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इलेक्ट्रिक वाहनों के तामझाम में गुम हो रही कोलकाता की ट्राम

कोलकाता में 2017-18 में ट्राम 14 मार्गों पर चलती थी मगर 2020 में मार्गों की संख्या केवल 5 रह गई

Last Updated- June 14, 2023 | 10:57 PM IST
Amid EV buzz, the fading ding-ding of Kolkata’s electric trams

इलेक्ट्रिक वाहन बिजली से चलते हैं, पर्यावरण के अनुकूल हैं, इसलिए आजकल देश में उनकी धूम मची हुई है। कोलकाता की मशहूर ट्राम भी बिजली से चलती है, पर्यावरण का ख्याल रखती है मगर उसे लोग भूलते जा रहे हैं। करीब डेढ़ सदी से इस शहर को घर, दफ्तर और सैर-सपाटे की मंजिलों तक ले जाने वाली ट्राम आज अपना वजूद बचाने के लिए जूझ रही है।

कोलकाता में 2017-18 में ट्राम 14 मार्गों पर चलती थी मगर 2020 में मार्गों की संख्या केवल 5 रह गई और आज ट्राम केवल तीन रास्तों पर जाती है। कलकत्ता ट्राम यूजर एसोसिएशन (सीटीयूए) के अध्यक्ष देवाशिष भट्टाचार्य ने बताया कि शुरुआत में तो ट्राम कुल 36 मार्गों पर दौड़ती थी। यह एसोसिशन ट्राम का अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही है।

पश्चिम बंगाल के परिवहन मंत्री स्नेहाशिष चक्रवर्ती ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, उन्होंने कहा, ‘शहर की कुल जमीन के केवल 6 फीसदी हिस्से पर सड़कें हैं। मगर कोलकाता की आबादी इतनी ज्यादा है और यहां सड़कों पर वाहन इस कदर बढ़ गए हैं कि हर जगह ट्राम चलाना ही नामुमकिन हो गया है।’

भट्टाचार्य ने यह भी कहा कि शहर में यातायात प्रबंधन बहुत अच्छा है और ट्राम चलाना मुश्किल नहीं है। 2025 में कोलकाता मेट्रो का काम पूरा होने के बाद ट्राम के एक-दो मार्ग फिर शुरू किए जा सकते हैं।

मेट्रो के काम, पुलों के पुनर्निर्माण या मरम्मत, यातायात और राज्य की नीतियों के कारण ट्राम की सेवा बहुत छोटी हो गई है। पश्चिम बंगाल परिवहन निगम (डब्ल्यूबीटीसी) के प्रबंध निदेशक राजनवीर सिंह कपूर कहते हैं कि करीब 100 साल पहले ट्राम परिवहन का सबसे बढ़िया जरिया थीं। उन्होंने कहा, ‘अब शहर बहुत बड़ा हो गया है। कारोबारी इलाकों में भीड़ बहुत बढ़ गई है और सड़क पर जगह ही नहीं मिल रही।’निगम शहर में बसें और नावें भी चलाता है मगर उसे सबसे कम कमाई ट्राम से ही होती है। हालांकि परिवहन मंत्री ने यह जरूर कहा है कि धरोहर का दर्जा मिलने के कारण और लोगों की भावनाएं जुड़े होने के कारण ट्राम चलती रहेंगी।

रुकीं, फिर चलीं

कोलकाता ट्राम शुरू हुए 150 साल पूरे हो रहे हैं। यह आखिरी ट्राम है, जो परिवहन के बदलते साधनों की भेंट नहीं चढ़ी है। मुंबई में ट्राम 1964 में बंद कर दी गईं। दिल्ली और चेन्नई में उससे भी पहले इन्हें बंद कर दिया गया था।

