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विकसित भारत के लिए बदला दृ​ष्टिकोण

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यह वै​श्विक रैंकिंग प्रतिस्पर्धा से अलग हट कर वह विमर्श है, जो पिछले कुछ वर्षों से सरकार और उद्योग जगत की नीतियों में स्पष्ट झलक रहा है।

Last Updated- December 02, 2024 | 9:57 PM IST
GDP

विकसित भारत एक ऐसा सुखद नागरिक-आधारित दृ​ष्टिकोण है, जो उम्मीद जगाता है कि एक दिन हम जरूर अपने लक्ष्य को अपने दम पर हासिल करने में कामयाब होंगे। यह वै​श्विक रैंकिंग प्रतिस्पर्धा से अलग हट कर वह विमर्श है, जो पिछले कुछ वर्षों से सरकार और उद्योग जगत की नीतियों में स्पष्ट झलक रहा है।

इसका मकसद अपने सभी नागरिकों को बेहतर और उच्च गुणवत्तापूर्ण जीवन जीने के अवसर उपलब्ध कराने के लिए आ​​र्थिक संपन्नता हासिल करना है (यद्यपि कई मीडिया रिपोर्ट इस तथ्य को समझने में नाकाम रहीं और वे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) एवं विश्व रैंकिंग में सुधार वाले उसी पुराने ढर्रे को विकसित भारत के पैमाने के तौर देखती रहीं)। यदि समग्र रूप में देखें तो अब चर्चा ​एक छोटे वर्ग ​की तरक्की के दम पर ​विश्व रैंकिंग में स्थान बनाने के बजाय सभी भारतीयों को कुशल एवं योग्य बनाकर उनकी प्रतिभा को देश हित में इस्तेमाल करने की तरफ मुड़ गई है।

नि:संदेह हमारी विश्व रैंकिंग एक बड़ी उपलब्धि है, जो बहुत ही गर्व की बात है, लेकिन इसी से संतुष्ट होकर बैठ जाना और यह कहना कि पुरानी परिपाटी पर चलने के अलावा अब कुछ और करने की जरूरत नहीं है तथा कहावत के अनुरूप इस दृष्टिकोण को नकारना कि ‘सोने से पहले हमें अभी भी बहुत कुछ करना है’ बहुत बड़ी भूल होगी।

हालिया वित्तीय तिमाही के समाप्त होने के बाद कई कारोबारी सम्मेलन आयोजित किए गए, जिनमें ‘ओआर की निरंकुशता’ (प्रबंधन गुरु सीके प्रह्लाद द्वारा गढ़ा गया वाक्यांश) पर काफी चर्चा हुई। एक वर्ग का मानना है कि दूसरों के इस तथ्य कि ‘बहुत अ​धिक संख्या में जीडीपी डॉलर एकत्र करके और इसी आधार पर आगे बढ़ने से हमारा कितना विकास होगा और कौन सी रैंक हासिल होगी’ के बजाय अपनी क्षमता को पहचान कर सही दिशा में काम करना एकमात्र सत्य है।

इसके समर्थकों का मानना ​​है कि यह दूसरे खंड से मेल नहीं खाता है, जो यह इंगित करने में ‘अव्यावहारिक’ है कि अभी भी बहुत काम किया जाना बाकी है, क्योंकि अधिकांश लाभ अभी भी आय पिरामिड के शीर्ष तक ही सीमित है – एक वास्तविकता जो शेयर बाजार में भागीदारी में वृद्धि के बावजूद सच है।

विकसित भारत उस नागरिक-उन्मुख दृ​ष्टिकोण को उभारता है, जिसे ‘या तो/या’ जैसी बेकार की बातों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। भारत का जैसा कद है, उस हिसाब से बहुत सी विरोधाभासी बातें सच भी हैं और उतनी ही महत्त्वपूर्ण भी। जैसे हमारी शानदार विश्व रैंकिंग पर जीत का दावा करने का अधिकार, सच्चाई यह है कि वे समग्र विकास के लिए मान्य हैं, प्रति व्यक्ति की तरक्की के लिए नहीं, और यह अनिवार्यता कि बड़ी संख्या में लोगों का जीवन स्तर सुधारने के साथ-साथ सतत विकास के लिए तैयार रहने का दृ​ष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।

इसमें रोशनी की जो किरण दिखती है वह यह कि भारत को अपने सभी नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार लाने और उनकी क्षमता का सही दिशा में इस्तेमाल करने के लिए क्या-क्या करना चाहिए। यह हमें इस बात को याद दिलाता है कि आ​र्थिक तरक्की की यात्रा में हमारी जनसंख्या कोई बोझ नहीं है, ब​ल्कि इस सफर में हमारे लोग बहुत महत्त्वपूर्ण हैं और उन्हें भी इस विकास यात्रा में साथ चलना और नेतृत्व करना चाहिए।

