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पशु परीक्षण के बिना 90% तक घटेगी दवाओं की लागत

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व्यापक पशु परीक्षण के बावजूद मानव परीक्षण वाली केवल 10 से 14 प्रतिशत दवाएं ही आखिरकार मंजूर की जाती हैं।

Last Updated- February 06, 2026 | 9:03 AM IST
Antibiotics in animals

देश के फार्मास्युटिकल उद्योग में दवाओं के परीक्षण के तरीके में बड़ा बदलाव नजर आने लगा है। इसकी वजह यह है कि विज्ञान-आधारित बिना-पशु वाले तरीके (एनएएम) सिद्धांत से वास्तविक दुनिया में इस्तेमाल की दिशा में बढ़ रहे हैं। कई हितधारकों वाली नई रिपोर्ट में कहा गया है कि ये दृष्टिकोण दवा विकास की समय-सीमा में आधी से भी ज्यादा तक की कमी कर सकते हैं और लागत 70 से 90 प्रतिशत तक घटा सकते हैं। साथ ही, ये वैश्विक नियामकीय मानकों को भी पूरा करते हैं।

ये निष्कर्ष ‘भारत में दवा विकास के लिए पशु परीक्षण के विकल्पों पर विहंगम विश्लेषण’ का हिस्सा हैं। इसे संयुक्त रूप से डॉ. रेड्डीज लेबोरेटरीज (डीआरएल), डीबीटी-इंस्टीट्यूट फॉर स्टेम सेल साइंस ऐंड रीजेनरेटिव मेडिसिन (इनस्टेम), ह्यूमेन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स इंडिया और एनिमल लॉ ऐंड पॉलिसी नेटवर्क ने तैयार किया है। रिपोर्ट में नियामकों, फार्मास्युटिकल कंपनियों, सीआरओ और शैक्षणिक शोधकर्ताओं के इनपुट शामिल हैं।

दशकों से पशुओं पर परीक्षणों को दवा के विकास में स्वाभाविक कदम माना जाता रहा है। लेकिन रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि कई मामलों में, विशेष रूप से जेनेरिक, बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर के लिए पशु अध्ययन काफी कम वैज्ञानिक महत्त्व जोड़ते हैं और मुख्य रूप से लागत और समय बढ़ा देते हैं। व्यापक पशु परीक्षण के बावजूद मानव परीक्षण वाली केवल 10 से 14 प्रतिशत दवाएं ही आखिरकार मंजूर की जाती हैं।

अध्ययन की प्रस्तावना में भारतीय औषधि महानियंत्रक राजीव रघुवंशी ने कहा, ‘वैज्ञानिक प्रगति अब हमें यह सोचने की सुविधा देती है कि सुरक्षा और असर का आकलन कैसे किया जाता है।’

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First Published - February 6, 2026 | 9:03 AM IST

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