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जलवायु कार्रवाई का बंद हो उपनिवेशवाद

Last Updated- December 12, 2022 | 10:44 AM IST

वैश्विक जलवायु परिवर्तन की चुनौती वैश्विक तापमान को कम करना है। इसके लिए कार्बन उत्सर्जन घटाना जरूरी है। इस बात की कोशिश की जा रही है कि ऊर्जा उत्पादन में कम से कम कार्बन उत्सर्जन हो। इसके लिए विभिन्न ऊर्जा स्रोतों को चुना जा रहा है और जैव ईंधन की जगह लेने वालीं व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य शू्न्य कार्बन उत्सर्जन तकनीकें विकसित की जा रही हैं।
यह अत्यधिक औपनिवेशिक ढांचा है। उस समय के ढांचे के बारे में विचार कीजिए, जब केवल जलवायु परिवर्तन नहीं बल्कि पर्यावरण पर जोर था। जैव विविधता, प्राकृतिक वातावरण में प्रदूषण, आम लोगों पर असर की परवाह किए बिना उपभोग में लगातार वृद्धि हुई। इन चीजों को तब तक सभी जीवों ने एक सामान्य उपहार के रूप में महत्त्व नहीं दिया, जब तक मानव उपभोग और उत्पादन में अभूतपूर्व बढ़ोतरी नहीं हो गई।
जयवायु परिवर्तन भी इसी बढ़ोतरी का नतीजा है, इसलिए वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को रोकने के लिए उपभोग को कम किया जाना जरूरी है। लेकिन वैश्विक उपभोग में तेजी अत्यधिक असमान है और ज्यादातर लोगों को अभी अपनी बुनियादी उपभोग की वस्तुएं उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए पर्यावरण समस्या के समाधान के लिए बराबर उपभोग के तरीकों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
जलवायु कार्रवाई एजेंडा ने उपभोग केंद्रित पर्यावरण ढांचे को खत्म कर दिया है। इसने मकसद को बराबर उपभोग से बदलकर कार्बन उत्सर्जन में कमी कर दिया है। ऐसा वाणिज्यिक रूप से व्यवहार्य कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने वाली तकनीक विकसित करके किया गया है, जिससे अत्यधिक उपभोक्तावादी अपना उपभोग स्तर बरकरार रखे हुए हैं। अब जोर केवल कार्बन उत्सर्जन पर है, इसलिए जलवायु कार्रवाई में मुख्य रूप से एक प्रकार की ऊर्जा खपत को दूसरी प्रकार की ऊर्जा खपत में बदलना ही शामिल है। आम आदमी के सवाल को गौण बना दिया गया है। ‘हमारे साझा ग्रह’ और ‘ग्रह सीमा’ के समक्ष मौजूद जोखिमों के बारे में हो-हल्ला एक तरह की वकालत के हथियार हैं ताकि अपने विकास के सफर को अभी पूरा न कर पाने वाले क्षेत्रों को ऐसा बिना जैव ईंधनों के करने के लिए बाध्य किया जा सके।
इससे उच्च-उपभोग विकास के मॉडल के तीन बुनियादी सिद्धांत यथावत हैं। पहला, ‘विकास’ लगातार उन सभी देशों और लोगों से संबंधित बना हुआ है, जो अमीर लोगों और देशों के उपभोग एवं आराम के स्तरों को हासिल करना चाहते हैं। कार्बन के उत्सर्जन में कमी से अमीर लोगों की पसंदीदा जीवनशैली में कोई अड़चन पैदा नहीं होगी। सर्दियों में जलवायु-सजग यूरोपीय और अमेरिकी एवं अमीर चीनी लोग जलवायु नियंत्रित घरों में गर्मियों के कपड़ों में आराम करते हैं। वे इस बात से खुश हैं कि ऊर्जा अक्षय ऊर्जा के स्रोत से आ रही है। वे कम ताप का उपभोग और ज्यादा गर्म कपड़े नहीं पहनते हैं। वे कम कार्बन उत्सर्जन वाली स्वच्छ तकनीकों को इस्तेमाल कर हर कल्पनीय जीवनशैली विलासिता का उत्पादन एवं उपभोग करते हैं। वे प्लास्टिक मुक्त गिलासों में शैंपेन गटकते हैं। कार्बन ऑफसेट के कारण उनका छुट्टियां बिताना ज्यादा महंगा होता है। लेकिन फिर भी वहनीय होता है क्योंकि उन्हें अमीर बनाए रखने वाले वैश्विक आर्थिक इंजन पर जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए उठाए जाने वाले कदमों का कोई असर नहीं हो रहा है।
