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भारत की एफडीआई कहानी: विदेशी निवेशकों को लुभा सकते है हालिया फैक्टर और मार्केट सुधार

पिछले पांच वर्षों में भारत में सालाना सकल एफडीआई प्रवाह 70 अरब डॉलर से 85 अरब डॉलर के बीच रहा। यानी इसमें सालाना केवल 2 फीसदी के इर्द-गिर्द चक्रवृद्धि हिसाब से बढ़त हुई है

Last Updated- December 31, 2025 | 9:52 PM IST
FDI
इलस्ट्रेशन- अजय मोहंती

पिछले कुछ महीनों में आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई)  बुनियादी ढांचे में अमेरिका की दिग्गज तकनीकी कंपनियों ने भारत में बड़े प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को लेकर प्रतिबद्धता जताई है। यह इस बात का संकेत है कि एफडीआई के लिहाज से भारतीय बाजार विदेशी निवेशकों को बहुत लुभा रहा है। खासकर, नए दौर के क्षेत्रों में भारत की अहमियत उनके लिए बढ़ गई है। हाल के वर्षों में भारत में विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में एफडीआई बढ़ा है। हालांकि, इसके साथ ही भारत से लाभ प्रत्यावर्तन (अर्जित लाभ स्वदेश भेजना) के साथ भारत से बाहर एफडीआई गया है जिससे शुद्ध विदेशी निवेश में कमी आ गई है।

पिछले पांच वर्षों में भारत में सालाना सकल एफडीआई प्रवाह 70 अरब डॉलर से 85 अरब डॉलर के बीच रहा। यानी इसमें सालाना केवल 2 फीसदी के इर्द-गिर्द चक्रवृद्धि हिसाब से बढ़त हुई है। हालांकि, इसकी गति बढ़ी हुई है और वित्त वर्ष 2025 में सकल एफडीआई प्रवाह में 18 फीसदी और वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में 16 फीसदी वृद्धि दर्ज हुई है। घरेलू बाजार का बड़ा आकार, कुशल कार्य बल की मौजूदगी और स्थिर आर्थिक वृद्धि ने भारत को तेजी से उभरते बाजारों में एक आकर्षक गंतव्य के रूप में स्थापित कर दिया है। भारत में सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं बिजली के उपकरण, इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) कलपुर्जे, आधार धातु और क्लाउड सर्विस तथा डेटा सेंटर जैसे डिजिटल उद्योग में एफडीआई काफी मजबूत रहा है।

दुनिया भर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति व्यवस्था की स्थिरता को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच बाहर से आने वाला एफडीआई कम रहा है। वैश्विक एफडीआई प्रवाह और वैश्विक जीडीपी अनुपात कोविड महामारी के बाद (2020-2024) के बाद गिरकर 1.5 फीसदी तक हो गया है जो 2010 और 2019 के बीच औसतन 2.7 फीसदी रहा था। इसके अलावा, पिछले एक दशक में वैश्विक एफडीआई की संरचना बदल रही है जिसमें बाहर जाने वाले एफडीआई में यूरोप की हिस्सेदारी घट रही है और अमेरिका की हिस्सेदारी स्थिर बनी हुई है। हालांकि, ऐसे एफडीआई में चीन की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है।

वैश्विक एफडीआई प्रवाह में पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं की हिस्सेदारी में गिरावट का असर भारत पर पड़ा है क्योंकि ये देश परंपरागत रूप से देश में इसके प्रमुख स्रोत रहे हैं। एफडीआई आकर्षित करने के मामले में वियतनाम और मेक्सिको जैसे देशों के साथ-साथ अफ्रीका के संसाधन-संपन्न देशों ने महत्त्वपूर्ण बढ़ोतरी दर्ज की है। भारत को एफडीआई आकर्षित करने में कुछ छोटे देशों से कड़ी टक्कर मिल रही है मगर हमारे अध्ययन में पता चला है कि भारत में एफडीआई निवेश पर औसत जोखिम समायोजित प्रतिफल (रिटर्न) काफी आकर्षक बना हुआ है।

हमने थोड़े समय अंतराल के साथ देश में आने वाले एफडीआई पर रिटर्न का अनुमान एफडीआई इक्विटी आय प्राप्तियों और किसी खास अवधि में कुल आवक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के अनुपात के रूप में व्यक्त किया है (ओईसीडी और यूरोस्टैट विधि से प्रेरित)। जोखिम समायोजित रिटर्न की गणना 10 साल के औसत रिटर्न और इसके मानक विचलन के अनुपात के रूप में की गई है। हमारे अध्ययन के अनुसार पिछले 10 वर्षों में भारत में एफडीआई पर औसत जोखिम समायोजित रिटर्न लगभग 7.3 फीसदी है जो इंडोनेशिया (10.6 फीसदी) के बाद दूसरे स्थान पर है। हमारी समीक्षा के अनुसार अन्य तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए जोखिम समायोजित रिटर्न मेक्सिको के मामले में 6.6 फीसदी, दक्षिण अफ्रीका के लिए 4.5 फीसदी और फिलीपींस के लिए 4.3 फीसदी है।

