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भारत को सिर्फ क्लासरूम में नहीं, पावर सेक्टर में भी ज्यादा इंजीनियरों की जरूरत

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भारत जब प्रतिस्पर्धी विनिर्माण क्षेत्र और भौतिक संरचना बनाने के लिए जूझ रहा है, हम इस बात पर विचार कर सकते हैं कि इंजीनियर देश में किस तरह की नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकते हैं

Last Updated- October 08, 2025 | 10:40 PM IST
India needs more engineers
इलस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

स्टैनफोर्ड के हूवर हिस्ट्री लैब के डैन वांग ने अपनी पुस्तक ‘ब्रेकनेक: चाइनाज क्वेस्ट टु इंजीनियर द फ्यूचर’ के माध्यम से व्यापक तौर पर लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। इसमें वे तर्क देते हैं कि चीन एक ‘इंजीनियरिंग राज्य’ है, जबकि अमेरिका ‘वकीलों का राज्य’ है। यह विश्लेषण नया नहीं है। द इकनॉमिस्ट के अनुसार, 1998 में चीन की यात्रा के दौरान बिल क्लिंटन ने कहा था, ‘आपके पास बहुत सारे इंजीनियर हैं, और हमारे पास बहुत सारे वकील… चलिए अदला-बदली कर लेते हैं!’

आज अगर आप चीन जाएं तो उसकी इंजीनियरिंग की सफलताएं आपको चौंका देंगी। आपका यह स्तंभकार एक दशक बाद पिछले महीने चीन गया तो उसे ऐसा ही कुछ अनुभव हुआ। आपने चीन के बारे में कितना भी पढ़ा हो, वहां के विशाल हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों, पुलों, ऊंची इमारतों और बुलेट ट्रेनों को देखना और महसूस करना एक अलग अनुभव था। खासतौर पर तब जबकि यह उत्कृष्ट शहरी नियोजन और सार्वजनिक सुविधाओं के उच्च गुणवत्ता वाले निर्माण के स्पष्ट कौशल के साथ जुड़ा है। यह एक सुव्यवस्थित समाज है जिसने अभूतपूर्व पैमाने पर निर्माण किया है, और वह भी अत्यंत उत्कृष्टता के साथ।

यह कमाल इंजीनियरों ने किया है। 20वीं सदी के मध्य में सोवियत संघ ने भी ऐसा ही किया था जो इस समय चीन कर रहा है। उसके राजनीतिक नेतृत्व में इंजीनियरों का दबदबा है। चीन के विशेषज्ञों ली चेंग और लिन व्हाइट के मुताबिक चीन के प्रांतों, प्रमुख शहरों और स्वायत्त क्षेत्रों के 80 फीसदी गवर्नर, मेयर और पार्टी सचिव टेक्नोक्रेट हैं।

ऐसा हमेशा नहीं था। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के आरंभिक नेता मु​क्ति संग्राम की उपज थे। इंजीनियर तीसरी पीढ़ी से प्रभावशाली हुए जिन्हें तंग श्याओफिंग ने चुना। इस समूह का नेतृत्व च्यांग चेमिन के हाथों में था जो स्वयं एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर थे। उनके अलावा झू रोंग्जी, हू चिंताओ और शी चिनफिंग भी इसी श्रेणी में हैं जिन्होंने केमिकल इंजीनियरिंग और लॉ की पढ़ाई की।

वान गांग का उदाहरण भी हमारे सामने है। माओ की सांस्कृतिक क्रांति के उत्पीड़न के शिकार वान पीएचडी के लिए जर्मनी जाने में सफल रहे और वहां उन्होंने ऑडी में काम करना शुरू कर दिया। एक चीनी मंत्री ऑडी के दौरे पर गए और वहां उन्होंने वान से मुलाकात के बाद उन्हें वापस चीन आमंत्रित किया। वान बिजली से चलने वाले वाहनों यानी ईवी के शुरुआती पैरोकार बने। चीन की सरकार के इकलौते गैर कम्युनिस्ट सदस्य के रूप में उन्होंने इस दिशा में शोध को आगे बढ़ाया। आज चीन इस कारोबार में अग्रणी है। इसके अलावा शु गुआंगशियान कोलंबिया से स्नातक करने के बाद पीकिंग विश्वविद्यालय लौटे और बाद में दुर्लभ धातुओं पर शोध के लिए प्रयोगशाला स्थापित की। अब इस क्षेत्र में चीन का दबदबा है। शु को चीन के दुर्लभ धातु उद्योग का पितामह माना जाता है।

