जब मुख्य कंपनियों के आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) का बाजार सूना रहा है, उस समय छोटे और मझोले उद्यमों (एसएमई) के आईपीओ ने अच्छा दमखम दिखाया है। मई 2026 में एसएमई एक्सचेंजों पर 12 आईपीओ सूचीबद्ध हुए, जो अप्रैल के 7 एसएमई आईपीओ के आंकड़े से बहुत ज्यादा हैं।
ये आईपीओ छोटे और मझोले आकार की कंपनियों के लिए होते हैं। वे नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) इमर्ज और बीएसई एसएमई जैसे एसएमई प्लेटफॉर्म पर सूचीबद्ध होते हैं। निर्गम के बाद इनकी चुकता पूंजी यानी पेड-अप कैपिटल 25 करोड़ रुपये से ज्यादा नहीं हो सकती। इन कंपनियों का कारोबार सामान्य कंपनियों के मुकाबले कम समय से चल रहा होता है।
ट्रेडजिनी के सीओओ त्रिवेश डी कहते हैं, ‘एक्सचेंज इनकी अच्छी तरह से जांच करता है और मार्केट मेकर (शेयर खरीदने और बेचने वाले) सूचीबद्ध होने के बाद बुनियादी लिक्विडिटी उपलब्ध कराते रहते हैं।’
निवेशकों को एसएमई और मुख्य एक्सचेंज के आईपीओ यानी मेनबोर्ड आईपीओ के बीच बुनियादी अंतर पहचानना आना चाहिए। प्राइम डेटाबेस ग्रुप के प्रबंध निदेशक प्रणव हल्दिया बताते हैं, ‘एसएमई आईपीओ में आम तौर पर सूचीबद्ध होने के बाद कम तरलता होती है, ज्यादा उठापटक होती है और कम विश्लेषक तथा संस्थाएं इन पर नजर रखती हैं।’
रीसर्जेंट इंडिया के प्रबंध निदेशक ज्योति प्रकाश गाडिया कहते हैं, ‘मेनबोर्ड रिटेल आईपीओ के मुकाबले यहां ज्यादा शेयरों के लिए आवेदन होता है और लॉट साइज भी बड़ा होता है। इस तरह निवेशक ज्यादा रकम लगा सकते हैं।’
सूचीबद्ध होने के बाद इनमें सही कीमत पर पहुंचना मुश्किल होता है क्योंकि ट्रेडिंग के लिए कम शेयर उपलब्ध होते हैं। हल्दिया का कहना है, ‘मेनबोर्ड आईपीओ आम तौर पर बड़ी और रसूख वाली कंपनियों के होते हैं, जो सख्त पात्रता नियमों का पालन करती हैं और अधिक सूचनाएं (डिसक्लोजर) देती हैं।’ मेनबोर्ड आईपीओ में पूंजी अधिक होती है, लाभ देने की क्षमता ज्यादा होती है और अधिक सार्वजनिक शेयरधारिता भी रखनी पड़ती है। उनमें लिक्विडिटी ज्यादा होती है और बड़ी संख्या में निवेशक उन पर नजर रखते हैं।
एसएमई आईपीओ के जरिये निवेशक संस्थापक द्वारा चलाए जा रहे छोटे कारोबार में उस समय दांव लगा सकते हैं, जब उनकी वृद्धि शुरू ही हुई होती है। स्टॉकिफाई संस्थापक और सीईओ पीयूष झुनझुनवाला समझाते हैं, ‘कई एसएमई ऐसे खास उद्योग क्षेत्रों में काम करते हैं, जिनमें विस्तार की जबरदस्त गुंजाइश होती है। इससे पुरानी कंपनियों के मुकाबले ज्यादा रिटर्न मिलने की संभावना बन जाती है।’
