दिवालिया रियल एस्टेट फर्म सुपरटेक लिमिटेड की लंबे समय से अटकी 16 हाउसिंग परियोजनाओं को अब सरकार द्वारा संचालित एजेंसी नैशनल बिल्डिंग्स कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन (एनबीसीसी) पूरा करेगी। उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को इस संबंध में फैसला सुनाया। इससे अपना घर मिलने का इंतजार कर रहे हजारों लोगों को राहत मिलेगी। अदालत ने अपने फैसले में सभी ट्रिब्यूनल और उच्च न्यायालयों को ऐसे आदेश जारी करने से भी रोक दिया है, जो इस मामले में एनबीसीसी द्वारा की जा रही निर्माण गतिविधि को बाधित या धीमा कर सकते हैं।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची की अध्यक्षता वाले पीठ ने राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) के 12 दिसंबर, 2024 के फैसले का समर्थन किया, जिसने ऐसी अटकी परियोजनाओं को पूरा करने के लिए एनबीसीसी को शामिल किया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि एनसीएलएटी का दृष्टिकोण इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) के अनुरूप था और निष्पक्षता या वैधता के आधार पर इसमें कोई गलती नहीं निकाली जा सकती। अदालत ने पिछले साल फरवरी में लगाई गई अंतरिम रोक को भी हटा दिया है।
संकट की स्थिति को ध्यान में रखते हुए अदालत ने पाया कि 2010 और 2012 के बीच बुक की गई लगभग 51,000 आवासीय इकाइयां अभी भी अधूरी पड़ी हैं, जिससे सुपरटेक के वित्तीय संकट गहराने के कारण बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए और वर्षों से उन्हें अपना घर नहीं मिल पाया।
संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए शीर्ष अदालत ने खरीदारों के हितों को प्राथमिकता देते हुए सुरक्षा उपाय निर्धारित कर दिए। इसने निर्देश दिया कि पूरी तरह निर्मित और सुसज्जित घरों को उनके मालिकों को सौंपे जाने के बाद ही अदालत वित्तीय और परिचालन लेनदारों के दावों पर विचार करेगी।
न्यायालय ने यह भी कहा कि पूरी की गई इकाइयों में पानी और बिजली कनेक्शन, सीवेज सुविधाएं, आंतरिक सड़कें और पार्क जैसी सभी वे सुविधाएं शामिल होनी चाहिए, जिनका वादा फ्लैट बुक करते समय ग्राहकों से किया गया था। एनबीसीसी से यह भी कहा गया कि वह एनसीएलएटी द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार की गई कार्यान्वयन योजना के अनुसार ही परियोजनाओं को जल्द से जल्द पूरा करे। सर्वोच्च अदालत ने इस समिति को समय पर डिलिवरी सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक सहायता प्रदान करने का भी निर्देश दिया।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एनबीसीसी का प्रतिनिधित्व किया, जबकि घर खरीदारों की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान और वी गिरि पेश हुए। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया द्वारा शुरू की गई दिवाला कार्यवाही के बीच एनबीसीसी ने सुपरटेक की परियोजनाओं को पूरा करने की अनुमति मांगने के लिए एनसीएलएटी का रुख किया था। उस समय न्यायमूर्ति अशोक भूषण की अध्यक्षता वाले एनसीएलएटी ने अपने 12 दिसंबर के आदेश में कहा था कि एनबीसीसी को रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम सहित सभी वैधानिक नियमों का पालन करना होगा। बढ़ी लागत का बोझ किसी भी हालत में घर खरीदारों पर नहीं डाला जा सकता।
ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में कहा था कि परियोजना को बिना बिकी इन्वेंट्री, खरीदारों से वसूली जाने वाली बकाया राशि और एनबीसीसी के वित्तपोषण से पूरा किया जाना चाहिए। इसने परियोजना के आधार पर 12 से 36 महीनों की समय-सीमा के भीतर ही काम पूरा करने का आदेश दिया था।