मामला सिर्फ यह नहीं है कि प्रवासी वापस लौटे हैं। चीन के भीतर, एसटीईएम (विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित) के छात्र हर साल देश की लगातार उच्च गुणवत्ता वाले विश्वविद्यालयों से स्नातकों के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह संख्या किसी भी अन्य देश की तुलना में अधिक है। ये छात्र चीन की निर्णय लेने वाली उच्च स्तरीय संस्थाओं में स्थान पाते हैं, जो अमेरिका या भारत में नहीं होता, हालांकि भारत एसटीईएम स्नातकों की संख्या के मामले में दूसरा सबसे बड़ा देश है। जहां तक अमेरिका का सवाल है, तो कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस ने 2022 में रिपोर्ट किया था कि 117वीं कांग्रेस में वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की संख्या उतनी ही थी जितनी रेडियो टॉक-शो होस्ट्स की! सबसे अधिक उपस्थिति वकीलों और कारोबारियों की थी।

भारत का भी यह अनुभव रहा है कि वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को अगर जिम्मेदारी दी जाए तो वे भी निर्माण कर सकते हैं। इसके आरंभिक उदाहरणों की बात करें तो सिविल इंजीनियरिंग और बांध निर्माण में एम विश्वेश्वरैया, परमाणु ऊर्जा में होमी भाभा, कृषि में एम. एस. स्वामीनाथन, अंतरिक्ष कार्यक्रम में विक्रम साराभाई और सतीश धवन तथा दुग्ध क्रांति लाने वाले मेकैनिकल इंजीनियर वर्गीज कुरियन शामिल हैं। कारखानों और संगठनों का निर्माण करने वाले अन्य इंजीनियरों में मंतोष सोढ़ी (स्टील), वी कृष्णमूर्ति (इलेक्ट्रिकल मशीनरी) और डी.वी. कपूर (बिजली उत्पादन) शामिल हैं। मेट्रो मैन ई. श्रीधरन का नाम इसी सिलसिले का हिस्सा है।

देश के सॉफ्टवेयर सेवा उद्योग की नींव इंजीनियरों ने रखी। शुरुआत एफसी कोहली से हुई जिन्होंने कनाडा से इंजीनियरिंग पढ़ी और फिर एमआईटी से सिस्टम इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। लार्सन ऐंड टूब्रो एक तकनीकी गहराई वाली कंपनी है जिसे दो डेनिश इंजीनियरों ने बनाया और बाद में एएम नाइक इसे आगे ले गए। दुनिया की सबसे जटिल तेल रिफाइनरी बनाने वाले मुकेश अंबानी एक केमिकल इंजीनियर हैं। इन्फोसिस से निकले नंदन नीलेकणी ने डिजिटल अधोसंरचना में काफी योगदान किया।

ऐसे बहुत अधिक उदाहरण नहीं हैं। ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि भारत के शुरुआती नेता अधिवक्ता थे (गांधी, नेहरू, पटेल, आंबेडकर) । नेहरू वैज्ञानिक मानसिकता के तगड़े हिमायती थे और वे ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ बनाना चाहते थे लेकिन सरकारी संस्कृति में विषय विशेषज्ञता को प्रशासनिक क्षमता से कमतर माना जाता था।

हालांकि, यह विडंबना ही है कि भारत ने दुनिया के बेहतरीन अर्थशास्त्री तैयार किए और दुनिया की सबसे बुरी वृहद आर्थिक नीतियां भी। परंतु 1991 में पी.वी. नरसिंह राव (जो स्वयं अधिवक्ता रहे थे) के नेतृत्व में अर्थशास्त्री ही सुधारों के वाहक बने। उनमें से कुछ तो भौतिकी पढ़ने के बाद अर्थशास्त्री बने थे।