चूंकि ज्यादातर एसएमई विस्तार की शुरुआत ही कर रहे होते हैं, इसलिए स्थापित हो चुकी लार्जकैप कंपनियों के मुकाबले उनमें वृद्धि की ज्यादा गुंजाइश होती है।
वेंचरा में हेड ऑफ रिसर्च विनीत बोलिंजकर कहते हैं, ‘अगर कंपनी ठीक से चलाई गई तो निवेशकों को मुनाफे में तेज बढ़ोतरी और मूल्यांकन की पुन: रेटिंग का फायदा मिल सकता है।’
एसएमई आईपीओ पोर्टफोलियो में विविधता भी प्रदान करते हैं। निर्गम लाने वाली कई कंपनियां औद्योगिक, कृषि प्रसंस्करण, कपड़ा, इंजीनियरिंग, रक्षा पुर्जे, स्पेशलिटी केमिकल, बी2बी सेवाओं और स्पेशलाइज्ड मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्रों में काम करती हैं, जिनमें आगे चलकर होने वाली वृद्धि को अभी तोला ही नहीं गया है।
एसएमई का कारोबार अगर अच्छी तरह चला तो शुरुआत में निवेश करने वाले के पास आगे चलकर बढ़िया संपत्ति आ सकती है। सफल कंपनी अंत में मुख्य एक्सचेंज पर जा सकती है, तरलता बढ़ सकती है और संस्थागत निवेशक आ सकते हैं। सेंट्रिसिटी वेल्थटेक में लीड स्ट्रैटजिस्ट – इक्विटीज शौर्य खडगावत का कहना है, ‘सफल एसएमई मेनबोर्ड में पहुंचे तो उसका मूल्यांकन और भी बढ़ जाता है।’
झुनझुनवाला कहते हैं, ‘निर्गम का आकार छोटा होने और उसके लिए बोलियां बड़ी तादाद में आने से सूचीबद्धता के समय या छोटी सी अवधि में ही बढ़िया मुनाफा कमाने का मौका मिल सकता है।’
एसएमई आईपीओ को सूचीबद्धता के समय मुनाफा बनाने के चश्मे से ही नहीं देखना चाहिए। झुनझुनवाला का कहना है, ‘एसएमई आईपीओ में जोखिम ज्यादा होता है क्योंकि ये कंपनियां छोटी होती हैं, ज्यादा रसूख वाली नहीं होतीं और आर्थिक बदलावों की ज्यादा शिकार हो सकती हैं।’ हल्की फुल्की उठापटक भी इनकी मुनाफा देने की क्षमता को काफी झटका दे सकती है।
कई एसएमई का कारोबार ज्यादा पुराना नहीं होता और नकदी की आवक कभी कम कभी ज्यादा रह सकती है। त्रिवेश समझाते हैं, ‘एसएमई कंपनियों में गिने-चुने ग्राहकों के पास से ज्यादा कारोबार होना आम बात है। इसलिए किसी एक ग्राहक के छिटकने से ही उनकी कमाई पर बहुत चोट लग सकती है।’ कई एसएमई बहुत कम मार्जिन पर काम कर रहे होते हैं या कार्यशील पूंजी का टोटा उनके सामने आ सकता है। कारोबार की बुनियाद कमजोर हुई तो तुरंत घाटा हो सकता है।
इनमें कॉरपोरेट गवर्नेंस पर बारीक नजर रखनी पड़ती है। गाडिया आगाह करते हैं, ‘सेबी ने निवेशकों को ऐसे निर्गमों से दूर रहने की सलाह दी है, जहां कंपनियां या प्रवर्तक कामकाज की फर्जी तस्वीर दिखा सकते हैं।’
बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों के मुकाबले एसएमई में गवर्नेंस का स्तर अलग-अलग दिखता है। बोलिंजकर कहते हैं, ‘कई प्रवर्तक के दम पर चलने वाले कारोबार होते हैं, जिनमें आंतरिक नियंत्रण और पारदर्शिता बड़ी कंपनियों की तुलना में कम होते हैं। कई बार उनमें रिलेटेड-पार्टी लेनदेन होते हैं और अकाउंटिंग भी आक्रामक होती है, जिससे जोखिम खड़े हो जाते हैं।’