प्रतिस्पर्धी दुनिया में आ​र्थिक रैंकिंग वास्तव में वै​श्विक निवेश का बड़ा हिस्सा हासिल करने का अच्छा पैमाना है, लेकिन यहां कोई विरोधाभास नहीं है। रणनीतिक गुरु केनिचि ओहमाए की मानें तो अपने प्रतिस्पर्धी को हराना कोई बड़ी रणनीतिक जीत नहीं मानी जाती, ब​ल्कि ग्राहकों को गुणवत्तापरक सेवाएं देना और प्रतिस्पर्धा की जंग से बचकर आगे बढ़ जाना ही सही मायने में अच्छी रणनीति या जीत होती है। इसलिए यदि हम इस रणनीति पर चलते हुए हर वर्ष थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ते हुए 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल कर लेते हैं तो बाकी चीजें अपने आप दुरुस्त होती चली जाएंगी। दुनिया हमारे दरवाजे पर दस्तक देगी और सत्ता समीकरण कहीं अ​धिक संतुलित होंगे।

इस प्रकार के दृ​ष्टिकोण और उच्च स्तरीय रणनीति ऐसी चीजें हैं, जिन्हें लागू करने से ही परिणाम हासिल हो सकते हैं। लेकिन, यह दृ​ष्टि पत्र ‘शुरुआत अच्छी तो आधा काम हो गया समझो’ वाली कहावत को सच साबित करता है। यह सफलता के लिए एक ही रास्ते पर चलने वाले दृ​ष्टिकोण को मानने वाले लोगों को प्रोत्साहित कर सकता है और सभी लोगों को एक ही सपने को पूरा करने के लिए एकजुट करने के लिए प्रेरित कर सकता है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिल जाएंगे जब विजन स्टेटमेंट ने किसी देश की सोच को बदलकर रख दिया।

इसका एक उदाहरण पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी रहे, जिनके सुधारों के दृ​ष्टिकोण और समावेशी विकास की अवधारणा ने देशवासियों के खुद के सोचने का तरीका ही बदल दिया। उन्होंने लोगों के कल्याण पर ध्यान केंद्रित करते हुए कहा था, ‘हम विकास यात्रा को आगे बढ़ाएंगे और इसमें गरीबों और वंचित लोगों के लिए नए अवसर पैदा करेंगे, ताकि वे भी इस सफर में भागीदार बन सकें।’

आज जो चीज पहले से ​भिन्न है, वह यह कि विकसित भारत अपनी संघर्ष यात्रा में विशेष रणनीति के रूप में कमजोर वर्गों के लिए नए अवसर उपलब्ध नहीं कर रहा है। यह लोगों की क्षमता विकास कर उन्हें सक्षम बनाने की पेशकश कर रहा है, ताकि गरीब तबके को आर्थिक विकास के लिए जरूरी सभी अवसर उपलब्ध हो सकें।

अच्छी बात यह है कि यह विकसित भारत के अतीत के नारों की तुलना में कहीं अधिक ठोस है और सफलता की तस्वीर वास्तु​शिल्प के चित्रण से कहीं अ​धिक स्पष्ट दिखती है। दूसरी ओर, चिंताजनक खबर यह है कि हम विकसित भारत के सफर में जो शुरुआती दृ​ष्टिकोण देख रहे हैं, उसमें सरकार आम जनता पर अ​धिक दबाव डालती और कहती दिख रही है कि वे विकसित भारत के लिए क्या कर सकते हैं?

इस दृ​ष्टिकोण में इस तथ्य की कमी झलक रही है कि विकसित भारत अपने नागरिकों के लिए क्या कर सकता है? ऐसा लगता है कि विकसित भारत का नारा और उस दिशा में लागू होने वाली योजनाओं में देश अपने युवाओं को नई संकल्पनाओं में ढालने के लिए प्रेरित करने के बजाय उन्हीं पुराने, थके-हारे, खराब ढंग से काम करने वाले शैक्षणिक संस्थानों के साथ उनका दोहन करना चाहता है। देशवासियों ने हमेशा से ही कम पर संतुष्ट होने के बजाय अधिक के लिए संघर्ष किया है। यही वह भावना है, जो विकसित भारत का सपना साकार कर सकती है।

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First Published - December 2, 2024 | 9:49 PM IST

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