facebookmetapixel
Advertisement
Dividend Stocks: एक शेयर पर ₹270 का मोटा डिविडेंड! IT सेक्टर की कंपनी का तोहफा, रिकॉर्ड डेट फिक्सजुलाई में UPI ने बनाया नया रिकॉर्ड, 23.66 बिलियन ट्रांजैक्शन के साथ डिजिटल पेमेंट ने भरी ऐतिहासिक उड़ानजुलाई में GST कलेक्शन में जोरदार उछाल, आयात-घरेलू मांग के दम पर ₹2.11 लाख करोड़ के पार पहुंचा आंकड़ाDividend Stocks: निवेशकों की बल्ले-बल्ले! अगले हफ्ते 98 कंपनियां बांटेगी डिविडेंड, ₹270 तक पाने का मौकाRBI की स्वैप स्कीम से बैंकों ने जुटाए 41 अरब डॉलर के विदेशी फंड, 2 महीने में टूटा 2013 का रिकॉर्ड1991 के सुधारों ने बदली ऑटो सेक्टर की तस्वीर: कैसे मुट्ठी भर कंपनियों से दुनिया का बड़ा हब बना भारत‘यूरिया के दाम स्थिर, DAP पर नजर जरूरी’, FAI अध्यक्ष एस. शंकरसुब्रमण्यन ने बताया फर्टिलाइजर सेक्टर का हालटाटा स्टील का दावा: दूसरी तिमाही में और सुधरेगा प्रदर्शन, एमडी टी. वी. नरेंद्रन ने बताया पूरा प्लान‘भटके हुए बच्चे हैं, सजा नहीं सुधार चाहिए’, जंतर-मंतर पर अभद्र टिप्पणी करने वालों को PM मोदी ने किया माफकमर्शियल LPG सिलेंडर ₹200 से ज्यादा सस्ता, दिल्ली-कोलकाता में घटे दाम; होटल-रेस्तरां को बड़ी राहत

पशु परीक्षण के बिना 90% तक घटेगी दवाओं की लागत

Advertisement

व्यापक पशु परीक्षण के बावजूद मानव परीक्षण वाली केवल 10 से 14 प्रतिशत दवाएं ही आखिरकार मंजूर की जाती हैं।

Last Updated- February 06, 2026 | 9:03 AM IST
Antibiotics in animals

देश के फार्मास्युटिकल उद्योग में दवाओं के परीक्षण के तरीके में बड़ा बदलाव नजर आने लगा है। इसकी वजह यह है कि विज्ञान-आधारित बिना-पशु वाले तरीके (एनएएम) सिद्धांत से वास्तविक दुनिया में इस्तेमाल की दिशा में बढ़ रहे हैं। कई हितधारकों वाली नई रिपोर्ट में कहा गया है कि ये दृष्टिकोण दवा विकास की समय-सीमा में आधी से भी ज्यादा तक की कमी कर सकते हैं और लागत 70 से 90 प्रतिशत तक घटा सकते हैं। साथ ही, ये वैश्विक नियामकीय मानकों को भी पूरा करते हैं।

ये निष्कर्ष ‘भारत में दवा विकास के लिए पशु परीक्षण के विकल्पों पर विहंगम विश्लेषण’ का हिस्सा हैं। इसे संयुक्त रूप से डॉ. रेड्डीज लेबोरेटरीज (डीआरएल), डीबीटी-इंस्टीट्यूट फॉर स्टेम सेल साइंस ऐंड रीजेनरेटिव मेडिसिन (इनस्टेम), ह्यूमेन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स इंडिया और एनिमल लॉ ऐंड पॉलिसी नेटवर्क ने तैयार किया है। रिपोर्ट में नियामकों, फार्मास्युटिकल कंपनियों, सीआरओ और शैक्षणिक शोधकर्ताओं के इनपुट शामिल हैं।

दशकों से पशुओं पर परीक्षणों को दवा के विकास में स्वाभाविक कदम माना जाता रहा है। लेकिन रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि कई मामलों में, विशेष रूप से जेनेरिक, बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर के लिए पशु अध्ययन काफी कम वैज्ञानिक महत्त्व जोड़ते हैं और मुख्य रूप से लागत और समय बढ़ा देते हैं। व्यापक पशु परीक्षण के बावजूद मानव परीक्षण वाली केवल 10 से 14 प्रतिशत दवाएं ही आखिरकार मंजूर की जाती हैं।

अध्ययन की प्रस्तावना में भारतीय औषधि महानियंत्रक राजीव रघुवंशी ने कहा, ‘वैज्ञानिक प्रगति अब हमें यह सोचने की सुविधा देती है कि सुरक्षा और असर का आकलन कैसे किया जाता है।’

Advertisement
First Published - February 6, 2026 | 9:03 AM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement