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कोविड की चिंता से घटी विनिर्माण की रफ्तार

Last Updated- December 14, 2022 | 8:39 PM IST

कोविड की चिंताओं के कारण भारत में विनिर्माण वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ी है और यह नवंबर में तीन महीने के निचले स्तर पर रही। कोविड की चिंताओं के कारण फैक्टरी ऑर्डरों एवं निर्यात में वृद्धि धीमी रही। आईएचएस मार्किट इंडिया मैच्यूफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) अक्टूबर में 58.9 के एक दशक के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया था, लेकिन नवंबर में तीन महीने के निचले स्तर 56.3 पर आ गया।
आईएचएस मार्किट में अर्थशास्त्र की सहायक निदेशक पोलियान्ना डी लीमा ने कहा, ‘कंपनियों ने पाया कि नवंबर में वृद्धि पर महामारी का सबसे ज्यादा असर पड़ा है। कोविड से संबंधित अनिश्चितता कारोबारी भरोसे को डिगा रही है।’
हालांकि नवंबर के पीएमआई ने यह भी संकेत दिया है कि रुझान में कुछ सुस्ती के बावजूद उत्पादन क्षेत्र में लगातार सुधार आ रहा है। इस सूचकांक का 50 अंक से ऊपर रहना विस्तार को इंगित करता है। लेकिन इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि पीएमआई माह दर माह संकेतक है। यह पिछले साल नहीं बल्कि पिछले महीने के मुकाबले सुधार को दर्शाता है। इस तरह नवंबर में विनिर्माण गतिविधियां अक्टूबर के समान नहीं रहीं मगर कोविड से पहले की गतिविधियों से अधिक थीं। उदाहरण के लिए यह सूचकांक फरवरी में 54.3 पर था। असल में यह अप्रैल, 2013 से फरवरी, 2020 तक नवंबर, 2020 के आंकड़े से नीचे रहा। फरवरी के बाद पीएमआई में अगस्त तक संकुचन रहा।
पोलियान्ना ने कहा, ‘भारतीय विनिर्माण क्षेत्र सुधार की सही राह पर रहा। नवंबर में नए ऑर्डरों और उत्पादन की मजबूत वृद्धि बरकरार रही।’ हाल के महीने में वृद्धि दर में सुस्ती बहुत बड़ा झटका नहीं है क्योंकि यह अक्टूबर में एक दशक के सर्वोच्च स्तर के मुकाबले गिरावट है। पोलियान्ना ने कहा, ‘कोविड के मामलों में बढ़ोतरी और इससे संबंधित प्रतिबंधों के आसार से सुधार कमजोर हो सकता है।’
रिपोर्ट में कहा गया है कि विनिर्माण उद्योग के तीन प्रमुख क्षेत्रों में वृद्धि रही। उपभोक्ता वस्तु क्षेत्र ने वृद्धि की अगुआई की और यह तगड़ी वृद्धि दर्ज करने वाला एकमात्र क्षेत्र रहा। इसमें कहा गया है कि कोविड-19 प्रतिबंधों में ढील, बाजार की स्थितियों में सुधार एवं मांग में बढ़ोतरी से उत्पादन में वृद्धि को सहारा मिला।
ये आंकड़े उन आधिकारिक आंकड़ों के कुछ दिन बाद आए हैं, जिनमें दर्शाया गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था तकनीकी रूप से मंदी में है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में संकुचन दूसरी तिमाही में घटकर 7.5 फीसदी रहा, जबकि अप्रैल-जून तिमाही में जीडीपी में गिरावट 23.4 फीसदी रही थी। गौरतलब है कि अप्रैल-जून तिमाही में कड़ा लॉकडाउन लगा था।
निजी क्षेत्र की 500 कंपनियों के सर्वेक्षण पर आधारित पीएमआई रिपोर्ट के मुताबिक नवंबर में नए ऑर्डरों में एक साल में सबसे तेज बढ़ोतरी हुई। महामारी से संबंधित प्रतिबंधों के कारण रोजगार के आंकड़ों में गिरावट आई। इनपुट लागत और उत्पादन शुल्क ऊंची दर से बढ़े, लेकिन अपने-अपने लंबी अवधि के औसतों से नीचे रहे।
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में भी छह महीने के अंतराल के बाद सितंबर में बढ़ोतरी हुई। इसमें उपभोक्ता उत्पाद, बिजली और खनन क्षेत्रों में सुधार की बदौलत मामूली बढ़त दर्ज की गई। हालांकि आईआईपी में विनिर्माण लगातार छठे महीने सिकुड़ा है। हालांकि गिरावट सितंबर में 0.5 फीसदी रही है, जो अगस्त में 7.86 फीसदी थी।  हालांकि विनिर्माण सकल मूल्य वर्धन ने चौंकाया है। यह चार तिमाहियों में लगातार गिरावट के बाद चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में 0.6 फीसदी बढ़ा है। इसने आलोच्य तिमाही में जीडीपी में संकुचन को 7.5 फीसदी तक सीमित रखने में अहम भूमिका निभाई।

First Published - December 1, 2020 | 11:22 PM IST

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