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Editorial: आर्थिक सुधारों से मजबूत हुई अर्थव्यवस्था, लेकिन चुनौतियां भी

India gdp growth rate : कई लोगों का मानना है कि आगामी वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था 7 फीसदी की दर से बढ़ेगी।

Last Updated- January 30, 2024 | 9:50 PM IST
GDP Growth Rate

आर्थिक मामलों के विभाग ने सोमवार को बीते एक दशक में देश के आर्थिक प्रदर्शन की समीक्षा प्रस्तुत की। यह हर वर्ष आने वाली आर्थिक समीक्षा नहीं है। उसे तो लोक सभा चुनाव के बाद पेश होने वाले पूर्ण बजट के पहले प्रस्तुत किया जाएगा। अर्थव्यवस्था की समीक्षा में उन सुधारों को प्रमुखता से पेश किया गया है जो मोदी सरकार ने क्रियान्वित किए हैं।

समीक्षा में कहा गया है कि चालू वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था के 7.3 फीसदी की दर से बढ़ने की उम्मीद है। कई लोगों का मानना है कि आगामी वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था 7 फीसदी की दर से बढ़ेगी। यह सही है कि अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर अपेक्षा से बेहतर रही है।

अपेक्षाकृत प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भारत का इस दर से वृद्धि हासिल करना सराहनीय है। सरकार ने बीते एक दशक में कई सुधारों को अंजाम दिया है और महामारी से उबरने की प्रक्रिया में भी देश का प्रदर्शन अनुमान से बेहतर रहा है। बहरहाल, अभी भी ऐसी चुनौतियां हैं जो मध्यम से दीर्घ अवधि में संभावित वृद्धि पर असर डाल सकती हैं।

सर्वाधिक उल्लेखनीय सुधारों की बात करें तो सरकार ने ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता, 2016 पारित की। सरकारी बैंकों के विलय और उनके पुनर्पूंजीकरण के अलावा उसने दोहरी बैलेंस शीट की समस्या हल करने में भी मदद की। इसके परिणामस्वरूप देश का बैंकिंग क्षेत्र इस समय एक दशक में सबसे अधिक अनुकूल परिस्थितियों में है।

बेहतर कॉर्पोरेट और बैंक बैलेंस शीट की मदद से न केवल वृहद आर्थिक जोखिम कम हुए हैं बल्कि निजी निवेश को भी मदद मिलेगी। बीते एक दशक में आकार दिया गया एक अन्य उल्लेखनीय सुधार है वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी)। वर्षों तक अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन करने के बाद कर व्यवस्था में स्थिरता के संकेत नजर आ रहे हैं और राजस्व में इजाफा हो रहा है।

अब सरकार को दरों और स्लैब को युक्तिसंगत बनाने पर ध्यान देना चाहिए ताकि प्रदर्शन में और सुधार हो सके। सरकार ने कई अन्य पहल भी की, मसलन अचल संपत्ति (नियमन एवं विकास) अधिनियम, छोटे मोटे आर्थिक अपराधों की आपराधिकता समाप्त करना, विभिन्न क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की प्रक्रिया को उदार बनाना और मुद्रास्फीति के लचीले लक्ष्य अपनाना आदि।

इनमें से कुछ सुधार मध्यम से लंबी अवधि में वृद्धि को समर्थन देंगे। बहरहाल कम से कम दो ऐसे मुद्दे हैं जिन पर तत्काल नीतिगत ध्यान देने की आवश्यकता है। सरकार ने महामारी के बाद वृद्धि को सहायता देने के लिए पूंजीगत व्यय बढ़ाने का विकल्प चुना जिससे राजकोषीय समेकन की प्रक्रिया धीमी हुई। अनुमान के मुताबिक इसके परिणामस्वरूप ही इस वर्ष देश का सार्वजनिक ऋण बढ़ सकता है।

आंशिक तौर पर इसके लिए कम नॉमिनल वृद्धि भी वजह होगी। सकल घरेलू उत्पाद के 80 फीसदी से अधिक का सार्वजनिक ऋण भारत जैसे देश में हमेशा वृहद आर्थिक स्थिति को मुश्किल में डाल सकता है। उच्च ऋण और ब्याज भुगतान सरकारी व्यय को भी प्रभावित कर रहे हैं। इस समाचार पत्र के एक विश्लेषण के मुताबिक हाल के वर्षों में ब्याज भुगतान में इजाफे के साथ स्वास्थ्य और शिक्षा पर व्यय अपेक्षाकृत कम हुआ है। ऐसे में सरकार को राजकोषीय घाटा तेजी से कम करने की जरूरत है ताकि सार्वजनिक ऋण को कम किया जा सके।

एक अन्य बड़ी नीतिगत चुनौती है गुणवत्तापूर्ण रोजगार तैयार करना। समीक्षा में कहा गया है कि वार्षिक सावधिक श्रमबल सर्वेक्षणों के मुताबिक बेरोजगारी दर 2017-18 के 6 फीसदी से घटकर 2022-23 में 3.2 फीसदी रह गई। बहरहाल नीति निर्माताओं को इन आंकड़ों का सावधानीपूर्वक अध्ययन करना चाहिए और चुनौती को कम करके नहीं आंकना चाहिए।

यह बात ध्यान देने लायक है कि 57 फीसदी से अधिक कामगार स्वरोजगार वाले हैं जबकि 18 फीसदी अपने घरेलू उपक्रमों में सहायक के रूप में काम कर रहे थे। इस बीच करीब 22 फीसदी श्रमिक असंगठित क्षेत्र में कामगार के रूप में काम कर रहे थे। रोजगार क्षेत्र का मिश्रण बताता है कि देश की अर्थव्यवस्था जरूरी पैमाने पर गुणवत्तापूर्ण रोजगार तैयार कर पाने में विफल है। अकेले इस कारक में ही यह क्षमता है कि वह दीर्घावधि में देश की आर्थिक वृद्धि की संभावनाओं को सीमित कर दे।

First Published - January 30, 2024 | 9:50 PM IST

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