खडगावत के मुताबिक जानकारी की कमी बहुत बड़ा जोखिम है क्योंकि बड़ी कंपनियों के मुकाबले इनके खुलासा मानक कमजोर होते हैं और विश्लेषक भी इनके बारे में बहुत कम बताते हैं। मूल्यांकन का जोखिम भी ज्यादा होता है। बाजार चढ़ा होता है तो कई एसएमई के आईपीओ की कीमत ज्यादा रखी जाती है, जबकि नकदी की आवक एक जैसी नहीं होती और उनके कारोबार का पिछला रिकॉर्ड भी बहुत कम होता है।
खडगावत का कहना है, ‘निर्गम में कीमत बढ़ा-चढ़ाकर रखना आम बात है और बाद में शेयर में तेज गिरावट आ सकती है।’
एसएमई में निवेश करने पर लिक्विडिटी की कमी सबसे बड़ा जोखिम होता है। हो सकता है कि सूचीबद्ध होने के बाद इनके बहुत कम शेयरों की खरीदफरोख्त हो। कंपनियों को पर्यावरणीय, सामाजिक और प्रशासन संबंधी स्वतंत्र रेटिंग प्रदान करने वाली ईएसजीरिस्क डॉट एआई की कार्यकारी निदेशक पूजा घोष कहती हैं, ‘इसकी वजह से बाजार में उठापटक के दिनों में इन शेयरों के भाव बहुत ऊपर-नीचे जा सकते हैं।’ इससे निवेशकों के लिए शेयर बेचकर निकलना बहुत मुश्किल हो सकता है।
बाजार में ट्रेडिंग के लिए शेयर कम होने से भाव तेजी से ऊपर-नीचे हो सकता है और सटोरिये फायदा भी उठा सकते हैं। खडगावत आगाह करते हैं कि ट्रेडिंग कम होने से लागत बढ़ सकती है और ज्यादा शेयर खरीद लिए हों तो बेचने पर भाव तेजी से गिर सकते हैं।
निवेशकों को कंपनी का वित्तीय प्रदर्शन ठीक से जांच लेना चाहिए। उन्हें देखना चाहिए कि कंपनी में राजस्व वृद्धि कितनी है और लगातार हो रही है या नहीं। साथ ही कंपनी की मुनाफा कमाने की क्षमता, कर्ज, मुनाफा मार्जिन, नकदी की आवक, कार्यशील पूंजी चक्र, रिटर्न ऑन इक्विटी तथा लगाई गई पूंजी पर रिटर्न भी जरूरत जांचना चाहिए।
बोलिंजकर के मुताबिक नकदी की आवक अच्छी नहीं है तो मुनाफा लगातार अच्छा बने रहना मुश्किल होगा। अगर राजस्व की हालत तंग है और रिलेटेड पार्टी सौदे बहुत हो रहे हैं तो भी सतर्क हो जाएं। निवेशकों को ऑडिटरों की टिप्पणी भी जरूर पढ़नी चाहिए। झुनझुनवाला निवेशकों को कंपनी का कारोबारी मॉडल, होड़ में आगे निकलने की क्षमता और वृद्धि की दिशा भी समझने की सलाह देते हैं। गाडिया के हिसाब से निवेशकों को देखना चाहिए कि वृद्धि लंबे समय तक बनी रहेगी या एक बार के सौदों के दम पर ही हो रही है।
