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Delhi CAG report on vehicle pollution: एक मिनट में हजारों वाहनों की जांच कर जारी किए PUC

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सीएजी रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2018-19 से 2020-21 के दौरान 47.51 लाख मियाद पूरी कर चुके (10 साल से अधिक पुराने डीजल और 15 साल से अधिक पुराने पेट्रोल वाहन) वाहन थे।

Last Updated- April 01, 2025 | 5:43 PM IST
Delhi Car Pollution Certificate
प्रतीकात्मक तस्वीर

दिल्ली विधानसभा में 31 मार्च 2021 को समाप्त वर्ष के लिए पेश की गई सीएजी रिपोर्ट में वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रयासों में कई कमियों को उजागर किया गया है जैसे कि दिल्ली की सड़कों पर चलने वाले वाहनों के प्रकार और संख्या के बारे में जानकारी का अभाव और उनके उत्सर्जन भार का आकलन, निजी वाहनों के उपयोग को कम करने के लिए सार्वजनिक परिवहन बसों और लास्ट माइल मील कनेक्टिविटी की कमी, ‘मोनोरेल और लाइट रेल ट्रांजिट’ और इलेक्ट्रिक टैक्सी बसों जैसे कम प्रदूषणकारी विकल्पों की शुरुआत का अभाव आदि। सीएजी रिपोर्ट कहती है कि प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणन प्रणाली में महत्वपूर्ण विसंगतियां थीं और बड़ी संख्या में वाहन उपयोगकर्ता अपने वाहनों की मानदंडों के अनुसार जांच नहीं करा रहे थे। वाणिज्यिक वाहनों को फिटनेस प्रमाण पत्र जारी करने की प्रणाली खराब थी और इसके दुरुपयोग की संभावना थी। सीएजी ऑडिट ने यह भी पाया कि सरकार ने “दिल्ली प्रबंधन और पार्किंग स्थान नियम” को लागू करने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की। इस रिपोर्ट में कहा गया कि बीते 5 वर्षों में 2,137 दिनों में से 1,195 दिनों (56 फीसदी) तक दिल्ली की वायु गुणवत्ता खराब से गंभीर श्रेणी में रही। जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा।

एक ही जांच केंद्र पर एक मिनट में जांच कर हजारों पीयूसी जारी किए
सीएजी रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि 7,643 मामलों में एक ही केंद्र पर एक ही समय में एक से अधिक वाहनों की उत्सर्जन सीमा के लिए जांच की गई। इसके अलावा  एक ही जांच केंद्र पर 76,865 मामले ऐसे पाए गए, जिनमें वाहन की जांच और PUC प्रमाणपत्र जारी करने में केवल एक मिनट का समय लगा, जो व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हो सकता। पीयूसी डेटा को वाहन डेटाबेस से लिंक न किए जाने के कारण, पीसीसी मैन्युअल रूप से वाहन की बीएस श्रेणी का चयन करते हैं। जिससे उत्सर्जन मानकों के साथ-साथ पीयूसी की वैधता में भी हेराफेरी की गुंजाइश बनी रहती है। दिल्ली में प्रति वर्ष 4.1 लाख वाहनों की कुल क्षमता में से स्वचालित फिटनेस परीक्षण केंद्रों की हिस्सेदारी केवल 12 प्रतिशत थी, जबकि 2020-21 के दौरान 95 प्रतिशत फिटनेस परीक्षण मैनुअल परीक्षण केंद्रों पर किए गए, जहां वाहन का केवल दृश्य (visual) निरीक्षण किया जा रहा था और वाणिज्यिक वाहनों को ‘फिट’ घोषित करना निरीक्षण अधिकारी के विवेक पर था। 90 प्रतिशत से अधिक फिटनेस परीक्षण बुराड़ी केंद्र में किए गए, जो केवल दृश्य निरीक्षण के आधार पर किए गए थे। कोई भी प्रमुख परीक्षण नहीं किया गया, जिससे फिटनेस परीक्षण अप्रासंगिक हो गया।

एक लाख वाहनों का परीक्षण मान तय सीमा से अधिक, फिर भी पास कर जारी किए पीयूसी

सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक वाहनों को प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र (पीयूसीसी) जारी करने में अनियमितताएं बरती गई थीं जैसे 10 अगस्त 2015 से 31 अगस्त 2020 की अवधि के दौरान प्रदूषण जांच केंद्रों (पीसीसी) पर जांचे गए 22.14 लाख डीजल वाहनों में से 24 प्रतिशत वाहनों के संबंध में परीक्षण मान दर्ज नहीं किए गए। 4,007 मामलों में भले ही परीक्षण मान अनुमेय सीमा (permissible limit) से अधिक थे। लेकिन इन डीजल वाहनों को ‘पास’ घोषित कर पीयूसी जारी किए गए। 10 अगस्त 2015 से 31 अगस्त 2020 तक के पीयूसी डेटाबेस के अनुसार 65.36 लाख पेट्रोल/सीएनजी/एलपीजी वाहनों को पीयूसी जारी किए गए। 1.08 लाख वाहनों को अनुमेय सीमा से अधिक सीओ/एचसी उत्सर्जित करने के बावजूद ‘पास’ घोषित किया गया और पीयूसी जारी किए गए।

47.51 लाख मियाद पूरे कर चुके वाहनों में से महज 2.98 लाख का पंजीयन हुआ रद्द

सीएजी रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2018-19 से 2020-21 के दौरान 47.51 लाख मियाद पूरी कर चुके (10 साल से अधिक पुराने डीजल और 15 साल से अधिक पुराने पेट्रोल वाहन) वाहन थे।  लेकिन इनमें से केवल 2.98 लाख वाहनों का ही पंजीकरण रद्द किया गया। मार्च 2021 तक जब्त किए गए 347 मियाद पूरी कर चुके वाहनों में से किसी को भी स्क्रैप नहीं किया गया। जब्त किए गए वाहनों को रखने के लिए क्षमता भी केवल 4000 वाहनों की थी, जबकि जब्त और स्क्रैपिंग के लिए 41 लाख से अधिक वाहन निर्धारित थे। परिवहन विभाग ने 31 मार्च 2017 के बाद बेचे गए 382 नए बीएस-III अनुरूप वाहनों को पंजीकृत किया और 2 जनवरी 2020 से 20 अप्रैल 2020 के बीच बेचे गए 1672 बीएस-4 अनुरूप वाहनों को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन करते हुए अप्रैल 2020 में पंजीकृत किया गया।बसों की कमी पूरी नहीं हुई, उत्सर्जन की जांच भी कम हुई
सीएजी रिपोर्ट में कहा गया है कि सार्वजनिक परिवहन अपनाने से प्रति यात्री-किलोमीटर यात्रा के दौरान वाहनों से होने वाले उत्सर्जन में कमी आती है। हालांकि ऑडिट ने पाया कि सार्वजनिक परिवहन बसों की कमी थी क्योंकि 9,000 बसों की पुनर्निर्धारित आवश्यकता के मुकाबले केवल 6,750 बसें ही उपलब्ध थीं। 2011 के बाद से दिल्ली की आबादी में अनुमानतः 17 फीसदी वृद्धि हुई। लेकिन मई 2011 से पंजीकृत ग्रामीण सेवा वाहनों की संख्या 6,153 पर बनी हुई है, जो अंतिम मील तक कनेक्टिविटी प्रदान करते हैं। यहां तक कि ये ग्रामीण सेवा वाहन भी 10 साल पुराने थे, जिनकी ईंधन दक्षता खराब हो सकती है और इनके प्रदूषण पैदा करने की उच्च संभावना है। सार्वजनिक परिवहन बसों का राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्देशों के अनुसार महीने में दो बार उत्सर्जन परीक्षण नहीं किया जा रहा था। इसी तरह 6,153 ग्रामीण-सेवा वाहनों में से केवल 3,476 वाहनों का परीक्षण अप्रैल 2019 से मार्च 2020 के दौरान केवल एक बार किया गया, जबकि इस अवधि के दौरान चार बार परीक्षण किया जाना आवश्यक था। सार्वजनिक परिवहन बसों की कमी और पिछले सात वर्षों से बजट प्रावधान करने के बावजूद मोनोरेल, लाइट रेल ट्रांजिट और इलेक्ट्रॉनिक वॉक बस जैसे विकल्पों को लागू करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए।

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First Published - April 1, 2025 | 5:35 PM IST

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