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कर्नाटक में भाजपा-जेडीएस गठबंधन कमजोर पड़ता दिख रहा

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देवेगौड़ा ने स्पष्ट किया कि मोदी के साथ व्यक्तिगत संबंध मजबूत हैं, बावजूद इसके JDS-BJP गठबंधन में कर्नाटक में स्थानीय चुनावों से पहले तनाव और मतभेद जारी हैं

Last Updated- October 17, 2025 | 11:26 PM IST
Modi Devegowda
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ पूर्व प्रधानमंत्री और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री देवेगौड़ा | फाइल फोटो

पिछले पखवाड़े एचडी देवेगौड़ा ने संवाददाता सम्मेलन बुलाकर उत्तर कर्नाटक में बाढ़ से निपटने के तरीकों के लिए प्रदेश की कांग्रेस सरकार की आलोचना की। जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) के 92 वर्षीय संस्थापक, पूर्व प्रधानमंत्री और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री देवेगौड़ा ने एक और महत्त्वपूर्ण बात कही। संवाददाताओं के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने स्पष्ट कहा, ‘पंचायत और विधान सभा सहित किसी भी चुनाव में (राष्ट्रीय जनतांत्रिक) गठबंधन को कोई खतरा नहीं होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मेरा रिश्ता कभी नहीं बदलेगा। हमारे संबंध अच्छे हैं, और पिछले 10 वर्षों में मैंने एक बार भी उनके बारे में कोई हल्की बात नहीं कही है।’

देवेगौड़ा ने जेडीएस की राजनीतिक स्वायत्तता को रेखांकित करते हुए कहा कि पार्टी का लक्ष्य बेंगलूरु में आगामी निकाय चुनावों में 50 से 60 सीटें जीतना है। इससे उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं और राजनीतिक पर्यवेक्षकों को स्पष्ट संकेत दिया- भले ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और जेडीएस के बीच गठबंधन में दरार डालने की को​शिशें हों लेकिन हमारे और प्रधानमंत्री मोदी के बीच व्यक्तिगत संबंध बहुत मजबूत हैं। ऐसा कोई भी प्रयास जोखिम भरा होगा। 

देवेगौड़ा का संदेश रणनीतिक रूप से उचित समय पर आया है। सितंबर 2023 में एक साथ आए भाजपा-जेडीएस के बीच तनाव दिखाई दे रहा है। संबंधों में ताजा दरार की जड़ कांग्रेस सरकार द्वारा बुकर पुरस्कार विजेता बानू मुश्ताक को विश्व प्रसिद्ध मैसूरु दशहरा उत्सव का उद्घाटन करने के लिए दिया गया निमंत्रण है।

इस मुद्दे पर भाजपा ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। भाजपा नेता और मैसूरु के पूर्व सांसद प्रताप सिम्हा ने संवाददाताओं से कहा,’मैं व्यक्तिगत रूप से बानू मुश्ताक का उनकी तमाम उपलब्धियों के लिए सम्मान करता हूं। जब वह अखिल भारत कन्नड़ साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता करती हैं तो वह स्वीकार्य है लेकिन दशहरा की नहीं जो एक हिंदू धार्मिक कार्यक्रम है, जो देवी चामुंडेश्वरी को पूजा अर्पित करने के साथ शुरू होता है। क्या उन्हें चामुंडेश्वरी देवी में विश्वास है? क्या वह हमारी परंपराओं का पालन कर रही हैं?’ । एक्स पर, केंद्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे ने इस निमंत्रण को ‘हिंदू भावनाओं का अपमान’ बताया। 

इसके विपरीत, केंद्रीय मंत्री और देवेगौड़ा के बेटे एचडी कुमारस्वामी ने सरकार द्वारा बानू मुश्ताक को दिए गए निमत्रण का समर्थन किया। उन्होंने कहा, ‘राज्य सरकार मुश्ताक को देवी चामुंडेश्वरी की शोभायात्रा का नेतृत्व करने में एक बड़ा संदेश और जिम्मेदारी देना चाहती है। मैं इस कदम का समर्थन करता हूं।’ सर्वोच्च न्यायालय ने भी फैसला सुनाया कि दशहरा जुलूस एक सांस्कृतिक कार्यक्रम है, न कि धार्मिक।

विपक्षी गठबंधन में मतभेद का यह एकमात्र मुद्दा नहीं है। पिछले महीने विनायक चतुर्थी के दौरान गणेश मूर्तियों के विसर्जन के समय मंड्या के मद्दुर में सांप्रदायिक झड़पें हुईं। उस समय दिल्ली में इलाज करा रहे कुमारस्वामी ने इस घटना से निपटने के लिए राज्य सरकार की कड़ी आलोचना की, लेकिन किसी भी धार्मिक समूह का पक्ष लेने से परहेज किया। उन्होंने कहा, ‘सभी समुदायों के लिए शांति का उद्यान बनाने का कुवेम्पु का सपना मंड्या जिले में साकार हुआ है लेकिन कुछ विभाजनकारी ताकतें व्यवस्थित रूप से शांति को नष्ट कर रही हैं।’

देवेगौड़ा के जीवन और राजनीति पर एक पुस्तक के लेखक सुगाता श्रीनिवासराजू ने कहा, ‘कर्नाटक में आंतरिक असंतोष से त्रस्त कांग्रेस सरकार की स्थिति अच्छी नहीं है। ऐसे में, खासकर अल्पसंख्यक समुदायों के बीच अपनी स्थिति को लेकर जेडीएस अपने विकल्पों का बहुत बारीकी से आकलन कर रही है।’

