केंद्र सरकार वित्त वर्ष 2027 के केंद्रीय बजट में ऋण वसूली पंचाट (डीआरटी) के अधिकार क्षेत्र और कार्यभार को नए सिरे से परिभाषित करने के लिए ऋण वसूली और दिवाला अधिनियम, 1993 को संशोधित करने का प्रस्ताव कर सकती है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के अनुसार इससे कुछ डीआरटी ज्यादा मूल्य वाले मामलों पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगे। इस तरह फंसे कर्ज की वसूली में तेजी आएगी और पंचाट पर कम मूल्य के मामलों का बोझ कम होगा।
उक्त अधिकारी ने कहा, ‘प्रस्तावित बदलाव के तहत केंद्र सरकार को एक या अधिक डीआरटी को विशेष रूप से निर्दिष्ट राशि से अधिक के ऋणों से जुड़े आवेदनों को निपटाने के लिए विशिष्ट अधिकार दिया जाएगा।’
फिलहाल सरकार डीआरटी के क्षेत्राधिकार को परिभाषित कर सकती है मगर कानून उसे स्पष्ट तौर पर 20 लाख रुपये से ज्यादा मूल्य कीमत वाले मामलों के लिए पंचाट तय करने की इजाजत नहीं देता है।
इस बारे में जानकारी के लिए वित्त मंत्रालय को ईमेल किया गया मगर खबर लिखे जाने तक जवाब नहीं आया।
अधिकारी ने कहा, ‘यह संशोधन हमें उच्च मूल्य की वसूली के मामलों को नामित पंचाट में भेजने की अनुमति देगा ताकि पीठासीन अधिकारी विशेष रूप से बड़े फंसे ऋण पर ध्यान केंद्रित कर सकें और उनका तेजी से निपटारा कर सकें।’
यह कदम डीआरटी में बढ़ते लंबित मामलों के बीच आया है। आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि अधिकांश मामले अपेक्षाकृत कम मूल्य के हैं मगर इससे पूरी प्रणाली पर बोझ बढ़ जाता है।
लगभग 77 फीसदी लंबित मामलों में 20 लाख रुपये से 1 करोड़ रुपये के बीच की राशि शामिल है जबकि कुल मामलों में 100 करोड़ रुपये से ऊपर के मामले महज 0.6 फीसदी हैं। हालांकि इनकी संख्या भले ही कम हो मगर कुल फंसी राशि में ऐसे मामलों की हिस्सेदारी 69 फीसदी है।
अधिकारी ने कहा कि उच्च मूल्य के मामले संख्या में कम हैं लेकिन इनमें मुकदमेबाजी में फंसे धन का अधिकांश हिस्सा है। इन मामलों के तेजी से समाधान से वसूली के परिणामों में काफी सुधार हो सकता है और ताजा ऋण देने के लिए पूंजी मुक्त हो सकती है।’
सरकारी अधिकारी ने कहा कि सरकार धारा 36 से संबंधित संशोधन का भी प्रस्ताव कर सकती है, जिसके तहत नए खंड शामिल किए जा सकते हैं।
इससे सरकार वसूली कार्यवाही के लिए एक समान नियम बनाने के साथ-साथ वसूली अधिकारी के आदेशों के खिलाफ पंचाटों के समक्ष अपील दायर करने के लिए शुल्क निर्धारित करने में भी सक्षम हो सकेगी।
वर्तमान में विभिन्न न्यायालयों में वसूली प्रक्रियाओं में एकरूपता का अभाव है, जिससे प्रक्रियात्मक चुनौतियां और मुकदमेबाजी होती है। एकसमान नियम स्पष्टता लाएंगे और अनावश्यक कानूनी जटिलता से बचा जा सकेगा।
एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव धारा 22 ए में संशोधन करना है ताकि केंद्र को न केवल डीआरटी और ऋण वसूली अपील पंचाट के लिए एक समान वसूली प्रक्रिया तय करने का अधिकार मिलेगा बल्कि वसूली अधिकारियों के लिए भी नियम निर्धारित करने में मदद मिलेगी। अधिकारियों ने कहा कि इस स्पष्टीकरण का उद्देश्य आयकर अधिनियम, 1961 और संबंधित नियमों के प्रावधानों के विरोधाभासी व्याख्या से बचना है।
सरकार एक नई धारा 22 बी भी शामिल करने की योजना बना रही है, जिसके तहत ऋण वसूली अपील पंचाट के आदेश के खिलाफ अपील केवल सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दायर की जा सकती है, जिससे अपील ढांचा दिवाला और ऋण शोधन अक्षमता संहिता के अनुरूप हो जाएगा।
कर्ज लेने वाले अक्सर उच्च न्यायालयों में जाकर स्थगन आदेश प्राप्त कर लेते हैं जिससे वसूली कार्यवाही में देर होती है। अधिकारी ने कहा, ‘यह फोरम ऐसे अनावश्यक अपील को हतोत्साहित करेगा जो वर्षों तक वसूली को रोकती हैं।’
प्रस्तावित संशोधन धारा 4(2) के तहत केंद्र की शक्तियों को भी स्पष्ट करना चाहते हैं ताकि एक डीआरटी के अतिरिक्त प्रभार को दूसरे डीआरटी के पीठासीन अधिकारी को सौंपा जा सके और इस तरह रिक्तियों या लंबी छुट्टी के मामले में काम की निरंतरता में सुधार हो सके।