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बजट में बुनियादी ढांचे पर दिया गया ध्यान

Last Updated- December 11, 2022 | 9:29 PM IST

यदि कर बढ़ोतरी को छोड़ दिया जाए तो बजट भाषणों की उन बातों के लिए शायद ही कभी आलोचना की जाती है जो संसद में उन्हें पढ़ते हुए कही जाती हैं। परंतु बजट भाषण की उन बातों को लेकर प्राय: हमेशा ही आलोचना की जाती है जो बातें उनमें शामिल नहीं की जातीं। यह बात बजट भाषण के भाग ए पर खासतौर पर लागू होती है जहां वित्त मंत्री उन सकारात्मक कदमों की सूची पेश करते हैं जो सरकार आने वाले वर्ष में देश से जुड़ी चुनिंदा चिंताओं को दूर करने के लिए उठाने वाली होती है।
चूंकि संसाधन सीमित हैं इसलिए वित्त मंत्री के सामने यह चुनौती भी रही कि कैसे विभिन्न समूहों के हितों के बीच संतुलन कायम किया जाए। ऐसे में बजट का आकलन करने के लिए यह देखना उचित होगा कि सरकार ने अपने लिए कौन सी प्राथमिकताएं तय की हैं। उसके बाद यह देखना होगा कि मंत्री ने उन्हें हासिल करने के लिए क्या राह चुनी है।
वित्त मंत्री ने बजट भाषण का अहम हिस्सा बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित करते हुए पढ़ा। राष्ट्रीय स्तर का बुनियादी ढांचा विकसित करने के लिए केंद्र सरकार सबसे अच्छी एजेंसी है इसलिए मंत्री की विविध मॉडल आधारित बुनियादी ढांचा और लॉजिस्टिक्स को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता सराहनीय है। देश में बुनियादी विकास की आवश्यकता है। इस क्षेत्र में निवेश निजी क्षेत्र को भी आकर्षित करता है, कारोबारी सुगमता की लागत कम करता है तथा नई किफायती आर्थिक गतिविधियों की राह प्रशस्त करता है।
ऐसे में बुनियादी ढांचा क्षेत्र में निवेश न केवल प्रत्यक्ष रोजगार तैयार करता है बल्कि इससे अप्रत्यक्ष रोजगार भी तैयार होते हैं। मेरी दृष्टि में भारत की पहली प्राथमिकता है रोजगार तैयार करना। महामारी के दौरान कई लोगों के रोजगार छिन गए, कई लोग जिनके रोजगार या आजीविका पूरी तरह नहीं छिने उनकी आय भी बीते दो वर्षों में काफी कम हुई है। अब जबकि हम आशा कर रहे हैं कि हम कोविड के बाद के दौर में प्रवेश कर रहे हैं, तब हमें न केवल अपने रोजगार दोबारा हासिल करने होंगे, बल्कि तेज गति से नए रोजगार भी तैयार करने होंगे ताकि महामारी के पहले का स्तर हासिल किया जा सके।
देश में युवाओं की तादाद बहुत ज्यादा है और वे चाहते हैं कि उन्हें रोजगार मिले। बुनियादी ढांचे के साथ स्वास्थ्य एवं पर्यटन अथवा स्वागत उद्योग भी रोजगार की काफी संभावना समेटे हुए क्षेत्र हैं। वित्त मंत्री ने दो बार पर्यटन का जिक्र किया: एक बार रोपवे बनाने की बात करते हुए और दूसरी बार जब उन्होंने 50,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आपात ऋण लाइन गारंटी योजना का उल्लेख किया जो खासतौर पर आतिथ्य और संबद्ध गतिविधियों के लिए है। यह अच्छा कदम है।
खेद की बात है कि स्वास्थ्य का जिक्र करते हुए उन्होंने केवल यह बताया कि कैसे स्वास्थ्य व्यवस्था को डिजिटल बनाया जा रहा है। इस डिजिटलीकरण के तीन सकारात्मक पहलू हैं। पहला, इससे स्वास्थ्य सेवाएं किफायती होंगी क्योंकि इससे न केवल व्यक्तियों बल्कि समुदाय के स्तर पर भी चिकित्सा का रिकॉर्ड तैयार होगा। इससे वर्तमान चिकित्सा प्रोटोकॉल को बेहतर बनाया जा सकेगा और साथ ही नए और प्रभावी प्रोटोकॉल के लिए चिकित्सा शोध किया जा सकेगा। दूसरा, इससे स्वास्थ्य प्रशासन को मदद मिलेगी, कोविन तथा टीकाकरण के अनुभव से हम यह देख चुके हैं। तीसरा, यह मानव संसाधन की आपूर्ति की कमी की समस्या को भी दूर करेगा। महामारी के दौरान टेली-मेडिसन को कानूनी समर्थन भी मिला और अब दूरदराज स्थित लोगों को समय पर चिकित्सा मुहैया कराना संभव है। बहरहाल, यदि रोजगार तैयार करना प्राथमिकता है तो मानव संसाधन में कमी दूर करने के लिए हमें स्वास्थ्य क्षेत्र में मानव संसाधन तैयार करना चाहिए।
