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Editorial: उच्च शिक्षा में और सुधार जरूरी

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सर्वेक्षण के अनुसार, बीते वर्षों में छात्रों के नामांकन में सुधार हुआ है। खासकर, महिलाओं का नामांकन 2.07 करोड़ तक पहुंचा, जो 2014-15 के स्तर से 32% अधिक है।

Last Updated- February 02, 2024 | 9:20 PM IST
उच्च शिक्षा में और सुधार जरूरी, Editorial: Further reforms necessary in higher education

शैक्षणिक सत्र 2021-22 के लिए अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (एआईएसएचई) के ताजा संस्करण में इस बात को रेखांकित किया गया है कि बीते कुछ वर्षों में देश के उच्च शिक्षा क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सुधार और वृद्धि देखने को मिली है। सर्वेक्षण के मुताबिक बीते वर्षों में छात्रों के नामांकन में लगातार सुधार हुआ है। खासतौर पर महिलाओं का नामांकन 2.07 करोड़ के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया जो 2014-15 के स्तर से 32 फीसदी अधिक है।

लैंगिक समता सूचकांक या पुरुषों के नामांकन अनुपात की तुलना में महिलाओं का नामांकन अनुपात 1.01 के स्तर पर है जो संकेत देता है कि नामांकन में बढ़ोतरी भी महिलाओं के पक्ष में है। उच्च शिक्षा संस्थानों में महिला फैकल्टी की तादाद भी 2014-15 से 2021-22 के बीच 22 फीसदी बढ़ी।

ताजा आंकड़े दिखाते हैं कि उच्च शिक्षा क्षेत्र में लैंगिक अंतर को पाटने की दिशा में काफी काम हुआ है। सामाजिक विविधता को अपनाने और कक्षाओं को समावेशी बनाने की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया गया है। अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग तथा अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चों का प्रतिनिधित्व भी बढ़ा है। इसके साथ ही नामांकन अभी भी चुनिंदा भौगोलिक क्षेत्रों में सीमित है। कुल नामांकन में से 53.3 फीसदी छह राज्यों में हुए।

सर्वेक्षण के परिणाम में उच्च शिक्षा में सरकार की ऊंची मौजूदगी को भी दर्शाया गया। करीब 59 फीसदी पंजीकृत विश्वविद्यालयों का प्रबंधन सरकार करती है जबकि कुल कॉलेजों में 21.5 फीसदी सरकार द्वारा प्रबंधित हैं। शिक्षा क्षेत्र पर सरकारी व्यय सकल घरेलू उत्पाद का तीन फीसदी है जो उभरती जरूरतें पूरी करने की दृष्टि से अपर्याप्त है।

जाहिर है निजी क्षेत्र की पहुंच बढ़ाने की आवश्यकता है। हाल के दिनों में सरकार ने विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में परिसर स्थापित करने को लेकर प्रोत्साहित किया है और भारतीय विश्वविद्यालय भी विदेशों में परिसर स्थापित कर रहे हैं, यह स्वागतयोग्य है। ऑस्ट्रेलिया के दो विश्वविद्यालयों को पहले ही गिफ्ट सिटी में परिसर स्थापित करने की मंजूरी मिल गई है। इसके साथ ही भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान जैसे संस्थानों ने भी अफ्रीकी महाद्वीप और पश्चिम एशिया में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।

सर्वेक्षण के मुताबिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित विषयों में कुल नामांकन का 26 फीसदी देखने को मिला और इनमें भी महिलाओं की तादाद पुरुषों से अधिक रही। यह सकारात्मक नजर आता है लेकिन और अधिक भारतीयों को उचित कौशल की जरूरत है ताकि तकनीक समृद्ध दुनिया में वे रोजगारपरक काम सीख सकें। उद्योग जगत की अक्सर यह शिकायत रहती है भारतीय स्नातक रोजगार के काबिल नहीं होते।

सर्वेक्षण एक और अहम मुद्दा उठाता है और वह है विदेशी विद्यार्थियों की भारतीय विश्वविद्यालयों में उपस्थिति। यह विश्वविद्यालयों की वैश्विक रैंकिंग का एक अहम संकेतक है। एक दशक से भी कम समय में देश में विदेशी विद्यार्थियों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इसके बावजूद इनमें बड़ा हिस्सा दक्षिण एशियाई देशों से आता है। सबसे अधिक विद्यार्थी नेपाल से आते हैं।

अगर भारत को दुनिया के अन्य हिस्सों से और अधिक विद्यार्थियों को अपने यहां आने के लिए आकर्षित करना है तो उसे नीतियों की समीक्षा करनी होगी। इस संदर्भ में यह बात ध्यान देने लायक है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों की काफी कमी है। पाठ्यक्रम, प्रकाशन और फैकल्टी के शोध प्रोफाइल को लेकर भी चिंताएं हैं। जानकारी के मुताबिक 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 30 फीसदी शैक्षणिक पद रिक्त हैं।

नामांकन और पास होने की दर में सुधार देश के उच्च शिक्षा की समस्याओं के लिए रामबाण नहीं है। इसके अलावा उद्योग जगत तथा अकादमिक दुनिया के बीच संपर्क बढ़ाने तथा अकादमिक नियुक्तियों के लिए अधिक ढांचागत प्रक्रिया अपनाने से इस क्षेत्र में कहीं अधिक बेहतर नतीजे हासिल किए जा सकते हैं।

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First Published - February 2, 2024 | 9:20 PM IST

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