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Editorial: ट्रंप का बहुपक्षीय संस्थाओं से हटना, वैश्विक व्यवस्था का विखंडन

अतीत में उनके प्रशासन ने अमेरिका को जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते जैसे ढांचों से बाहर निकाला है, संयुक्त राष्ट्र सहित अंतरराष्ट्रीय बकायों का भुगतान रोका है

Last Updated- January 09, 2026 | 10:13 PM IST
Donald Trump on Venezuela Oil Business

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप कुछ मामलों में हमेशा स्पष्ट रहे हैं। उनके दृष्टिकोण में बहुपक्षीय मंच अमेरिका की संप्रभुता को कमजोर करते हैं और सीधे उनके ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ के एजेंडे से टकराते हैं। इसी सोच के चलते उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से बाहर निकलने का निर्णय लिया, जिनमें से अनेक संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था के अंतर्गत आते हैं। अतीत में उनके प्रशासन ने अमेरिका को जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते जैसे ढांचों से बाहर निकाला है, संयुक्त राष्ट्र सहित अंतरराष्ट्रीय बकायों का भुगतान रोका है, और विश्व व्यापार संगठन को प्रभावी रूप से पंगु बना दिया है। लेकिन उनकी नवीनतम कार्रवाई इससे भी आगे बढ़ गई है।

गौर करने की बात है कि अमेरिका हमेशा से कई बहुपक्षीय मंचों में अपेक्षाकृत अनिच्छुक प्रतिभागी रहा है। अमेरिका की राजनीति में एक गहरी संयुक्त राष्ट्र-विरोधी प्रवृत्ति रही है, जिसमें ‘ब्लैक हेलीकॉप्टरों’ के जरिये संयुक्त राष्ट्र की सेनाओं के असहाय ग्रामीण अमेरिकियों पर हमला करने की निराधार अफवाहें शामिल रही हैं। यह षड्यंत्रकारी दुनिया का एक स्थायी हिस्सा है जिसने ट्रंप के आंदोलन को जन्म दिया। इसके अलावा, मुख्यधारा के अमेरिकी राजनेता भी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय जैसे संगठनों में शामिल होने में सतर्क रहे हैं, यह मानते हुए कि यह अमेरिका में असंवैधानिक होगा या उसकी संप्रभुता को छीन लेगा।

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इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो ट्रंप केवल अमेरिकी राजनीति की एक मौजूदा धारा को एक कदम आगे बढ़ा रहे हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि राष्ट्रपति जो बाइडन ने पेरिस समझौते में दोबारा प्रवेश तो किया, लेकिन उदाहरण के लिए, उन्होंने अपने पूर्ववर्ती द्वारा विश्व व्यापार संगठन को पहुंचाए गए नुकसान को ठीक करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।

ऐसे में इस नवीनतम बदलाव का विश्लेषण केवल ट्रंप की विदेशियों के प्रति जाहिर नापसंदगी से अधिक गहराई में जाकर किया जाना चाहिए। इस सूची में कुछ संगठन ऐसे हो सकते हैं जिन्हें निष्क्रिय या अपेक्षाकृत निरर्थक माना जा सकता है, लेकिन अन्य निश्चित रूप से ऐसा नहीं हैं। उदाहरण के लिए, संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा समझौता (यूएनएफसीसीसी) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु कार्रवाई में सहयोग के लिए एक बुनियाद की तरह है।

इससे पूर्ण रूप से बाहर निकलना, साथ ही जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी समिति (आईपीसीसी) से भी, जो वैज्ञानिकों द्वारा देखे गए वैश्विक ऊष्मीकरण के वास्तविक प्रभावों पर सारांश रिपोर्ट तैयार करती है, उन वैश्विक प्रयासों के लिए एक बड़ा झटका है, जिनका उद्देश्य औसत तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना है। कुछ छोटे संगठन, उदाहरण के लिए महिला और बाल स्वास्थ्य पर काम करने वाले संगठन ट्रंप के इस निर्णय के परिणामस्वरूप पूरी तरह से वित्तीय सहायता से वंचित हो सकते हैं। इस खोई हुई क्षमता और फंडिंग की भरपाई करने का बड़ा बोझ यूरोपीय संघ और अन्य विकसित देशों पर पड़ेगा।

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बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका का यह पीछे हटना इन संगठनों और उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की वैधता को भी प्रभावित करेगा, जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं। फिलहाल ऐसा प्रतीत नहीं होता। ट्रंप अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को पुनः आकार देने और पुनर्गठित करने की कोशिश कर सकते हैं ताकि अमेरिका की प्रधानता को अधिक प्रत्यक्ष रूप से बनाए रखा जा सके। लेकिन अब तक उनकी कार्रवाइयां पूरी तरह विध्वंसकारी रही हैं। वे वैश्विक शासन को कमजोर कर सकती हैं, परंतु मौजूदा व्यवस्थाओं की वैधता को नहीं मिटातीं।

यदि वह वास्तव में एक कट्टरपंथी हैं, तो उन्हें एक प्रभावशाली वैकल्पिक कथा प्रस्तुत करनी होगी जिसमें फंडिंग और अन्य प्रतिबद्धताएं भी शामिल हों। ऐसा होता नहीं दिखता। स्पष्ट परिणाम यह होगा कि समय के साथ चीन उस भूमिका को निभाने के लिए आगे आएगा जिसे अमेरिका ने छोड़ दिया है। दूसरे शब्दों में, ट्रंप अमेरिका की संप्रभुता को मजबूत नहीं कर रहे हैं, बल्कि उसकी प्रधानता अपने सबसे बड़े रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी को सौंप रहे हैं।

First Published - January 9, 2026 | 10:02 PM IST

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