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बैकिंग संकट एवं उनके समाधान

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Last Updated- April 06, 2023 | 10:29 PM IST
SVB Crisis: Nazara Tech transferred $7.25 million from SVB to other bank accounts

बैंकिंग संकट के समाधान के लिए अमेरिका सरकार के शीघ्र उठाए गए कदमों से भारत को सीख लेकर विफल वित्तीय कंपनियों के समाधान पर अधूरी नीतिगत पहल पूरी करनी चाहिए। बता रहे हैं के पी कृष्णन

सिलिकन वैली बैंक (एसवीबी) और कुछ अन्य बैंकों के धराशायी होने के बाद वित्तीय आर्थिक नीति में बेहतर विधियों और संस्थानों की जरूरत पर सबका ध्यान गया है। एसवीबी और दूसरे कुछ बैंकों के साथ जो हुआ वह बैंकों के मुश्किलों में घिरने की पहली घटना नहीं है।

हमें बैंकों के संकट को सूक्ष्मता से समझने में डगलस वी डायमंड और फिलिप एच डीविग के इस विषय पर शोध कार्यों से बड़ी मदद मिली है। इन दोनों ने 1983 में बैंकों की बुनियादी बातों का गहराई से अध्ययन किया। उनके इस कार्य के लिए उन्हें 2022 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

बैंक ग्राहकों की नकद रकम के संरक्षक समझे जाते हैं। इसके बदले बैंक ग्राहकों की रकम का इस्तेमाल करते हैं। वे इस रकम का निवेश करते हैं और आय अर्जित करते हैं। मगर इस प्रक्रिया में रकम कुछ अवधि तक के लिए अटक जाती है जिन्हें तत्काल निकाल पाना मुमकिन नहीं होता है।

सामान्य परिस्थितियों में यह धन सृजन का अच्छा तरीका हो सकता है मगर सभी ग्राहक जब घबराकर एक ही समय रकम निकालने पर आमादा हो जाते हैं तो इससे संकट की स्थिति पैदा हो जाती है।

प्रोफेसर डायमंड के शब्दों में हालत कुछ यूं हो जाती है कि लोग डर के डर से डरने लगते हैं। बैंकों में आंतरिक स्तर पर रकम की उपलब्धता सदैव नहीं होती है, वहीं ग्राहकों द्वारा रकम अचानक निकालने की आशंका हमेशा बनी रहती है। एक पेचीदा स्थिति भी कभी-कभी बैंकों के लिए विपरीत परिस्थितियों को जन्म दे देती है।

बैंकों पर आई आफत साधारण जमाकर्ताओं-किसान, पेंशनधारक, अनुबंध पर काम करने वाले कामगारों-के लिए काफी व्यवधानकारी होते हैं जिन्हें उनके मोबाइल फोन के जरिये भुगतान किया जाता है। वे बैंकों के धराशायी होने की बात गहराई से नहीं समझ सकते और न ही उनसे ऐसी अपेक्षा की जा सकती है। इस समस्या से निपटने के लिए सरकारों के पास एक त्रि-आयामी ढांचा है।

इनमें सबसे पहले समझ-बूझ के साथ नियमन तैयार कर बैंकों के धराशायी होने के जोखिम को कम किया जाता है। दूसरे उपाय के तौर पर केंद्रीय बैंक बैंकों के लिए अंतिम विकल्प के रूप में काम करता है। तीसरे उपाय के तौर पर बैंकों के लिए विशेष दिवालिया ढांचा होता है जो तेजी से काम करता है और साधारण जमाकर्ताओं को उनकी जमा रकम पर बीमा सुविधा देता है।

अमेरिका में भी वित्तीय आर्थिक नीति के कई हिस्सों में कुछ खामियां हैं मगर अधिकांश विशेषज्ञों की नजर में वहां बैंकों के धराशायी होने के बाद समाधान प्रणाली उच्च स्तरीय मानी जाती है। अमेरिका में बैंकों के हालिया संकट में जो एक बात निकल कर आती है वह है फेडरल डिपॉजिट्स इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन (एफडीआईसी) द्वारा जमाकर्ताओं के लिए त्वरित समाधान खोज निकालना।

पाठकों को याद होगा कि मार्च 2023 के पहले सप्ताह में जब एसवीबी ने अतिरिक्त पूंजी जुटाने की घोषणा की तो उसके बाद रकम निकालने के लिए जमाकर्ताओं का तांता लग गया। उसी सप्ताहांत एफडीआईसी ने एक नया बैंक तैयार किया जिसमें एसवीबी की सभी जमा रकम अंतरित कर दी गई। इसके बाद एफडीआईसी ने घोषणा की कि सोमवार सुबह से सभी बीमित जमाकर्ताओं को उनकी बीमित जमा रकम तक पूरी पहुंच सुनिश्चित हो जाएगी। एसवीबी की सभी शाखाएं सोमवार को इन घोषणाओं का पालन करने के लिए खुल गईं।

हम एक ऐसे बैंक का जिक्र कर रहे हैं जिसकी परिसंपत्ति 0.2 लाख करोड़ डॉलर यानी 40 लाख करोड़ रुपये थी। यह अमेरिका के इतिहास में किसी बैंक के धराशायी होने की दूसरी बड़ी घटना थी। इतना ही नहीं, एफडीआईसी ने एक ही साथ एक नहीं बल्कि दो बैंकों के लिए समाधान खोज निकाले। इनमें दूसरा सिग्नेचर बैंक था जो अमेरिका के इतिहास में धराशायी होने वाला तीसरा बैंक बन गया।

