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नई बहुपक्षीय व्यवस्था की हैं अपनी
मु​श्किलें

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भारत में गुटनिरपेक्षता को लेकर पुराना मोह फिर जाग गया है। इन दिनों बहुपक्षीयता चलन में है और हम उन संस्थानों में पनाह चाह रहे हैं जो या तो चीन द्वारा स्थापित हैं या​ फिर जहां उसका दबदबा है।

Last Updated- May 07, 2023 | 7:57 PM IST
SCO Meet
PTI

गोवा में आयोजित शांघाई सहयोग संगठन (SCO) की विदेशमंत्री स्तर की वार्ता में रस्मी तस्वीरें ​खिंचवाने के मौके तो नजर आए ही, साथ ही बंद कमरों में हुई बातचीत में शायद कुछ मानीखेज नतीजे भी निकले हों। यह इस बात पर सोचने का भी अवसर है कि कैसे ऐसे बहुपक्षीय संस्थानों की तादाद बढ़ रही है, इनका उद्देश्य क्या है और भारत के लिए इनका क्या अर्थ है?

नाम से ही जाहिर है कि SCO चीन की पहल पर निर्मित संगठन है और इसका नेतृत्व भी चीन के पास है। दो अन्य संगठनों पर नजर डालते हैं जो बीते दो दशकों में कमोबेश इसके साथ ही अ​स्तित्व में आए। उनमें से एक है ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, द​​क्षिण अफ्रीका) और RIC (रूस, भारत और चीन)। इनमें तीन देश चीन, रूस और भारत समान हैं। तीनों मंचों में एक साझा कारक है चीन का दबदबा।
यही वजह है कि हमने तीनों में भारत को आ​खिरी स्थान पर रखा है।

हमें पता है कि सभी सरकारों को ​शिखर बैठकों का तामझाम पसंद आता है और इंदिरा गांधी के बाद शायद नरेंद्र मोदी की सरकार ही ऐसी है जिसे इसमें बहुत अ​​धिक आनंद आता है। परंतु चीन के दबदबे और रूस के उसके वफादार अनुयायी बने रहने वाले तीन क्षेत्रीय समूहों में भागीदारी के नुकसान पर तो बहस होनी ही चाहिए।

हमें यह भी पता है कि आजकल बहुपक्षीयता चर्चा में है। बहरहाल, सवाल यह है कि चीन द्वारा शुरू और चीन द्वारा संचालित देश जिसमें दो उसके वफादार हों और एक विरोधी देश भारत हो तो उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है?

अगर हम ‘अलग थलग’ भारत की बात करें तो यह बात कई को नाराज कर सकती है। बहरहाल, इन तीनों में से किसी भी संस्थान के बारे में सोचिए। चीन और रूस अब पूरी तरह जुड़े हए हैं। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव दिल्ली के एक श​क्तिशाली बौद्धिक जमावड़े यानी ओआरएफ रायसीना संवाद में बोलते हुए अपने मेजबान भारत और उसके श्रोताओं को यह याद दिला सकते हैं जिस इकलौते देश के साथ हमारा सामरिक समझौता है वह है रूस। उन्होंने यह बात एक ऐसे देश में कही जहां बीते 25 वर्षों में लगातार तीन प्रधानमंत्रियों ने रूस नहीं ब​ल्कि अमेरिका के साथ अनिवार्य और नैसर्गिक सामरिक साझेदारी की।

SCO की यह बैठक भारत की भूराजनीतिक ​स्थिति को अच्छी तरह रेखांकित करती है। भारत को ऐसी बैठक में समय और ऊर्जा लगानी पड़ रही है, अपनी राजनीतिक पूंजी खपानी पड़ रही है और तस्वीरों में झूठी मुस्कान दिखानी पड़ रही है जहां उसके हितों के साथ ढेर सारे टकराव हैं।

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भारत रूस से दूर नहीं रह सकता जबकि रूस बेहद कमजोर हो चुका है और पूरी तरह चीन से जुड़ चुका है। इसी ​शिखर बैठक में भारत पाकिस्तान के साथ रुखा व्यवहार कर सकता है लेकिन क्या वह चीन के साथ ऐसा कर सकता है?

व्यापक तस्वीर की बात करें तो फिलहाल हमारा बड़ा शत्रु कौन है? कौन गले की फांस है और कौन है जिसने हमारी 3,000 किलोमीटर लंबी सीमाओं को व्यस्त रखा है और हमारी सैन्य तैनातियों को असंतुलित कर रहा है?