मेरा तात्पर्य केवल चिकित्सकों और परिचारिकाओं से नहीं है क्योंकि उनमें तो वैसे भी प्रशिक्षण के बाद देश छोडऩे की प्रवृत्ति है। हमें हर प्रकार के पराचिकित्सकों (चिकित्सा सहायकों) की भी आवश्यकता है जिनमें से कुछ को जल्दी प्रशिक्षित करके उनकी सेवा ली जा सके। स्वास्थ्य क्षेत्र अर्थव्यवस्था के साथ विकसित होता है और आबादी के हर हिस्से में इसकी स्थिर मांग रहती है।
पैराग्राफ 51 के पहले वित्त मंत्री ने बताया कि गत दो वर्षों में किस प्रकार स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार हुआ है। यह सच है और हम शायद वायरस की तीसरी लहर से निपटने के लिए बेहतर तैयारी में हैं। परंतु ये सुधार विशिष्ट आपात स्थिति के लिए हैं। वास्तव में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए सुविचारित और नीतिगत तेजी की जरूरत है।
मैं रोजगार वाले क्षेत्रों पर इसलिए जोर दे रहा हूं क्योंकि लोगों ने आय और रोजगार गंवाए हैं। इसका असर वस्तुओं और सेवाओं की मांग पर पड़ा और कई उपक्रमों को नुकसान हुआ। सूक्ष्म और लघु उपक्रमों को उत्पादन प्रोत्साहन तथा सस्ता ऋण मुहैया कराने भर से वे दोबारा काम नहीं शुरू कर देंगे। उन्हें यह भरोसा होना चाहिए कि उनका उत्पाद बिकेगा। इसके लिए जरूरी है कि खरीदारों के पास पैसा हो, तभी मांग बढ़ेगी।
प्रथमदृष्टया मुझे इस बजट में ऐसा कुछ भी नहीं लगा जिसे मैं सीधे खारिज कर सकूं। मैं वित्त मंत्री द्वारा कुछ घोषणाओं को रेखांकित किए जाने वाले के रुख से अवश्य चिंतित हूं। सन 1991 के बाद हम बाजार आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़े हैं जहां सरकार बाजार में भागीदारी करने के बजाय केवल सहूलियत प्रदान करती है। खेद की बात है कि इस स्थिति में कुछ बदलाव दिख रहा है। ग्रीन बॉन्ड का उदाहरण लेते हैं। सन 2022-23 में अपनी बाजार उधारी के हिस्से के रूप में केंद्र सरकार सॉवरिन ग्रीन बॉन्ड लाएगी। इस तरह जुटाई गई राशि का इस्तेमाल सार्वजनिक उपक्रमों में कार्बन उत्सर्जन कम करने में किया जाएगा। इस पैसे का इस्तेमाल पूरी अर्थव्यवस्था (निजी-सार्वजनिक दोनों) में कार्बन का इस्तेमाल कम करने में क्यों नहीं होना चाहिए?
डिजिटलीकरण की कवायद को लेकर भी मुझे यही दिक्कत है। क्या वे सभी सार्वजनिक डिजिटल ढांचे हैं या उनमें से कुछ निजी नवाचार की संभावनाओं को क्षति पहुंचा रहे हैं? सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे में किया जाने वाला निवेश चाहे वह डिजिटल हो या अन्य तरह का, उसे कारोबार का उपाय होना चाहिए, न कि स्वयं कारोबार। कारोबार को निजी क्षेत्र के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए। बहरहाल, ये मसले सालाना बजट पर होने वाली चर्चा के दायरे के बाहर के हैं।
(लेखक आईडीएफ में अनुसंधान निदेशक हैं)

First Published - February 1, 2022 | 11:13 PM IST

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