दिलचस्प बात यह है कि भारत में सकल एफडीआई बढ़ा है, लेकिन पिछले दो वर्षों में लाभ प्रत्यावर्तन और देश से बाहर एफडीआई प्रवाह भी तेजी से बढ़ा है। इससे भारत में शुद्ध एफडीआई प्रवाह पर असर पड़ रहा है। शुद्ध एफडीआई प्रवाह (सकल निवेश से मुनाफा अंतरण और भारत से एफडीआई निकासी को घटाकर) वित्त वर्ष 2020 के 44 अरब डॉलर से घटकर वित्त वर्ष 2025 में 1 अरब डॉलर रह गया है और कुछ सुधार के बावजूद वित्त वर्ष 2026 में भी कमजोरी जारी रही है। भारत से लाभ प्रत्यावर्तन स्वाभाविक रूप से नकारात्मक नहीं कहा जाएगा क्योंकि मुनाफा फिर से निवेश करने या वापस भेजने के निर्णय बहुराष्ट्रीय कंपनियों की वैश्विक रणनीति और पूंजी आवंटन की प्राथमिकताओं को दर्शाते हैं।

इसी तरह, देश से विदेश की तरफ एफडीआई का प्रवाह भारतीय कंपनियों द्वारा नए बाजारों और तकनीक तक पहुंच का दायरा बढ़ने का एक संकेत है। बाहर जाने वाला एफडीआई निवेश कोविड महामारी से पूर्व के वर्षों (वित्त वर्ष 2015-2019) के औसतन 8 अरब डॉलर से बढ़कर पिछले तीन वर्षों में औसतन 20 अरब डॉलर प्रति वर्ष हो गया है।

व्यापार एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के अनुसार 2024 में भारतीय निवेशकों द्वारा नई परियोजनाओं की घोषणाओं में 20 फीसदी इजाफा हुआ है। भारतीय कंपनियां अपनी वैश्विक पहचान का विस्तार कर रही हैं। खासकर, वे यूरोप, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका में दूरसंचार, मोटर वाहन, खनन, ऊर्जा, रक्षा, दवा, बंदरगाह और इस्पात जैसे विविध उद्योगों में निवेश कर रही हैं।

संक्षेप में कहा जाए तो हाल के वर्षों में भारत के लिए एफडीआई से जुड़ी चर्चा इस बात पर आधारित रही है कि भले ही सकल एफडीआई प्रवाह के माध्यम से पूंजी आ रही है मगर एक बड़ा हिस्सा बाहर भी जा रहा है। यह लाभ प्रत्यावर्तन या विदेश में निवेश के रूप में बाहर जा रहा है। इससे नतीजा यह हुआ है कि शुद्ध एफडीआई प्रवाह में कमी आई है। भारत में बाहर से आए निवेश यहां मिल रहे अवसरों को लेकर विश्वास बढ़ाते हैं जबकि इसका बाहर जाना भारतीय कंपनियों द्वारा मुनाफा कमाने और बाहरी निवेश के विस्तार को दर्शाता है। विदेश में भारतीय कंपनियों का निरंतर विस्तार वैश्विक पटल पर भारत की आर्थिक तरक्की को रेखांकित करता है और यह रुझान आने वाले वर्षों में जारी रहने और इसके और तेज होने की संभावना है।

आने वाले समय में भारत को स्थिर और विविध एफडीआई आकर्षित करने पर ध्यान केंद्रित करना जारी रखना होगा। वित्तीय और नियामकीय ढांचे में निरंतर सुधार और बुनियादी ढांचे पर ध्यान देने और माल परिवहन लागत कम करने के प्रयासों से भारत एफडीआई आकर्षित करने के लिहाज से एक मजबूत देश के रूप में अपनी पहचान और पुख्ता कर लेगा।

हाल में कारक बाजार जैसे सुधार और नई एवं सरल श्रम संहिता लागू होना सही दिशा की तरफ बढ़ाए गए कदम हैं। वैश्विक आर्थिक संपर्क को मजबूत करना, निवेश साझेदारी का विस्तार और कारोबार में सुगमता बढ़ाना विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण होंगे।


(सिन्हा केयरएज रेटिंग्स में मुख्य अर्थशास्त्री और मुखर्जी वरिष्ठ अर्थशास्त्री हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published - December 31, 2025 | 9:49 PM IST

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