जेडीएस के लिए खतरा स्पष्ट है। प्रतिद्वंद्वी लगातार उसके वोट शेयर में सेंध लगाते जा रहे हैं। वर्ष 2023 के विधान सभा चुनाव में जेडीएस अकेले मैदान में उतरी, लेकिन उसका प्रदर्शन 2004 के बाद से सबसे खराब रहा। वर्ष 2018 में 37 की तुलना में उसे उक्त चुनाव में सिर्फ 20 सीटें ही मिलीं। उसका वोट शेयर भी 18.3 फीसदी से गिरकर 13.3 फीसदी पर आ गया। इसके बदले कांग्रेस और भाजपा दोनों का वोट शेयर बढ़ा। 

वक्त को करवट लेता देख जेडीएस ने लोक सभा चुनाव से पहले भाजपा के साथ हाथ मिलाने में देर नहीं लगाई। बाद में राजग सरकार बनने पर कुमारस्वामी केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिए गए। इसके बावजूद इस गठबंधन में तनाव की सुगबुगाहट है। कई मौकों पर दोनों पक्षों के स्थानीय नेताओं ने एक-दूसरे से अलग काम किया है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने भी कई बार अपनी राज्य इकाई को ऐसे कदम उठाने से परहेज करने की हिदायत दी, जिससे जेडीएस के नाराज होने का डर हो। 

इसका बड़ा उदाहरण पिछले साल मैसूरु चलो यात्रा रही, जो भाजपा ने जेडीएस के परामर्श से की थी। यह लगभग विफल हो गई, क्योंकि कुमारस्वामी ने एक क्षेत्र में इससे बाहर निकलने की चेतावनी दी थी। उनका तर्क था कि वह क्षेत्र जेडीएस का गढ़ था। जाहिर तौर पर 130 किलोमीटर की इस पदयात्रा में जेडीएस चाहती थी कि उसे अ​धिक प्राथमिकता दी जाए।

दिल्ली से हस्तक्षेप के बाद मतभेदों को दूर किया गया और यह यात्रा राज्य सरकार के खिलाफ संयुक्त विरोध-प्रदर्शन के रूप में आगे बढ़ी। राज्य भाजपा प्रमुख बीवाई विजयेंद्र के एक अभियान प्रबंधक ने स्वीकार किया, ‘लेकिन उसके बाद से कर्नाटक के उस हिस्से में ज्यादा कुछ नहीं हुआ है।’

भाजपा की कर्नाटक इकाई में नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता ने तनाव बढ़ाया ही है। कई राज्य इकाइयों के लिए नए प्रमुखों के नाम घोषित कर दिए गए हैं, लेकिन कर्नाटक के बारे में पार्टी फैसला नहीं ले पा रही है। इससे विजयेंद्र की ​स्थिति कमजोर हो रही है। वह न तो पूरी तरह से अंदर हैं और न ही बाहर। कुछ महत्त्वाकांक्षी नेता कर्नाटक में भाजपा इकाई के संचालन के तरीके की अलोचना करने के लिए जेडीएस के कंधे पर बंदूक रखकर निशाना साध रहे हैं।

इस बीच, भाजपा देवेगौड़ा के पोते प्रज्वल रेवन्ना को यौन अपराधों के लिए दोषी ठहराए जाने पर चुप है लेकिन इससे पार्टी असहज ​स्थिति में है। निजी तौर पर पार्टी नेता उस मामले को भयावह बता रहे हैं, लेकिन वे खुले तौर पर आलोचना से परहेज कर रहे हैं। हालांकि कई लोगों का दावा है कि जिस पेन ड्राइव के आधार पर रेवन्ना को दोषी ठहराया गया, उसे बाहर लाने में स्थानीय भाजपा नेताओं का ​हाथ था।

पिछले महीने ही केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी को कांग्रेस के आरोपों का खंडन करने के लिए मजबूर होना पड़ा कि भाजपा अपने गठबंधन के कारण ही जेडीएस के बारे में कुछ नहीं बोल पा रही है। उन्होंने संवाददाताओं से कहा, ‘हम कहां चुप हैं? मैं इस पर पहले ही बोल चुका हूं। यदि कोई अपराध करता है तो कार्रवाई की जानी चाहिए, यह भाजपा का स्पष्ट रुख है।’ हालांकि, विजयेंद्र के समर्थकों का मानना है कि जोशी की टिप्पणी उन्हें कमजोर करने के लिए की गई थी।

इस असहज गठबंधन के उलट देवेगौड़ा और मोदी के बीच व्यक्तिगत संबंध काफी मजबूत बने हुए हैं। दोनों ओर के प्रबंधकों का इस बात पर जोर रहता है कि दोनों नेता समय-समय पर बात करते रहें और संबंध सौहार्दपूर्ण बने रहें। लेकिन नवंबर या दिसंबर में कर्नाटक में होने वाले स्थानीय चुनाव इन संबंधों की असली परीक्षा होंगे। नि​श्चित रूप से भाजपा और जेडीएस के बीच हितों का टकराव होगा।

विजयेंद्र के एक करीबी सूत्र ने कहा, ‘हमें यकीन है कि मोदी जी और देवेगौड़ा जी चीजों को सुलझाने में सक्षम होंगे।’ इस बीच, जेडीएस कार्यकर्ता बेंगलूरु पर कड़ी नजर रख रहे हैं, जहां कांग्रेस की संभावित आंतरिक कलह दोबारा राजनीतिक समीकरणों को नया आकार दे सकती है।

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First Published - October 17, 2025 | 10:48 PM IST

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