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Lateral Entry: कांग्रेस शासन में आई थी लैटरल एंट्री! मोदी सरकार ने आरक्षण छीनने के विपक्ष के आरोपों को बताया कोरा पाखंड

Lateral Entry UPSC: इसका जीता जागता उदाहरण पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी हैं, जिन्हें 1971 में विदेश व्यापार विभाग में आर्थिक सलाहकार नियुक्त किया गया था।

Last Updated- August 19, 2024 | 11:14 PM IST
अफसरशाही में लैटरल एंट्री की आवश्यकता क्यों? सरकार ने 45 विशेषज्ञ पदों के लिए आवेदन मांगे Why is there a need for lateral entry in bureaucracy? Government invited applications for 45 specialist posts

Lateral Entry UPSC: लैटरल एंट्री से सरकार में शीर्ष पदों पर भर्ती की प्रक्रिया पर राजनीति गरमा गई है। ऐसी भर्तियों के लिए संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के नए विज्ञापन पर हमलावर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों को जवाब देते हुए सोमवार को सरकारी सूत्रों ने कहा कि इस योजना की शुरुआत पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने की थी, मौजूदा शासन ने केवल उसे आगे बढ़ाया है। सूत्रों के अनुसार कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के कार्यकाल के दौरान 2005 में इसके लिए द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग गठित किया गया था।

विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ने सोमवार को आरोप लगाया कि सरकार शीर्ष पदों पर लैटरल एंट्री के जरिये संघ परिवार से जुड़े लोगों को भर्ती कर वंचित तबकों के आरक्षण का हक छीन रही है। सरकारी सूत्रों ने बताया कि यह योजना मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान 2018 में औपचारिक रूप से आरंभ की गई थी। यही नहीं, द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों से प्रभावित होकर ही इसे आगे बढ़ाया गया। यह आयोग कांग्रेस नेता एम वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में गठित किया गया था। इस आयोग की 10वीं रिपोर्ट- ‘कार्मिक प्रशासन का नवीनीकरण: नई ऊंचाइयां छूना’ वर्ष 2008 में सौंपी गई थी।

आयोग ने सिविल सेवा क्षेत्र के भीतर कार्मिक प्रबंधन में सुधारों की वकालत की थी। सूत्रों ने बताया कि मोइली के नेतृत्व वाले इस आयोग ने विशेषज्ञा और विशेष कौशल की आवश्यकता वाले शीर्ष सरकारी पदों पर लैटरल एंट्री से भर्ती की सिफारिश की थी।

वर्ष 2018 में पहली बार सरकार ने लैटरल एंट्री से सरकारी भर्तियों की शुरुआत की। उस समय निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत विशेषज्ञ पेशेवरों से संयुक्त सचिव और निदेशक जैसे शीर्ष पदों पर भर्ती के लिए आवेदन मांगे गए थे। मालूम हो कि बीते शनिवार को यूपीएससी ने 45 संयुक्त सचिव, निदेशक और उप सचिवों की भर्ती का विज्ञापन निकाला था। इन पदों को लैटरल एंट्री से भरने की बात विज्ञापन में कही गई थी। इससे विवाद खड़ा हो गया और विपक्ष ने सरकार पर पिछले दरवाजे से आरक्षण खत्म करने का आरोप लगाया।

रविवार को केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने एक्स पर लिखी पोस्ट में मोइली की अध्यक्षता वाले आयोग की सिफारिशों का जिक्र करते हुए कांग्रेस के विरोध को कोरा पाखंड करार दिया। उन्होंने कहा कि आयोग ने विशेषज्ञों की जरूरत वाले क्षेत्रों में अधिकारियों की भर्ती की सिफारिश की थी।

उन्होंने कहा कि मौजूदा राजग सरकार ने उन सिफारिशों को लागू करने के लिए बहुत ही पारदर्शी तरीका अपनाया है। इससे अवश्य ही प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार होगा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि संप्रग सरकार ने लैटरल एंट्री से ऐसे अधिकारियों की भर्ती की सिफारिश की थी, जिन्हें क्षेत्र विशेष में विशेषज्ञता हासिल हो, लेकिन मोदी सरकार इसकी आड़ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लोगों को लाकर दलित, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों का अधिकार छीन रही है।

