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Editorial: सेमीकंडक्टर मिशन का दूसरा चरण: सरकारी मदद होगी अहम

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सेमीकंडक्टर मिशन को सरकार से अन्य प्रकार के समर्थन की तुलना में कहीं अधिक मात्रा में सब्सिडी प्राप्त हुई

Last Updated- September 03, 2025 | 9:41 PM IST
semiconductor

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सप्ताह नई दिल्ली में सेमीकंडक्टर उद्योग के लोगों से बातचीत में कहा कि भारत आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र में ‘महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी’ हासिल करेगा। वह भारत के सेमीकंडक्टर मिशन के बारे में बात कर रहे थे जिसे केंद्रीय मंत्रिमंडल ने दिसंबर 2021 में मंजूरी दी थी। अब इस मिशन के दूसरे चरण की योजना बनाई जा रही है और सरकार ने कहा है कि वह इसके लिए सहयोगी माहौल बनाने पर अपना ध्यान केंद्रित करेगी।

सेमीकंडक्टर मिशन को सरकार से अन्य प्रकार के समर्थन की तुलना में कहीं अधिक मात्रा में सब्सिडी प्राप्त हुई है। इस मिशन ने कुछ उल्लेखनीय सफलताएं भी हासिल की हैं। जैसा कि इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि एक परियोजना की पायलट लाइन पूरी हो चुकी है। यह परियोजना मुख्य रूप से सीजी पावर ऐंड इंडस्ट्रियल सॉल्यूशंस के स्वामित्व में है, जिसमें जापान से महत्त्वपूर्ण तकनीकी सहयोग मिला है। इस परियोजना के तहत भारत में बने पहले चिप प्रधानमंत्री के समक्ष प्रस्तुत किए जा चुके हैं।

मिशन के दूसरे चरण में उपयुक्त माहौल बनाने पर ध्यान देना एक तरह से स्वाभाविक बदलाव है। इसके लिए 76,000 करोड़ रुपये का जो आरंभिक बजटीय आवंटन किया गया उसे बार-बार दोहराना मुश्किल नजर आ रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि दूसरे चरण में शामिल छोटे और मझोले उपक्रमों को उनके पूंजीगत व्यय के साथ कम मदद की आवश्यकता होगी।

सरकार ने यह भी ध्यान दिया होगा कि कई निवेशकों द्वारा जगह का चयन इस बात से निर्धारित हो रहा है कि उन्हें कैसा माहौल मिल पा रहा है। उदाहरण के लिए सीजी और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स (ताइवान की पावरचिप के साथ) दोनों ने गुजरात में दहेज केमिकल्स क्लस्टर के निकट बनने वाले संयंत्रों में निवेश किया है। इससे उन्हें चिप उत्पादन प्रक्रिया के लिए जरूरी करीब 250 गैसें उपलब्ध हो सकती हैं। ऐसे चयन एक स्थायित्व वाली व्यवस्था की वकालत करते हैं और ऐसे में सरकार द्वारा सहायता करना सही प्रतीत होता है।

बहरहाल कई बातें ऐसी भी हैं कि जिन्हें सरकार को ध्यान में रखना चाहिए। पहली बात, सहयोग की प्रकृति रणनीतिक होनी चाहिए। भारत संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला का स्थानीयकरण करने की नहीं सोच सकता। इस मिशन को उन विशिष्ट क्षेत्रों पर प्रोत्साहन देने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जहां विदेशी निर्भरता, खासतौर पर चीन पर निर्भरता एक रणनीतिक जोखिम के रूप में देखी जा सकती है।

अनुमान्य विदेशी व्यापार नीति भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। यह निवेशकों को भरोसा दिला सकती है कि आपूर्ति श्रृंखला को बाधित नहीं किया जाएगा, भले ही अन्य भू-राजनीतिक मुद्दे सामने आएं। ऐसे तय नीतियों की कोई कीमत नहीं होती और इसे सेमीकंडक्टर मिशन का मुख्य हिस्सा माना जाना चाहिए। सरकार को समयसीमा के मामले में अपनी महत्त्वाकांक्षा का स्तर भी बढ़ाना चाहिए। कैबिनेट द्वारा फंड को मंजूरी देने और पहली परियोजना को मंजूरी देने में 18 महीने लग गए। इसकी तुलना में, इजरायल ने 2023 में इंटेल के लिए 3.2 अरब डॉलर की मंजूरी केवल छह महीनों में दे दी, और फिर भी इसे उन्होंने बहुत लंबा समय माना।

अमेरिका के चिप्स अधिनियम के तहत पहला अनुदान अधिनियम पारित होने के कुछ माह के भीतर दे दिया गया था। जापान की रैपिडस पहल के तहत केवल छह महीनों में धन दे दिया गया। चूंकि दूसरे चरण में पारिस्थितिकी तंत्र का समर्थन पहले चरण में किए गए निवेश निर्णयों को सहयोग देने के लिए है, इसलिए इसे अपेक्षाकृत तेज समयसीमा में पूरा किया जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय तुलना से यह भी स्पष्ट होता है कि भारतीय समर्थन की कुछ विशिष्टताएं हैं, जिनके कारण शायद घरेलू कंपनियों पर ध्यान केंद्रित करने का निर्णय लिया गया है।

मिशन द्वारा पूंजीगत व्यय में समानांतर समर्थन उस मॉडल से भिन्न है जो अन्य देशों में अपनाया गया है। जैसे कि अनुदान और ऋण गारंटी अक्सर प्रारंभिक और एक बार में दी जाने वाली सहायता होती है। ये मॉडल टीएसएमसी जैसे शीर्ष स्तरीय निर्माताओं को आकर्षित करने में अधिक सक्षम होते हैं, क्योंकि वे निवेश जोखिम को कम करते हैं और निवेशकों को यह विश्वास दिलाते हैं कि उन्हें दीर्घकालिक गैर-आर्थिक समर्थन भी मिलेगा, जैसे कि नियामकीय सहूलियतें। इस दृष्टिकोण के असर की समीक्षा भी दूसरे चरण में अवश्य की जानी चाहिए।

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First Published - September 3, 2025 | 9:36 PM IST

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