साइबर सुरक्षा से जुड़ा जोखिम वर्तमान में देश के उद्योग जगत के समक्ष उत्पन्न सबसे गंभीर खतरा है। फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री (फिक्की) और ईवाई के जोखिम सर्वेक्षण 2026 के मुताबिक सर्वे में शामिल 61 फीसदी कारोबारी नेतृत्व ने साइबर सुरक्षा को संस्थागत प्रदर्शन को आकार देने के मामले में प्राथमिक कारक माना। आधे से अधिक प्रतिक्रिया देने वालों ने डेटा चोरी और भीतरी लोगों द्वारा धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों को लेकर चिंता जताई।
आर्टिफिशल इंटेलिजेंस को लेकर बढ़ते तनाव को भी एक अन्य प्रमुख निष्कर्ष पाया गया। करीब 59 फीसदी अधिकारियों ने कहा कि उभरती तकनीक मसलन एआई आदि को अपनाने की धीमी गति के कारण परिचालन प्रभाव बाधित हो रहा है। वहीं करीब 54 फीसदी का मानना है कि एआई से जुड़े नैतिकता और संचालन संबंधी मुद्दों का समुचित प्रबंधन नहीं किया गया है। साइबर जोखिम अब सीधे परिचालन, राजस्व और विश्वास को खतरा पैदा कर रहे हैं। इससे कारोबारी निरंतरता और अंशधारकों के विश्वास को भी नुकसान पहुंच रहा है। इससे यह संकेत भी मिलता है कि एक ओर जहां कंपनियां एआई के महत्त्व को समझ रही हैं वहीं वे उसका जवाबदेह और सुरक्षित इस्तेमाल सुनिश्चित करने के लिए भी जूझ रही हैं।
ये निष्कर्ष भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था के व्यापक रुझानों के अनुरूप ही नजर आते हैं। वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा ने उल्लेख किया है कि बढ़ता डिजिटलीकरण, क्लाउड को अपनाने की तेज गति और डेटा के गहन इस्तेमाल वाली तकनीकों के बढ़ते उपयोग ने साइबर सुरक्षा सेवाओं मसलन खतरे की पहचान, जोखिम प्रबंधन और अनुपालन और प्रबंधित सुरक्षा सेवाओं की मांग को बहुत अधिक बढ़ा दिया है। इस बढ़ती मांग ने भारत के साइबर सुरक्षा उद्योग के विस्तार को भी प्रोत्साहित किया है।
नैसकॉम डेटा सिक्योरिटी काउंसिल ऑफ इंडिया के अनुसार, देश में अब 400 से अधिक साइबर सुरक्षा उत्पाद कंपनियां हैं, जिन्होंने 2025 में लगभग 4.46 अरब डॉलर का राजस्व अर्जित किया। राष्ट्रीय स्तर पर, भारत की साइबर तैयारी लगातार बेहतर हुई है। अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (आईटीयू) द्वारा प्रकाशित ग्लोबल साइबर सुरक्षा सूचकांक 2024 में भारत ने पहली श्रेणी की रैंकिंग हासिल की और 98.49 का स्कोर प्राप्त किया, जिससे वह दुनिया के सबसे साइबर तैयार देशों में शामिल हो गया।
हालांकि भारत में जोखिम का परिदृश्य बहुत गहन है। साइबर सुरक्षा कंपनी सेक्राइट द्वारा जारी इंडिया साइबर थ्रेट रिपोर्ट 2026 बताती है कि अक्टूबर 2024 से सितंबर 2025 के बीच 26.5 करोड़ से अधिक साइबर हमले दर्ज किए गए। इनका असर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों पर पड़ा। उधर चेक पॉइंट सॉफ्टवेयर टेक्नॉलजीज की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय संगठनों को हर सप्ताह 2,000 से अधिक साइबर हमलों का सामना करना पड़ता है। यह वैश्विक औसत से अधिक है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि डिजिटल खतरों में कितनी तेजी से इजाफा हो रहा है। इस स्थिति में उद्योग, नियामकों और प्रौद्योगिकी प्रदाताओं के बीच अधिक समन्वय की आवश्यकता है। स्पष्ट साइबर मानदंड, खतरों को लेकर तेजी से सूचनाओं को साझा करना और डेटा सुरक्षा मानकों का सख्ती से प्रवर्तन करा कर प्रणालीगत जोखिमों को कम करने और बड़े पैमाने पर व्यवधान को रोकने में मदद मिल सकती है।
साइबर क्षेत्र से जुड़े जोखिम जैसे-जैसे आपूर्ति श्रृंखलाओं और सीमाओं के पार फैलते जा रहे हैं, टिकाऊपन बनाने के लिए सामूहिक कार्रवाई आवश्यक होगी। इसलिए, उद्यमों को मजबूत जोखिम प्रबंधन ढांचे अपनाने, घटना प्रतिक्रिया क्षमताओं को सुदृढ़ करने, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस से सक्षम सुरक्षा उपायों में निवेश करने और विभिन्न क्षेत्रों में साझा खतरे से निपटने की बुद्धिमता को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। कार्यबल को उन्नत कौशल प्रदान करना और डेटा तथा एआई को लेकर चौतरफा मजबूत शासन दस्तूर स्थापित करना महत्वपूर्ण होगा, विशेषकर छोटे उद्यमों के लिए। इस समय जबकि भारत ‘ग्लोबल एआई इम्पैक्ट समिट’ के लिए तैयार है, तो यह मजबूती से संदेश देने का समय है कि साइबर सुरक्षा को रणनीति, संस्कृति और संचालन में अंतर्निहित होना चाहिए। तभी विभिन्न कारोबार डिजिटल परिवर्तन की पूरी क्षमता का लाभ उठाते हुए अपने भविष्य की रक्षा कर पाएंगे।