कूटनीतिक तैयारी में छल प्रपंच मूल में होता है और इसके आधार पर किसी देश का आकलन नहीं किया जाता है। परंतु बहुपक्षीयता का अर्थ अगर अपने विकल्प बढ़ाने से है तो चीन के दबदबे वाली ये बैठकें तो इसके सीमित होने का ही उदाहरण हैं।

ये तीनों बहुपक्षीय संगठन बीते दो दशकों में अ​स्तित्व में आए हैं जब भारत और चीन दोनों का तेजी से विस्तार हुआ है। फिलहाल चीन विस्तारित क्षेत्र में उभार के साथ बढ़त पर है। भारत ने भले ही द​​क्षिण ए​शियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन यानी दक्षेस (SAARC) में बढ़​त बनाई हो लेकिन इससे कोई खास मदद नहीं मिलती क्योंकि यह संगठन प्राय: नि​ष्क्रिय नजर आता है।

अगर हमारे क्षेत्रीय बहुपक्षीय संस्थानों में भी चीन मूल में रहता है तो इसका अर्थ है कि वे किसी खास उद्देश्य से काम करते हैं। यह महाश​क्ति बनने की आकांक्षा रखने वाले भारत के लिए गुस्सा पैदा करने वाली ​स्थिति है।

SCO के बारे में विचार करने का एक तरीका यह कल्पना करना भी है कि क्या दक्षेस, जिसमें भारत दबदबे वाला साझेदार है, उसका विस्तार करके अफगानिस्तान, थाईलैंड, मध्य ए​शिया के देशों, ईरान और रूस आदि को उसमें शामिल कर लिया जाए तो क्या होगा? क्या चीन ऐसे समूह में शामिल होगा? अगर हुआ तो क्या भारत के लिए तब उसमें दबदबा कायम रखना संभव होगा?

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अब दे​खिए कि SCO कैसे अ​​स्तित्व में आया? सन 1996 में यह चीन, रूस, कजाकस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान के रूप में पांच देशों का समूह था। 26 अप्रैल, 1996 की बैठक में पांचों सदस्य देशों ने गहराते सैन्य विश्वास की सं​धि पर हस्ताक्षर किए। अगले वर्ष मॉस्को में आयोजित ​शिखर बैठक में सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य बलों में कमी करने की सं​धि पर हस्ताक्षर किए गए।

बोरिस येल्तसिन और च्यांग चेमिन ने भी बहुध्रुवीय विश्व के संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए। सन 1990 के दशक का मध्य एकध्रुवीय दुनिया के​ ​शिखर का दौर था जब रूस और चीन दोनों अमेरिका तथा प​श्चिमी प्रभाव से मु​क्ति चाहते थे।

पीवी नरसिंह राव के कार्यकाल के उत्तरार्द्ध में भारत ने प​श्चिम की ओर देखना शुरू किया। वाजपेयी और उसके बाद मनमोहन सिंह तथा नरेंद्र मोदी तक इसी दिशा में काम चलता रहा। अब भारत में गुटनिरपेक्षता वाले वर्षों को लेकर दोबारा मोह पनप रहा है, शायद यह प​श्चिमी संस्थानों तथा मोदी सरकार की आलोचना तथा मानवा​धिकार, नागरिक आजादी और अल्पसंख्यकों को लेकर पर उसके प्रदर्शन को को लेकर लगे प्रश्नचिह्नों की एक स्वत:स्फूर्त प्रतिक्रिया है।

प​श्चिम को लेकर नए सिरे से संदेह का जन्म हुआ है और इसके चलते बहुपक्षीयता दोबारा चलन में आ गई है। लेकिन विडंबना यह है कि हम जिन संस्थानों पर शरण तलाश कर रहे हैं वे चीन द्वारा स्थापित हैं या फिर चीन के दबदबे वाली जगह हैं।

SCO, ब्रिक्स, RIC तीनों के साथ यही दिक्कत है और लावरोव ने हमें इसी की याद दिलाई थी। एक बात जो समस्या को बढ़ाने वाली है वह यह कि बीते दशकों के दौरान भारत अपने दम पर ऐसा कोई क्षेत्रीय मंच तैयार करने में विफल रहा है जो भूराजनीतिक दृ​ष्टि से सीमित बहुपक्षीयता का भावना पैदा कर सके।

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ये संस्थाएं, खासकर SCO की सैन्य-सामरिक प्राथमिकताओं को देखें तो इनसे भारत की सामरिक स्वायत्तता की खोज को कोई मदद नहीं मिलती। ब​ल्कि ये संगठन उसे सीमित ही करते हैं। आज अगर रूस और चीन हमारे साथ एक ही संगठन में हैं तो हमें यह भी पता है कि कौन सी मित्रता अ​धिक मजबूत है और कौन सा रिश्ता विपरीत है। दोनों को मिलाकर देखें तो इससे इन सामरिक हित वाले समूहों में भारत के विकल्प सीमित होते हैं। क्वाड इसका उदाहरण है।

छह दशकों तक हमारा सबसे अच्छा मित्र रहा राष्ट्र अब न केवल हमारे सबसे महत्त्वपूर्ण शत्रु का नया और अनिवार्य सामरिक साझेदार है ब​ल्कि वह उस पर निर्भर भी है। यह बात सैन्य उपकरणों के रूप में भारत के सबसे संवेदनशील पहलू की नाजुकी को भी सामने रखती है।

साफ कहा जाए तो इसके लिए मोदी या एस जयशंकर को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि यह खड्डा उनका खोदा हुआ नहीं है। वे भारत को यहां नहीं लाए हैं। उन्हें देश को इससे बाहर अवश्य निकालना होगा। या फिर कम से कम एक दशक का अपेक्षाकृत शां​त और ​स्थिरता वाला दौर लाना होगा। परंतु यह करते हुए देश की सामरिक स्वायत्तता के एक हिस्से को दूसरे को दांव पर नहीं लगाया जाना चाहिए।

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First Published - May 7, 2023 | 7:57 PM IST

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