facebookmetapixel
Bharti Airtel Q3FY26 Results: मुनाफा 55% घटकर ₹6,631 करोड़, Arpu बढ़कर ₹259 पर आयाविदेश मंत्रालय का खंडन: NSA अजीत डोभाल नहीं गए अमेरिका… रुबियो से नहीं हुई कोई मुलाकातSIF में 360 ONE MF की एंट्री, DynaSIF Equity Long-Short Fund लॉन्च; किसके लिए सही निवेश?Suzlon Q3 Results: ₹445 करोड़ का मुनाफा, कमाई बढ़कर ₹4228 करोड़; फिर भी शेयर ने क्यों लगाया 4% का गोता ?भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर तेजी, मिड-मार्च तक औपचारिक समझौते का लक्ष्य: पीयूष गोयलBudget 2026 का टैक्स झटका, डिविडेंड और म्युचुअल फंड निवेश अब महंगे क्यों?₹200 तक जाएगा फर्टिलाइजर कंपनी का शेयर! हाई से 44% नीचे, ब्रोकरेज ने कहा – लॉन्ग टर्म ग्रोथ आउटलुक मजबूतशेयर, सोना, डेट और रियल्टी… ​कहां-कितना लगाएं पैसा? मोतीलाल ओसवाल वेल्थ ने बताई स्ट्रैटेजीStock market outlook: बजट के बाद किन सेक्टर्स में करें निवेश? एक्सपर्ट्स ने बताए नामTata Stock: नतीजों के बाद टाटा स्टॉक पर BUY की सलाह, गुजरात सरकार के साथ डील बन सकती है गेम चेंजर

बहुपक्षीयता संकट में: अमेरिका और चीन के प्रभाव से वैश्विक व्यवस्था कमजोर

अब जब व्हाइट हाउस यह मानता है कि वह समस्याओं को स्वयं हल कर सकता है, तो बहुपक्षीय प्रणाली के पास करने को बहुत कुछ बचा नहीं है

Last Updated- October 08, 2025 | 10:41 PM IST
Trump and Xi Jinping

क्या बहुपक्षीय व्यवस्था में अभी दुनिया को देने के लिए कुछ शेष है? अपनी तमाम खामियों और अक्षमताओं के बावजूद यह हाल तक एक ऐसी व्यवस्था बनी रही जिसके तहत वैश्विक महत्त्व के मुद्दों को उठाया जाना चाहिए और उठाया जाता रहा है। इस व्यवस्था में खामियां तब पैदा हुईं जब अमेरिका ने उन दशकों के दौरान स्थापित मानदंडों को भंग किया जब वह निर्विवाद रूप से वैश्विक नेतृत्व की भूमिका में था। चीन के एक विघटनकारी शक्ति के रूप में उभरने के बाद ये दरारें और गहरी हो गईं। अब जबकि डॉनल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका ने बहुपक्षीयता की अवधारणा के विरुद्ध सक्रिय रुख अपना लिया है तो ऐसा प्रतीत होता है कि व्यापक आर्थिक स्थिरता, व्यापार प्रबंधन और सुरक्षा संबंधी विवाद जैसे प्रमुख लंबित मुद्दों को अब बहुपक्षीय प्रणालियों के जरिये नहीं सुलझाया जा रहा है।

वृहद आर्थिक स्थिरता की बात करें तो विश्व युद्ध के बाद की व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ पर निर्भर रही है। बीते दशकों में आईएमएफ ने ही अर्जेंटीना को कई बार उबारा। पाकिस्तान के अलावा लैटिन अमेरिका का यह देश ही एक ऐसा मुल्क है जिसे बार-बार फंड की मदद की जरूरत पड़ी है। वह एक बार फिर मुश्किल में है। इस बार संकट अधूरे सुधारों और राजनीतिक अस्थिरता से उत्पन्न हुआ है। परंतु इस बार अमेरिकी वित्त विभाग ने इस मुल्क को बचाने के लिए खुद दखल दिया है।