यूरोप के कुछ शहरों में तो ट्राम अब भी परिवहन का अहम साधन है। वहां ट्राम बंद होने और दोबारा चलने के कई उदाहरण भी हैं। डेलॉयट इंडिया में पार्टनर अनीश मंडल ने कहा कि फ्रांस में स्ट्रासबर्ग में 100 साल से भी पहले 60 किलोमीटर लंबा ट्राम नेटवर्क था, जो तीन दशक पहले करीब-करीब खत्म हो गया। स्ट्रासबर्ग ने नेटवर्क दोबारा बनाया और फ्रांस के दूसरे शहरों ने भी ऐसा ही किया।

ऑस्ट्रेलिया में मेलबर्न में ट्राम अब तक दौड़ रही हैं मगर सिडनी में उन्हें बंद कर दिया गया। कोलकाता में ऑस्ट्रेलिया के महा वाणिज्य दूत रोवन ऐन्सवर्थ ने बताया कि सिडनी में ट्राम का आखिरी नेटवर्क 1961 में बंद कर दिया गया। शहर में भीड़ कम करने और पर्यावरण सुधारने के लिए 290 करोड़ ऑस्ट्रेलियन डॉलर खर्च कर इसे दोबारा शुरू किया गया और पिछले साल इसमें 2.5 करोड़ से भी ज्यादा बार सफर किया गया।

प्रदूषण बिल्कुल नहीं

प्रदूषणरहित वाहनों को होहल्ले में ट्राम बच पाएंगी? मंडल ने कहा कि इलेक्ट्रिक ट्राम से बिल्कुल भी उत्सर्जन नहीं होता और वे सीधे ग्रिड से बिजली ले सकती हैं। उन्होंने कहा कि ट्राम कम बिजली खाती हैं और बसों के मुकाबले ज्यादा अरसे तक चलती हैं। इनमें बस से ज्यादा जगह होती है और जब चाहें, डिब्बे भी बढ़ाए जा सकते हैं।

ट्राम को चाहने वालों की भी ऐसी ही दलील हैं। सीटीयूए के महासचिव महादेव शी ने कहा, ‘ट्राम पर्यावरण के अनुकूल होती हैं और इनमें दोबारा जान फूंकनी चाहिए। इन्हें धरोहर मानकर ही नहीं बैठ जाना चाहिए।’

पिछले महीने ही कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक गैर-सरकारी संगठन की याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा था कि फैसला आने तक ट्राम की पटरियां हटाने का काम बंद रहेगा। मंडल का कहना है कि ट्राम के लिए वातानुकूलित डिब्बे बनाने और नेटवर्क बढ़ाने पर जोर देना चाहिए। मगर इसके लिए भारी रकम जुटाना और शहरी परिवहन की योजना तैयार करना चुनौती है। मंडल के हिसाब से ट्राम का नेटवर्क बचाकर रखा जाए, आधुनिक तकनीकें इस्तेमाल हों और धीरे-धीरे नेटवर्क बढ़ाया जाए।

सीटीयूए के भट्टाचार्य ने कहा कि ट्राम सेवा 1990 के दशक से ही लगातार सिकुड़ती जा रही है। उन्होंने तत्कालीन वाम मोर्च सरकार में परिवहन मंत्री श्यामल चक्रवर्ती के बयान का जिक्र किया। चक्रवर्ती ने कहा था कि ट्राम अब पुरानी, बेकार हो गई हैं और खुद ही खत्म हो जाएंगी।

भट्टाचार्य ने कहा कि निजी बस सेवा शुरू होने से पहले 1970 के दशक तक 40 फीसदी मुसाफिर ट्राम में सफर करते थे और 60 फीसदी सरकारी बसों में। मगर अब ट्राम की हिस्सेदारी नहीं के बराबर रह गई है। कोलकाता के इस पुराने परिवहन साधन को जीवित रखने की कोशिशें भी चल रही हैं। इसके लिए एक ट्राम रेस्तरां, एक ट्राम लाइब्रेरी और वाई-फाई वाले कुछ वातानुकूलित ट्राम शुरू किए गए हैं।

First Published - June 14, 2023 | 10:57 PM IST

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