एसएमई में प्रवर्तकों के दम पर चल रही कंपनियां ज्यादा हैं। निवेशकों को उनके पिछले उपक्रमों, उन पर हुए मुकदमों, रिलेटेड पार्टी लेनदेन, प्रशासन से जुड़े तौर-तरीके और गिरवी रखे शेयरों की तफ्तीश भी कल लेनी चाहिए। आईपीओ का ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस पूरी तरह पढ़ना चाहिए। उसमें से जोखिम तलाशने चाहिए, नियामकीय खुलासे देखने चाहिए और चल रहे मुकदमों की जानकारी भी लेनी चाहिए।
निवेशकों को ग्रे मार्केट प्रीमियम पर भरोसा करने के बजाय इसे पढ़ना चाहिए। यह जरूर देखना चाहिए कि आईपीओ से जुटाई गई रकम का क्या किया जाएगा। त्रिवेश कहते हैं कि आईपीओ में अगर ऑफर फॉर सेल का हिस्सा ज्यादा है तो निवेशकों को पूछना चाहिए कि प्रवर्तक अपने शेयर क्यों बेच रहे हैं।
निवेशकों को पी/ई रेश्यो या ईवी/एबिटा आदि का इस्तेमाल कर देखना चाहिए कि एसएमई कंपनी का मूल्यांकन उसी दर्जे की किसी सूचीबद्ध कंपनी की तुलना में कैसा है। बोलिंजकर ध्यान दिलाते हैं कि बहुत अधिक भाव होने पर गिरावट का जोखिम भी ज्यादा रहता है, इसलिए ऐसे आईपीओ से दूर रहना चाहिए।
निवेशकों को यह भी समझना चाहिए कि सूचीबद्ध होते ही शेयर बेचकर मुनाफा कमाना मुश्किल हो सकता है। बहुत अधिक बोलियां और ज्यादा ग्रे मार्केट प्रीमियम देखकर नफा कमाने की उम्मीद हो सकती है मगर पहली गिरावट के साथ ही बिकवाली जोर पकड़ सकती है।
एसएमई के आईपीओ में लंबी अवधि के लिए रकम लगाने वालों के बजाय सटोरिये ज्यादा आते हैं। जब शेयर पाने वाले ज्यादातर लोग पहले दिन ही बेचकर मुनाफा कमाने चलेंगे तो खरीदार कहां से आएंगे। ऐसे में लोअर सर्किट लगकर शेयर फ्रीज हो जाएगा। तुरंत मुनाफा कमाने की आस लगाए निवेशकों को मनचाहे भाव पर खरीदार नहीं मिले तो घाटा होगा या शेयर में फंस जाएंगे।
एसएमई के आईपीओ आम तौर पर उन निवेशकों के लिए होते हैं, जिन्हें इसकी अच्छा समझ होती है और जो वित्तीय स्टेटमेंट पढ़ सकते हैं, कारोबारी मॉडल समझते हैं तथा छोटे कारोबारों पर करीबी नजर रखते हैं। पूजा के हिसाब से जोखिम लेने को तैयार और विविधता भरे पोर्टफोलियो वाले निवेशक भी दांव खेल सकते हैं।
इन निवेशकों में कम लिक्विडिटी झेलने और पूंजी का नुकसान झेलने की कुव्वत होनी चाहिए। उनकी योजना लंबे अरसे के लिए निवेश की भी होनी चाहिए। हाडिया के मुताबिक जोखिम से दूर रहने वाले और पहली बार आईपीओ खरीद रहे लोगों को दूर रहना चाहिए। उधार लेकर भी इस पर दांव नहीं लगाना चाहिए।
निवेशक केवल उतनी रकम लगाएं, जितनी वह अनिश्चितता और उठापटक के दौर में भी लगाए रख सकते हैं। एसएमई आईपीओ में फौरी मुनाफा कमाने से ज्यादा जरूरी है पूंजी बचाना। गाडिया कहते हैं, ‘बोलियां कितनी भी ज्यादा हों, ग्रे मार्केट प्रीमियम कितना भी ऊंचा हो, इनफ्लुएंसर कितनी भी सिफारिश करें, आंख मूंदकर आवेदन कभी न करें।’