गत सप्ताह अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसंट ने कहा कि अमेरिका और अर्जेंटीना 20 अरब डॉलर के एक पैकेज को लेकर चर्चा कर रहे हैं। इसके चलते अर्जेंटीना की मुद्रा में तेजी आई। बेसंट ने कहा कि अमेरिका, अर्जेंटीना को संकट से उबारने के लिए हर संभव प्रयत्न करेगा। तथ्य यह है कि आईएमएफ में ऐसा ऋण कार्यक्रम तैयार करने की क्षमता है और वह अर्जेंटीना को बेपटरी होने से बचाने के लिए जवाबदेही ढांचा तैयार कर सकता है। अमेरिकी वित्त विभाग के पास यह क्षमता नहीं है लेकिन उसके पास वह राजनीतिक प्रभाव है जो आईएमएफ के पास नहीं है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने बार-बार यह दावा किया है कि उनमें युद्ध समाप्त करवाने की क्षमता है। उन्होंने कई संघर्षों का उल्लेख भी किया है जिनके बारे में उनका कहना है कि उनकी मध्यस्थता के कारण वहां शांति स्थापित हुई। यहां तक कि गत सप्ताह उन्होंने गाजा के लिए एक नई शांति योजना पेश की। ट्रंप के दावों में कितनी सचाई है यह कोई मुद्दा नहीं है। मुद्दा यह है कि उन्होंने अमेरिकी शक्ति का प्रयोग करते हुए यह सब खुद करने का प्रयास किया है। वह इसे अपनी निजी सौदेबाजी क्षमता की देन मानते हैं।

सुरक्षा परिषद सहित संयुक्त राष्ट्र की इसमें कोई भूमिका नहीं है। संयुक्त राष्ट्र इकलौता ऐसा बहुपक्षीय संस्थान नहीं है जिस ट्रंप के कदमों ने अनुपयोगी सा बनाया हो। उन्होंने नए व्यापार समझौतों पर भी ध्यान दिया है। उनमें से कई ऐसे तैयार किए गए हैं कि वे अमेरिकी व्यापार और शुल्क नीतियों को असाधारण रूप से तवज्जो देते हैं। यह विश्व व्यापार संगठन के सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र यानी एमएफएन के सिद्धांत का उल्लंघन है। ध्यान रहे कि विश्व व्यापार संगठन की स्थापना में यह एक बुनियादी सिद्धांत रहा है। वह पहले ही विवाद निस्तारण के मंच के रूप में अपनी ताकत गंवा चुका था। अब व्यापार नीति में सभी देशों के साथ समान व्यवहार की बुनियादी भावना भी समाप्त हो चुकी है।

विश्व युद्ध के बाद की बहुपक्षीय व्यवस्था का उद्देश्य था शक्ति को यथासंभव सीमित रखना। शीत युद्ध के द्विध्रुवीय विश्व में इस प्रणाली की कुछ उपयोगिता थी, विशेष रूप से नए आजाद हुए और उपनिवेश-मुक्त देशों के संदर्भ में। एकध्रुवीय व्यवस्था के दशकों में इसने कुछ हद तक अमेरिका की कार्रवाइयों पर अंकुश लगाने का काम किया। लेकिन अब जबकि अमेरिका ने एक विघटनकारी रास्ता अपना लिया है, तो यह स्पष्ट हो गया है कि इस प्रणाली की अपनी कोई शक्ति नहीं है। इसकी शक्ति हमेशा उतनी ही रही, जितनी कि महाशक्ति ने उसे दी। अब जब व्हाइट हाउस यह मानता है कि वह समस्याओं को स्वयं हल कर सकता है, तो बहुपक्षीय प्रणाली के पास करने को बहुत कुछ बचा नहीं है।

First Published - October 8, 2025 | 9:25 PM IST

संबंधित पोस्ट