दूसरा, हम अब भी संसाधनों के जीवनशैली और जीवन रक्षक उपयोग के बीच विभेद कर रहे हैं। जब तक ऊर्जा का उत्पादन कम कार्बन उत्सर्जन तकनीकों से होता है तो जलवायु कार्रवाई योद्धाओं को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि एक यूनिट ऊर्जा से किसी गरीब के घर में उजाला होता है या उससे कोई अमीर आराम से वातानुकूलित घर में रहता है। इसका मतलब है कि जलवायु कार्रवाई के अर्थशास्त्र के लिए ढांचागत मांग की संरचना के सवाल अप्रासंगिक हैं।
तीसरा, जलवायु कार्रवाई अमीर लोगों और देशों के लाभ एवं संचय पर नकारात्मक असर नहीं डालती है। अनुसंधानों में इस बात पर ध्यान दिया जा रहा है कि निजी खपत-कार, सेंट्रल हीटिंग, हवाई यात्रा के लिए स्वच्छ तकनीकों को कैसे व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बनाया जाए। कल के जैव ईंधन के उद्योगपति आज कम कार्बन-उत्सर्जन के अरबपति हैं। जलवायु कार्रवाई योद्धा इलेक्ट्रिक कारों के लिए लामबंद होते हैं। लेकिन सैन्य उद्योग के आकार को कम करने के लिए लामबंद नहीं होते  हैं, जहां जैव ईंधन का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है।
वित्त को जलवायु बॉन्ड, ‘मिश्रित’ वित्त और ‘संकटग्रस्त आस्तियों’ के पदनाम जैसे उत्पादों के जरिये लगातार पैसा कमाने में सक्षम बनाया गया है। हरित जलवायु कोष के लिए जानबूझकर जरूरत से कम वित्त मुहैया कराया जा रहा है ताकि यह दिखाया जा सके कि जलवायु पहल के लिए निजी वित्त ही एकमात्र विकल्प है। ऐसा करके जलवायु वित्त योद्धा अपने जलवायु निवेश को लाभप्रद बनाए रखने की खातिर निजी वित्त के लिए सार्वजनिक सब्सिडी की वकालत करते हैं।
अगर जलवायु संकट के समाधान के लिए उपभोग को एक प्रमुख बाधा के रूप में चिह्नित किया जाए तो चर्चा अलग होगी।
पहला, कुल कार्बन उत्सर्जन में एक चौथाई योगदान देने वाली खाद्य प्रणालियां जलवायु कार्रवाई के केंद्र में होंगी। गरीब लोगों और गरीब देशों को सस्ती दरों पर खाद्य उपलब्ध होना चाहिए। लेकिन इसे सक्षम बनाने वाली तकनीकों ने ही आम आदमी को लूटा है और लोगों को भूखा रहना पड़ रहा है। पर्यावरण कार्यक्रमों में शाकाहारी खाने की पैरवी करने के अलावा धनी लोग और देश महंगे ऑर्गेनिक खाद्य का इस्तेमाल करने लगे हैं, जबकि ज्यादातर आबादी के खानपान और पर्यावरण के स्तर में गिरावट आ रही है।
लेकिन इस बदलाव के लिए जलवायु कार्रवाई में कार्बन की जगह बराबरी की रणनीति को अपनाना होगा। खाद्य, आवास और कपड़ों के लिए ज्यादा बराबर उपभोग के अवसरों से कृषि, स्थानीय उत्पादन और शहरीकरण जलवायु कार्रवाई के केंद्र बिंदु बनेंगे। शहरीकरण और परिवहन, जल और भूमि के ज्यादा सार्वजनिक साझा उपभोग का मतलब होगा कि कारें कम होंगी और सार्वजनिक परिवहन के साधन अधिक होंगे तथा रहने, काम करने और सार्वजनिक सुविधाओं के लिए भूमि का ज्यादा समान उपयोग होगा।
नीति के लक्ष्य उच्च लेकिन प्रावधानों के सार्वभौमिक मानदंड होंगे। यह मौजूद स्थिति के विपरीत होंगे, जहां धनी कम कार्बन उत्सर्जन में काम करते हैं, जीते हैं, जबकि गरीबों को तीसरे दर्जे के सार्वजनिक प्रावधानों से काम चलाना पड़ता है। इसके लिए यह स्वीकार करना होगा कि मौजूदा जलवायु संकट कुछेक देशों में थोड़े से लोगों के गैर-आनुपातिक संपत्ति संग्रह से पैदा हुआ है, जिससे उत्पादन और उपभोग का अत्यधिक असमान पैटर्न है। यह जलवायु कार्रवाई का आधार होना चाहिए न कि केवल तकनीकों पर जोर देना।
लेकिन इसे लेकर कोई चर्चा नहीं हो रही है क्योंकि यह वह नहीं है, जो वैश्विक प्रगति का रास्ता तय करने वाले लोग चाहते हैं। असल में इसलिए उन्होंने जलवायु कार्रवाई का उपनिवेशवाद कर दिया है। महामारी के कारण वैश्विक बदलाव आया है, इसलिए यह हमारे साझा ग्रह के भविष्य को उपनिवेशवाद से मुक्त करने का अच्छा मौका है।
(लेखक ओडीआई, लंदन के प्रबंध निदेशक हैं। लेख में विचार व्यक्तिगत हैं)

First Published - December 22, 2020 | 12:13 AM IST

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