बैंकों को संकट से निकालने के लिए अमेरिकी सरकार ने जिस तरह फूर्ति से कदम उठाया वह एक ऐसी क्षमता को दर्शाता है जिसके दम पर कोई विकसित अर्थव्यवस्था काम करती है। हमें इस बात को ध्यान में रखते हुए भारत को संपन्नता और महानता के मार्ग पर ले जाने के लिए प्रयास करना चाहिए।

अमेरिकी सरकार के कदम का वहां के करदाताओं पर कोई बोझ नहीं पड़ा। अंशधारक, प्रबंधक और कुछ पेशेवर ऋणदाताओं को नुकसान हुआ। धराशायी हुए बैंकों में प्रबंधन स्तर के अधिकारी हटा दिए गए। एक बात को लेकर जरूर चिंता है कि अमेरिकी एफडीआईसी ने एसवीबी में जमा सभी रकम की रक्षा करने के लिए अपनी सीमा पार कर गया।

एफडीआईसी ने 2.50 लाख डॉलर तक की सुरक्षा का वादा किया। यह आंकड़ा अमेरिका के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद का करीब 3.5 गुना है। इससे इस बात का जोखिम पैदा हो गया है कि सभी बैंक जमाकर्ता के दिमाग में यह बात जगह बना लेगी कि उनकी रकम पूरी तरह सुरक्षित है।

अमेरिका के नीति निर्धारक सावधानी से स्थिति स्पष्ट करने के लिए काम कर रहे हैं। वे यह कह रहे हैं कि सभी जमाकर्ता सुरक्षित नहीं हैं और किसी एक बैंक में 2.5 लाख करोड़ डॉलर रकम रखने वाले लोगों को संबंधित बैंक की मजबूती का आकलन स्वयं भी करना चाहिए।

भारत में हमें ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए काफी काम करना होगा। भारत में जब बैंक मुश्किल परिस्थितियों में आते हैं तो जमाकर्ता लंबे समय तक फंसे रह सकते हैं या फंसे रहे हैं। उदाहरण के लिए मार्च 2020 में दो सप्ताहों तक येस बैंक के सभी जमाकर्ताओं के लिए विलय योजना पूरी होने तक 50,000 रुपये निकासी की सीमा तय थी।

रणनीतिक स्तर पर कंपनियां दो तरह से असफल होती हैं। पहली स्थिति तब बन सकती है जब कम अनुभवी ग्राहकों वाली कोई वित्तीय कंपनी होती है। दूसरी स्थिति में ‘शेष अन्य’ बातें आती हैं। इस ‘शेष अन्य’ की सुरक्षा के लिए वर्ष 2016 में दिवालिया एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) पेश की गई।

आईबीसी की तरह प्रक्रिया कुछ वित्तीय कंपनियों जैसे गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के लिए ठीक ढंग से काम कर सकती है। इन इकाइयों के पास घरेलू जमा नहीं होती हैं। मगर गैर-अनुभवी जमाकर्ताओं के मामले में एक विशेष व्यवस्था की दरकार है। कई कारणों से उपयुक्त नियमन और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के सही उपायों के बावजूद बैंक सहित वित्तीय कंपनियां विफल हो सकते हैं।

महत्त्वपूर्ण बात यह सुनिश्चित करना है कि धराशायी बैंकों को बंद करने की प्रक्रिया समुचित ढंग से हो और तंत्रगत स्थिरता बनाए रखने के साथ ग्राहकों के हितों की रक्षा की जाए। यह भी ध्यान रखा जाए कि इसके लिए करदाताओं की रकम पर सरकार या नियामक निर्भर नहीं हो।

मानक आईबीसी प्रक्रिया सामान्यतः उन वित्तीय कंपनियों के लिए उपयुक्त नहीं होती हैं जिनके ग्राहक सीधे-साधे होते हैं। ऐसी प्रक्रियाओं में समय लगता है। इसमें होने वाली देरी उपभोक्ताओं की रकम और तंत्रगत व्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर सकती है। किसी वित्तीय कंपनी के मुश्किलों में फंसने की आशंका भर से ग्राहकों में घबराहट पैदा हो सकती है। लिहाजा, सक्षम लोगों से लैस एक व्यवस्था तैयार करना जरूरी है ताकि वित्तीय कंपनियों को व्यवस्थित एवं पारदर्शी ढंग से संकट से निकाला जा सके।

लगभग एक दशक पहले वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग ने सबसे पहले एक विशेष समाधान निगम स्थापित करने का सुझाव दिया था। इस सुझाव के बाद मसौदा कानून भी तैयार हो गया था। वित्तीय संस्थानों के लिए समाधान व्यवस्था तैयार करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने एक उच्च-स्तरीय समूह का भी गठन किया था। इस व्यवस्था ने भी विशेष समाधान व्यवस्था के प्रस्ताव का मोटे तौर पर समर्थन किया था।

इन सुझावों को ध्यान में रखते हुए वित्त मंत्रालय की समिति ने वित्तीय समाधान एवं जमा बीमा (एफआरडीआई) विधेयक का मसौदा तैयार किया। सरकार ने अगस्त 2017 में संसद में एफआरडीआई विधेयक पेश किया। मगर सरकार ने पुनर्विचार के लिए यह विधेयक वापस ले लिया।

यह भारत के वित्तीय एजेंसी संरचना में एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है जिसकी आवश्यकता महसूस की जा रही है। वर्तमान परिस्थितियों में हमें एक ऐसे सरकारी संगठन की जरूरत है जो विफल वित्तीय इकाइयों की समस्याओं का त्वरित समाधान कर पाएगा।

(लेखक सीपीआर में मानद प्राध्यापक और पूर्व अफसरशाह हैं।)

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First Published - April 6, 2023 | 10:29 PM IST

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