अब परिवर्तन आ रहा है। भारतीय प्रशासनिक सेवा में इंजीनियरों की तादाद दो दशक पहले के 30 फीसदी से बढ़कर 60 फीसदी हो चुकी है। परंतु इस करियर में आगे नहीं बढ़ने के कारण वे भी बस सामान्य बनकर रह जाते हैं।

यद्यपि नरेंद्र मोदी प्रौद्योगिकी की शक्ति में विश्वास करते हैं लेकिन राजनीतिक नेतृत्व में ऐसा बदलाव अभी आना है। उनके वरिष्ठ सहयोगियों में राजनाथ सिंह और अमित शाह विज्ञान के छात्र रहे हैं। परंतु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ध्यान सांस्कृतिक बदलाव पर है। निर्मला सीतारमण अर्थशास्त्री जबकि पीयूष गोयल लेखाकार हैं। अश्विनी वैष्णव इंजीनियर हैं।

वर्ष2021 में मंत्री बने 36 केंद्रीय मंत्रियों का विश्लेषण दिखाता है कि इसमें अधिवक्ताओं का बोलबाला है। इसके अलावा इसमें बिजनेस की डिग्री वाले, डॉक्टर और दो आईएएस शामिल रहे। कुछ इंजीनियर भी हैं लेकिन उनकी संख्या नहीं पता। कांग्रेस में एकमात्र उल्लेखनीय इंजीनियर जयराम रमेश हैं। वहीं आईआईटी स्नातक अरविंद केजरीवाल को देखकर पता लगता है कि इंजीनियर के राजनेता बनने के क्या जोखिम
हो सकते हैं।

देश के कारोबारी जगत में पारंपरिक व्यापारियों या साहूकार जातियों का दबदबा है। मसलन बिड़ला परिवार की पारंपरिक पार्थ लेखा प्रणाली। यह निस्संदेह कारोबारी क्षेत्र की बड़ी ताकत रही है। वहीं आज कारोबारी समूहों के कुछ सदस्य सुशिक्षित हैं और इंजीनियरिंग उद्योग चला रहे हैं।

तुलनात्मक रूप से देखें तो पारसी, ब्राह्मण, लिंगायत और पंजाबी खत्री जैसे अन्य समुदायों से आए लोगों ने जब व्यवसाय में कदम रखा, तो उन्होंने शुरुआत से ही इंजीनियरिंग पर अधिक ध्यान दिया। जैसे टाटा और गोदरेज, टीवीएस और किर्लोस्कर, कल्याणी और महिंद्रा। वहीं, आंध्र प्रदेश के समृद्ध तटीय क्षेत्र ने निर्माण क्षेत्र में कई अगुआ दिए हैं। पेशेवर वर्ग के बेहतरीन इंजीनियर विदेश जाते हैं और प्रबंधन डिग्री हासिल करते हैं, इसके बाद वे परामर्श या वित्त क्षेत्र में जाते हैं जहां अधिक वेतन-भत्ते मिलते हैं।

इंजीनियर कोई जादू नहीं कर सकते। परंतु वे तार्किक ढंग से समस्याएं हल करने के लिए प्रशिक्षित रहते हैं। वहीं अधिवक्ताओं का ध्यान न्यायालय में विपक्ष से निपटने पर रहता है। आश्चर्य नहीं कि चीन ने वित्त और आर्थिक ढांचे में बड़ी गलतियां कीं। लेकिन यदि सक्षम इंजीनियरों को नेतृत्व में रखा जाए, तो यह हमारे देश में घटिया काम को सहन करने और जुगाड़ की संस्कृति का उत्सव मनाने की प्रवृत्ति को समाप्त कर सकता है।

भारत जब प्रतिस्पर्धी विनिर्माण क्षेत्र और गुणवत्तापूर्ण भौतिक संरचना बनाने के लिए जूझ रहा है, हम इस बात पर विचार कर सकते हैं कि इसे किस हद तक इंजीनियरिंग आधारित देश बनना है और इंजीनियर देश की राजनीति और प्रशासन के साथ कारोबार और उद्योग जगत में किस तरह की नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकते हैं।

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First Published - October 8, 2025 | 10:35 PM IST

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