माकपा के डी राजा ने आरोप लगाया कि सरकार का यह कदम भाजपा-संघ के लोगों का शीर्ष सरकारी पदों पर कब्जा करने की रणनीति का हिस्सा है। इससे पहले सरकार ने सरकारी कर्मियों के संघ की गतिविधियों में हिस्सा लेने पर लगा प्रतिबंध हटा दिया था। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा, ‘भाजपा का राम राज्य का विरुपित संस्करण संविधान को तहस-नहस करना है और यह बहुजन से आरक्षण का हक छीनना चाहता है।’

सूत्रों का कहना है कि सरकार ने अब तक बाहरी प्रतिभाओं को शीर्ष पदों पर सलाहकार के रूप में ही लिया है, लेकिन कभी-कभी महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक भूमिकाएं भी उन्हें सौंपी गई हैं। उदाहरण के लिए मुख्य आर्थिक सलाहकार आम तौर पर बाहरी क्षेत्र से ही लिए जाते हैं। नियमानुसार इसके लिए उम्र 45 वर्ष से कम होनी चाहिए और व्यक्ति प्रसिद्ध अर्थशास्त्री होना चाहिए।

इसके अतिरिक्त कई अन्य मशहूर प्रतिभाओं को सचिव जैसे शीर्ष पद सौंपे गए हैं, लेकिन सूत्रों का कहना है कि मोइली की अध्यक्षता वाले आयोग ने सिफारिश की थी कि कुछ क्षेत्रों में विशेषज्ञता वाले अफसरों की आवश्यकता होती है, जो प्रत्येक लोक सेवक में नहीं हो सकती। इसके लिए आयोग ने निजी, सार्वजनिक या अकादमिक क्षेत्र से विशेषज्ञों की भर्ती का सुझाव दिया था। आयोग ने इसके लिए प्रतिभा पूल बनाने का प्रस्ताव भी रखा था, जिन्हें छोटी अवधि के लिए अथवा ठेके पर भी सरकार में तैनात किया जा सके। इसके अलावा इसने लैटरल एंट्री के लिए योग्यता आधारित पारदर्शी चयन प्रक्रिया अपनाने पर जोर दिया था। यही नहीं, इस प्रक्रिया से आने वाले अफसरों को जवाबदेह बनाने के लिए आयोग ने मजबूत प्रदर्शन प्रबंधन प्रणाली विकसित करने की सिफारिश भी की थी।

सूत्रों के अनुसार पहला प्रशासनिक सुधार आयोग मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में 1966 में गठित हुआ था। बाद में इसकी अध्यक्षता के. हनुमंतैया ने की। इस आयोग ने सिविल सेवा में लैटरल एंट्री के बजाय पेशेवर रवैया, प्रशिक्षण और कार्मिक प्रबंधन को बेहतर बनाने की बात कही थी।

इस आयोग के अलावा कांग्रेस सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली विदेश मामलों की संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में 2016 और 2017 में भारतीय विदेश सेवा को मजबूती देने के लिए लैटरल एंट्री की सिफारिश की थी। इससे पहले सुरिंदर नाथ समिति (2003) और पीसी होता समिति (2004) ने लोक सेवकों के गैर-सरकारी संगठनों और यहां तक कि निजी क्षेत्र में जाने तथा अपनी वरिष्ठता खोए बिना सरकार में वापस आने के लिए प्रोत्साहित करने की सिफारिश की थी।

कांग्रेस ने किसे-किसे किया था भर्ती

सरकारी सूत्रों ने कांग्रेस शासन में लैटरल एंट्री से भर्ती से लाए गए सैम पित्रोदा समेत तमाम प्रसिद्ध अफसरशाहों की सूची जारी की है, जिन्होंने देश के दूरसंचार क्रांति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका जीता जागता उदाहरण पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी हैं, जिन्हें 1971 में विदेश व्यापार विभाग में आर्थिक सलाहकार नियुक्त किया गया था।

इसके अलावा मोंटेक सिंह आहलूवालिया, बिमल जालान, कौशिक बसु, अरविंद विरमानी और रघुराम राजन के नाम प्रमुख हैं। सूची में यूनिक आइडेंटीफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (यूआईडीएआई) के पूर्व अध्यक्ष नंदन नीलेकणी और टेक्नोक्रेट वी कृष्णामूर्ति भी हैं, जिन्हें बीएचईएल का चेयरमैन भी बनाया गया था।

First Published - August 19, 2024 | 11:08 PM IST

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