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समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाला मिथिलांचल बदहाल: उद्योग धंधे धीरे-धीरे हो गए बंद, कोई नया निवेश आया नहीं

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मिथिलांचल के पुराने उद्योग बंद हो गए, स्थानीय लोग रोजगार के लिए दूर राज्यों में जाते हैं, सरकारी योजनाओं ने कुछ मदद दी, लेकिन विकास अधूरा है

Last Updated- October 23, 2025 | 11:15 PM IST
Mithilanchal

कभी अपनी शानदार सांस्कृतिक विरासत का दम भरने वाला बिहार का सबसे विशिष्ट क्षेत्र मिथिलांचल आज बेहद खराब स्थिति में है। इसकी समृद्धि का बखान शब्दों में करना मुश्किल है। मध्ययुगीन कवि विद्यापति के इस भाषा में लिखे गीत हों या नागार्जुन की समकालीन क्रांतिकारी कविताएं, मैथिली भाषा की समृद्धि का आईना हैं। इसी क्षेत्र में जन्मे मशहूर कवि नागार्जुन की कविता ‘अकाल और उसके बाद’ सिर्फ आठ पंक्तियों की है, लेकिन भूख की स्थिति को जीवंत रूप से दर्शाती है। मधुबनी शैली की चित्रकला पूरी दुनिया में विख्यात है और यहां के अनुष्ठान एवं लोक-कथाओं का अभिन्न हिस्सा है। यहां ध्रुपद के रूप में अपनी विशिष्ट शास्त्रीय संगीत शैली भी है। काफी हद तक दरभंगा के महाराजा जैसे लोगों द्वारा निवेश के बल पर इसने यह तरक्की का रास्ता पकड़ा, लेकिन धीरे-धीरे सब बरबाद होता गया।

दरभंगा रेलवे स्टेशन तक पैदल यात्रा यहां की कहानी का एक हिस्सा बयां करती है। 40 वर्षीय विजय महतो अभी-अभी दरभंगा रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से उतरे हैं। वह पंजाब के अमृतसर में कृषि श्रमिक के रूप में काम करते हैं। भीड़ में तेजी से चलते हुए वह कहते हैं, ‘छठ का त्योहार है, इस मौके पर मैं घर से दूर नहीं रह सकता। घर-परिवार की याद तो बहुत आती है, लेकिन मजबूरी है। मुझे जल्द ही लौटना पड़ेगा। कुछ दिनों में रबी सीजन की बोआई शुरू हो जाएगी। यदि मैं समय पर नहीं पहुंचा तो मेरी जगह वे किसी और को नौकरी पर रख लेंगे।’

दरभंगा रेलवे स्टेशन पंजाब, महाराष्ट्र, दिल्ली और अन्य राज्यों से घर लौट रहे ऐसे ही लोगों से खचाखच भरा है। ये सब प्रवासी हैं, जो काम की तलाश में घर से दूर जाते हैं और अपने तीज-त्योहारों पर वापस आते हैं।

दरभंगा में लगभग चार साल पहले एक हवाई अड्डा बना था। इस त्योहारी सीजन में एक यात्री ने नाम नहीं उजागर करने की शर्त पर कहा कि उसने मुंबई से एक तरफ के टिकट के लिए 53,000 रुपये चुकाए हैं। इस हवाई अड्डे तीन एयरलाइनों की उड़ानें दिल्ली और मुंबई के लिए संचालित होती हैं। लेकिन हवाई मार्ग से बेंगलूरु या हैदराबाद जाना मुश्किल है। इसी तरह स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के प्रमुख केंद्र जयपुर या सूरत के लिए भी कोई सीधी उड़ान नहीं है।

इलाके में आधार कार्ड में सुधार, जाति प्रमाण पत्र बनवाने जैसी कई सरकारी और गैर सरकारी सेवाएं मुहैया कराने वाले दुकानदार रामेश्वर झा कहते हैं, ‘दरभंगा ही क्या, वास्तव में पूरा मिथिलांचल न इधर का है, न उधर का।’ वह विधान सभा चुनाव में संभावित उम्मीदवारों के लिए संगीत कैसेट रिकॉर्ड करने की तकनीकी विशेषज्ञता भी रखते हैं।

अपनी बिक्री के बारे में पूछे जाने पर वह विनम्रता से कहते हैं, ‘मेरा गुजारा हो जाता है।’ यह सच है कि इस क्षेत्र में नाममात्र का भी कोई उद्योग नहीं है। जो उद्योग पहले थे भी, वे अब धीरे-धीरे बंद हो गए। दरभंगा राज ने 1958 में यहां अशोक पेपर मिल्स की शुरुआत की थी। उत्तरी बिहार में यह सबसे शुरुआती निजी उद्यमों में से एक था। इसे किसानों से अधिग्रहित भूमि पर इस उम्मीद के साथ स्थापित किया गया था कि इलाके में रोजगार के अवसर पैदा होंगे। यह पेपर मिल ज्यादा दिन नहीं चली और 1973 में बंद हो गई। राष्ट्रीयकरण सहित इसे पुनर्जीवित करने के सभी प्रयास बेकार साबित हुए। यदि यह इकाई चालू हो जाए तो यहां कम से कम 1000 लोगों को रोजगार मिल सकता है। कई चीनी मिलें भी बंद पड़ी हैं, जो स्थानीय स्तर पर रोजगार का बड़ा स्रोत होती हैं।

पूरे क्षेत्र में निराशा का माहौल दिखता है। लेकिन इस निराशा के बीच स्थानीय लोग आसानी से यह भी स्वीकार करते हैं कि सरकारी योजनाओं ने काफी मदद की है। शहर की सड़कों पर गहरे गड्ढों से गुजरते हुए एक जर्जर ऑटो रिक्शा चलाने वाले रमेश कहते हैं कि उनके परिवार को मुफ्त भोजन और मुफ्त बिजली की सुविधा मिलती है। उन्हें उम्मीद है कि उनके घर की महिलाओं को 10,000 रुपये का अनुदान मिलेगा, जिसकी घोषणा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पिछले महीने की थी। इसके तहत मेरे कई पड़ोसियों को रकम मिल चुकी है।

राजनीति पर सवाल होता है तो वह तपाक से कहते हैं, ‘नीतीश कुमार हवा का रुख भांप लेते हैं, लेकिन कुछ योजनाओं का लाभ उनके जैसे परिवारों को मिला है।’

रमेश का गुस्सा निचले स्तर की नौकरशाही और भ्रष्टाचार के खिलाफ उजागर होता है। वह कहते हैं, ‘मैंने घर बनाने को सरकारी अनुदान लेने के लिए अपने कागजात जमा किए थे। अधिकारी ने पास कराने के लिए 20,000 रुपये मांगे। मैंने देने से मना कर दिया। इसके बाद मैंने अपने भतीजे से ऑनलाइन फार्म भरवाया। इसमें अधिक समय लगेगा। लेकिन कम से कम मुझे रिश्वत तो नहीं देनी पड़ेगी।’ ऐसा नहीं है कि मिथिलांचल में कोई विकास हुआ ही नहीं। सड़कें बनी हैं। रेलवे और हवाई संपर्क है। बिहार की अर्थव्यवस्था 2011-12 के बाद से 3.5 गुना बढ़ी है। मिथिलांचल को भी इसका लाभ मिला है। लेकिन यह इलाका अभी भी कृषि पर ही निर्भर है। यह बदलाव के लिए छटपटा रहा है लेकिन अपने दम पर बहुत कुछ कर भी नहीं सकता।

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First Published - October 23, 2025 | 10:04 PM IST

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