकॉर्ड विदेशी बिकवाली के कारण रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया था।
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डेलॉयट इंडिया के अनुसार, इस टैक्स राहत से विदेशी निवेशकों का रिटर्न 15 से 20 फीसदी तक बढ़ सकता है। विदेशी निवेश आकर्षित करने के भारत के ये कदम एशिया के अन्य देशों से अलग हैं। जहां कई देशों ने अपनी करेंसी को संभालने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने का रास्ता चुना, वहीं भारत ने टैक्स राहत और नियामकीय सुधारों पर जोर दिया।
पिछले सप्ताह बैंक इंडोनेशिया ने अप्रत्याशित रूप से ब्याज दरों में बढ़ोतरी की और रुपिया को मजबूत करने के लिए बाजार में हस्तक्षेप बढ़ाने की घोषणा की। वहीं फिलीपींस के अधिकारियों ने पेसो के खिलाफ सट्टेबाजी करने वालों को चेतावनी दी, जबकि इससे पहले वहां भी महंगाई पर काबू पाने के लिए ब्याज दरें बढ़ाई गई थीं।
पिक्टेट एसेट मैनेजमेंट में सीनियर इन्वेस्टमेंट मैनेजर (फिक्स्ड इनकम-इमर्जिंग मार्केट्स) कैरी लियाव ने कहा, “हमें भारतीय बॉन्ड में निवेश बढ़ाने की गुंजाइश दिख रही है क्योंकि भारत अन्य उभरते बाजारों की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक यील्ड और कम जोखिम (लो-बीटा) वाला विकल्प उपलब्ध कराता है।”
सरकार और आरबीआई के इन कदमों का असर रुपये पर भी दिखा है। पिछले महीने डॉलर के मुकाबले करीब 97 रुपये के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंचने के बाद रुपया अब संभलने लगा है। गुरुवार को रुपया लगातार पांचवें कारोबारी सत्र में मजबूत हुआ, जो पिछले एक साल की इसकी सबसे लंबी बढ़त रही।
न्यूबर्गर बरमन के सीनियर पोर्टफोलियो मैनेजर प्रशांत सिंह का कहना है कि इन सुधारों से भविष्य में भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों की यूरोक्लियर (Euroclear) के माध्यम से क्लियरिंग और सेटलमेंट की संभावना भी मजबूत हुई है। यदि ऐसा होता है तो विदेशी निवेशकों के लिए Indian Bonds Market तक पहुंच और आसान हो जाएगी। हालांकि, सभी निवेशक फिलहाल तुरंत निवेश बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं।
एबरडीन इन्वेस्टमेंट्स में एशियाई सॉवरे डेट प्रमुख केनेथ अकिंटेवे ने कहा कि मध्यम और लंबी अवधि के लिहाज से ये कदम सकारात्मक हैं, लेकिन फिलहाल पश्चिम एशिया से जुड़े भू-राजनीतिक जोखिम निवेश बढ़ाने में बाधा बने हुए हैं। हालांकि, अगले कुछ महीनों में ये जोखिम बेहतर खरीदारी के अवसर भी पैदा कर सकते हैं।