केंद्रीय बजट 2026-27 में सहकारिता क्षेत्र पर जोर दिए जाने की संभावना है। भारत की अर्थव्यवस्था में सहकारिता की हिस्सेदारी मौजूदा स्तर से बढ़ाकर 3 गुना करने के लिए बजट में एक खाका पेश किया जा सकता है। इसका मकसद राष्ट्रीय सहकारिता नीति (एनसीपी) 2025 के लक्ष्यों के अनुरूप 50 करोड़ लोगों को इसके दायरे में लाना है।
सूत्रों ने कहा कि राष्ट्रीय राजधानी में कुछ महीने पहले केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह द्वारा पेश की गई राष्ट्रीय सहकारिता नीति में सहकारिता से जुड़े लोगों की संख्या मौजूदा 30 करोड़ से 66 प्रतिशत बढ़ाने के लिए कार्यबल गठित करने की जरूरत पर जोर दिया गया है। साथ ही सहकारिता में कामकाज को स्वायत्त बनाने और सदस्यों के लोकतांत्रिक नियंत्रण सुनिश्चित करने की बात कही गई है। इस नीति में सहकारी समितियों की संख्या में मौजूदा लगभग 8,30,000 के स्तर से 30 प्रतिशत बढ़ाने का भी आह्वान किया गया है।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘आगामी केंद्रीय बजट से उपरोक्त उल्लिखित नीतिगत उद्देश्यों को प्राप्त करने के तरीके पर एक स्पष्ट खाका पेश किए जाने की उम्मीद है।’
देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में सहकारी क्षेत्र की हिस्सेदारी का कोई प्रत्यक्ष अनुमान नहीं है, लेकिन सेक्टर के आंकड़े इसके आर्थिक महत्त्व को रेखांकित करते हैं। 2016-17 आंकड़ों के मुताबिक कुल कृषि ऋण में सहकारिता क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 14 प्रतिशत, उर्वरक उत्पादन में 25 प्रतिशत और चीनी उत्पादन में 31 प्रतिशत थी।
पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु की अध्यक्षता में बनी एक उच्च स्तरीय समिति द्वारा तैयार की गई नति के कार्यान्वयन की निगरानी राष्ट्रीय स्तर पर शाह की अध्यक्षता वाली 2 स्तरीय व्यवस्था के माध्यम से की जा रही है।अन्य सिफारिशों के अलावा राष्ट्रीय सहकारी नीति में सहकारी बैंकों के विभिन्न स्तरों के बीच समन्वय को मजबूत करने के लिए एक नए नैशनल एपेक्स कोआपरेटिव बैंक बनाने की वकालत की गई है।
किफायती ऋण की सुगमता सुनिश्चित करने के लिए प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों (पीएसीएस), जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों ((डीसीसीबी) और राज्य सहकारी बैंकों के मौजूदा तीन-स्तरीय ऋण संरचना को बनाए रखा गया है।