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हिमाचल का मुख्यमंत्री बनने के 6 माह बाद ही प्राकृतिक आपदा आई

उन्हें नहीं पता था कि सरकार गठन के महज छह महीने के भीतर उन्हें राज्य में पिछले 100 साल की सबसे भयंकर प्राकृतिक आपदा से निपटना होगा।

Last Updated- December 22, 2024 | 10:23 PM IST
Himachal Pradesh's monsoon devastation caused a loss of Rs 8,000 crore, CM Sukhu sought relief from the Center

सुखविंदर सुक्खू दिसंबर 2022 में हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार का नेतृत्व करते हुए मुख्यमंत्री बने। उन्हें नहीं पता था कि सरकार गठन के महज छह महीने के भीतर उन्हें राज्य में पिछले 100 साल की सबसे भयंकर प्राकृतिक आपदा से निपटना होगा। उसमें 400 से अधिक लोगों की जान चली गई, संपत्ति का भारी नुकसान हुआ और चिकित्सा सहायता की सीमित उपलब्धता जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा जबकि हिमाचल प्रदेश तमाम वित्तीय समस्याओं से पहले ही जूझ रहा था।

सुक्खू जब मुख्यमंत्री बने थे तो वह कई आइडिया लेकर आए थे। उनका नारा था ‘व्यवस्था परिवर्तन’ यानी संस्थागत बदलाव करना। उन्होंने पिछले दो सालों के दौरान अपने कई आइडिया पर अमल करने कोशिश की है। मगर उन सब का नतीजा ‘व्यवस्था परिवर्तन’ के रूप में सामने नहीं आया, बल्कि उसके साथ कई अन्य समस्याएं भी खड़ी हो गईं। पानी के मुद्दे को ही लेते हैं। सुक्खू का मानना था जिस प्रकार कोयला समृद्ध राज्यों ने उसे भुनाकर कमाई की है, उसी तरह हिमाचल प्रदेश को भी अपने जल संपदा के बारे में सोचना चाहिए।

सरकार का मानना था कि जल उपकर अधिनियम के जरिये सालाना करीब 2,000 करोड़ रुपये की कमाई हो सकती है। इसके तहत बिजली उत्पादन कंपनियों द्वारा जल के इस्तेमाल पर उपकर लगाने का विचार है। मगर उच्च न्यायालय ने उनके इस विचार को खारिज कर दिया है। हिमाचल प्रदेश कैडर के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी दीपक सानन ने कहा कि सुक्खू सरकार से उम्मीदें काफी अधिक थीं लेकिन सरकार महज आंशिक उम्मीदें ही पूरी कर पाई है।

सानन ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘दूध के लिए एमएसपी का विचार बिल्कुल भी कारगर नहीं हो सकता। कोई भी 100 रुपये प्रति लीटर दूध नहीं खरीदेगा। पंजाब से काफी मात्रा में दूध आ रहा है जो राज्य सरकार द्वारा दी जा रही कीमतों को कम कर रहा है।’

सानन ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की मौजूदा स्थिति के मद्देनजर वहां सरकार ही सबसे बड़ी नियोक्ता है। सार्वजनिक वितरण को बेहतर बनाने और राज्य सरकार के कर्मचारियों को नए सिरे से प्रशिक्षित करते हुए प्रशासन को बेहतर किया जा सकता है। उन्होंने इस संबंध में राज्य सरकार को एक रिपोर्ट देने के लिए कहा था। मगर अब तक उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

उधर सरकार ने अक्टूबर में एक अधिसूचना जारी कर विभागों को निर्देश दिया था कि दो साल से अधिक समय से रिक्त पदों को समाप्त कर दिया जाए। इससे राज्य में हंगामा मच गया और विपक्षी पार्टी भाजपा ने नौकरियों में कटौती के खिलाफ सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया। ऐसे में सुक्खू को उस अधिसूचना में संशोधन करने के लिए मजबूर होना पड़ा। सानन ने कहा कि कम अनुभव होने के बावजूद सुक्खू के कुछ विचार अच्छे थे। मगर उन्होंने कहा कि सरकार ने भ्रष्टाचार को नजरअंदाज कर दिया और प्रशासनिक जवाबदेही पर कोई ध्यान नहीं दिया। इसके अलावा अपने शुभचिंतकों के सुझावों को नजरअंदाज करने की सुक्खू की जिद भी सरकार की उपलब्धियों को कमजोर करती है।

First Published - December 22, 2024 | 10:23 PM IST

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