दिल्ली की नई इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी2) नीति 1 जुलाई से लागू हो गई है। यह अच्छे इरादों वाली एक कवायद है, लेकिन इसकी अव्यावहारिक नीतिगत रूपरेखा इसे त्रुटिपूर्ण बनाती है। यह नीति हर साल जन स्वास्थ्य संकट पैदा करने वाले शीतकालीन प्रदूषण से निपटने के उद्देश्य से बनाई गई है, एक ऐसा मकसद जो प्रदूषण के चरम स्तर वाले महीनों में गाड़ियों की आवाजाही पर लगाई जाने वाली नियोजित पाबंदियों में भी दिखाई देता है।
लक्ष्य यह है कि 2030 तक राज्य के कुल वाहन बेड़े में 30 फीसदी इलेक्ट्रिक होने चाहिए (ईवी1 के तहत, राज्य ने 15 फीसदी ईवी का लक्ष्य हासिल किया)। इस उद्देश्य के लिए, 1 जनवरी, 2027 से राज्य में केवल ईवी तीन-पहिया वाहन और हल्के वाणिज्यिक वाहन ही पंजीकृत किए जाएंगे। इसी तरह 1 अप्रैल, 2028 से केवल इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों का ही पंजीकरण होगा। अधिसूचना जारी होने के दो साल के भीतर स्कूल बसों को अपने बेड़े का कम से कम 10 फीसदी और 2030 तक 30 फीसदी इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) में बदलना होगा।
इस बदलाव को प्रोत्साहित करने के लिए राज्य सरकार सड़क कर और पंजीकरण शुल्क में 100 फीसदी छूट दे रही है। हालांकि यात्री कारों के लिए यह छूट केवल 30 लाख रुपये तक की कीमत वाले वाहनों पर ही लागू होगी। दोपहिया और तिपहिया वाहनों और हल्के वाणिज्यिक वाहनों को तीन साल के लिए खरीद सब्सिडी मिलेगी, और भारत IV उत्सर्जन मानकों से कम उत्सर्जन वाले वाहनों को स्क्रैप करने के लिए प्रोत्साहन भी दिया जा रहा है।
इस योजना को अन्य राज्यों के लिए एक आदर्श के रूप में देखा जा रहा है। सब्सिडी देकर, राज्य सरकार ने पेट्रोल-डीजल इंजन (आईसीई) वाले वाहनों से इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की ओर बदलाव को लागू करने की नीति के दबावपूर्ण स्वरूप को संतुलित करने का प्रयास किया है। हालांकि, बदलाव को जबरदस्ती लागू करने और आईसीई वाहनों का पंजीकरण बंद करने के बजाय, जिससे कई लोगों को परेशानी हो सकती है, सरकार को ईवी को प्रोत्साहन देना चाहिए था ताकि लागत में अंतर को कम किया जा सके और उपभोक्ताओं को निर्णय लेने का विकल्प दिया जा सके।
परिचालन संबंधी मुद्दों के संदर्भ में, यह सुनिश्चित करना महत्त्वपूर्ण होगा कि नागरिकों, विशेष रूप से दोपहिया वाहन मालिकों को प्रोत्साहन प्राप्त करने के लिए इधर-उधर भटकना न पड़े। इसके अलावा, आवश्यक सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन स्थापित करना एक चुनौती होगी। ये दोपहिया वाहन मालिकों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि यात्री कार मालिक, जो अपेक्षाकृत संपन्न हैं, निजी सुविधाओं का खर्च उठा सकते हैं।
नीति के अनुसार 31 मार्च, 2030 तक 30,000 चार्जिंग पॉइंट स्थापित किए जाएंगे। शहर में फिलहाल लगभग 2,000 चालू चार्जिंग स्टेशन होने के कारण, यह लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो सकता है। बैटरी-स्वैपिंग स्टेशनों को भी वर्तमान 232 की तुलना में कई गुना विस्तार की आवश्यकता होगी।
इस नीति के परिणामों पर भी सवाल उठ सकते हैं। ताप ऊर्जा से चलने वाले चार्जिंग पॉइंट इस नीति के उद्देश्य को ही विफल कर देते हैं। चार्जिंग पॉइंट की बढ़ती मांग से ग्रिड पर दबाव काफी बढ़ेगा, खासकर गर्मियों में, और प्रदूषण भी बढ़ेगा। पिछले कुछ हफ्तों से दिल्ली में बिजली कटौती और लोड-शेडिंग देखी जा रही है। उचित योजना के अभाव में स्थिति और भी खराब हो सकती है। सौर ऊर्जा से चलने वाले चार्जिंग पॉइंट पर ध्यान केंद्रित करने से कोयले से बिजली उत्पादन में वृद्धि के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
इसके अलावा, दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) का केंद्र है, जिसमें हरियाणा और उत्तर प्रदेश के शहरी केंद्र शामिल हैं। इन क्षेत्रों और आसपास के इलाकों से हजारों पेट्रोल-डीजल वाहन प्रतिदिन शहर में प्रवेश करते हैं और दिल्ली के परिवहन प्रदूषण में इनकी काफी अधिक हिस्सेदारी होती है।
इन केंद्रों के अनुरूप बनाई गई नीति प्रदूषण को कम करने का अधिक व्यावहारिक तरीका साबित हो सकती थी। अंत में, सर्दियों में होने वाले प्रदूषण में खेतों में पराली जलाने के लिए लगाई जाने वाली आग की प्रमुख भूमिका है। इन पर भी अंकुश लगाने के लिए एक समन्वित बहु-राज्यीय दृष्टिकोण की आवश्यकता है और यह एनसीआर के लिए आवश्यक समग्र प्रदूषण-निवारण रणनीति का एक अहम घटक है। इसमें एक अच्छी सोच वाली ईवी नीति भी शामिल है, जो इस रणनीति के कई महत्त्वपूर्ण पहलुओं में से एक है।