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लोकतंत्र पर मंडराता अदालती खतरा

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Last Updated- December 14, 2022 | 1:11 AM IST
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जजों की नियुक्ति को लेकर इन दिनों कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच जारी जुबानी जंग बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। हालांकि, यदि इसके लिए किसी को जिम्मेदार ठहराना हो तो इसका दोष न्यायपालिका के हिस्से में ही अधिक आएगा। दरअसल, न्यायपालिका ने स्वयं को ऐसी शक्तियां प्रदान की हैं, जिनका संविधान में भी कोई उल्लेख नहीं था और यही पहलू टकराव के मूल में है।

कुछ दिन पहले की बात है जब न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाला पीठ सरकार पर कुपित था। उसके आक्रोश का कारण यह था कि सरकार नई नियुक्तियों को लेकर कॉलेजियम की सिफारिशों पर कुंडली मारे बैठी है।  न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि सरकार शायद इस बात से नाराज हो कि 2015 में शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) से जुड़ी उसकी पहल को खारिज कर दिया था, लेकिन उसे अदालत का फैसला मानना तो पड़ेगा। उन्होंने कहा, ‘यही देश का कानून है, जिसका सभी को पालन करना होगा।’

एक ऐतिहासिक विषयांतर दर्शाता है कि यह कथन कितना आत्म-विवर्धक है। फ्रांसीसी क्रांति द्वारा राजशाही को चुनौती देने से पहले 18वीं सदी में फ्रांस में दो उल्लेखनीय सम्राट हुए। एक लुई चतुर्थ और दूसरे लुई षष्ठम। उसमें लुई चतुर्थ का एक फ्रांसीसी कथन बहुत चर्चित है, जिसका सार यही था कि उसने स्वयं को ही राज्य का पर्याय करार दे दिया था। उसके कहने का यही अर्थ था कि ‘मैं ही राष्ट्र (या राज्य) हूं।’ वहीं लुई षष्ठम का अक्सर अपनी संसद के साथ विवाद हुआ करता था। उसने अप्रैल 1788 में संसद द्वारा पारित कानून को खारिज करते हुए यह कहा था, ‘जब मैं अपनी संसद से मिलता हूं तो इसका मकसद वहां रखे जाने वाले कानूनों पर होने वाली चर्चा को सुनना होता है, जिन कानूनों पर मैं अपने समक्ष प्रस्तुत किए गए तथ्यों के साथ निर्णय करता हूं। गत 19 नवंबर को भी मैंने यही किया। मैंने चर्चा सुनी।

जब तक मैं आपके विचार-विमर्श में उपस्थित नहीं होता, तब तक उन्हें सारांशित करने की कोई आवश्यकता नहीं…वहीं, जब मैं उपस्थित होता हूं तो मैं बैठक के लिए अपने भाव का स्वयं फैसला करता हूं। यदि संसद का बहुमत मेरी इच्छा के विरुद्ध जाने में सक्षम होता, तो राजशाही मजिस्ट्रेटों के कुलीन वर्ग से कुछ अधिक नहीं रह जाती।

यह राष्ट्र के अधिकारों और हितों के लिए उतना ही खतरनाक है, जितना संप्रभु के लिए।’ अब यदि उच्चतम न्यायालय को लुई षष्ठम के स्थान पर रख दिया जाए तो अपनी शक्तियों के प्रति न्यायपालिका के दृष्टिकोण को कुछ इस प्रकार समझाया जा सकता है, ‘हमने सुना है कि एनजेएसी के माध्यम से न्यायिक नियुक्तियों को लेकर संसद का क्या कहना है, लेकिन यहां न केवल हम उसकी व्याख्या करते हैं, बल्कि यह भी तय करते हैं कि कानून वास्तव में कैसा होना चाहिए।’ उच्चतम न्यायालय के पीठ के कहने का यही अर्थ है कि संसद द्वारा संविधान संशोधन हो सकता है और वह भी भले ही सर्वानुमति के साथ, लेकिन यह निर्णय हम ही करेंगे कि वह स्वीकार्य है या नहीं। और अंत में जो हम निर्णय करते हैं, वही देश का कानून है, न कि वह जिसे निर्वाचित एवं जवाबदेह विधि निर्माता प्रवर्तित करते हैं। इस पर कतई ध्यान न दें कि संविधान इस प्रकार की न्यायिक नियुक्तियों पर कुछ नहीं कहता।

संवैधानिक न्यायालयों में नियुक्ति को लेकर अनुच्छेद 124 (2) में उल्लिखित व्यवस्था के अनुसार, ‘सर्वोच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुहर के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय और राज्यों के उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श के बाद की जाएगी, जिन्हें राष्ट्रपति इस प्रयोजन-उद्देश्य के लिए आवश्यक समझ सकते हैं और वह 65 वर्ष की आयु तक अपने पद को धारण कर सकेगा, बशर्ते मुख्य न्यायाधीश के अलावा किसी अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति के मामले में, भारत के मुख्य न्यायाधीश से सदैव परामर्श किया जाएगा।’ फिर उच्चतम न्यायालय ने न्यायाधीशों के चयन और नियुक्ति के मामले में स्व-निर्मित कॉलेजियम व्यवस्था के बारे में कैसे पढ़ लिया, जिसमें सरकार के पास केवल समीक्षा का अधिकार है और अंतिम निर्णय कॉलेजियम का ही होता है। यह तो अनुच्छेद 124 (2) में उल्लिखित व्यवस्था के सर्वथा विपरीत है, जो इस संबंध में राष्ट्रपति (या कैबिनेट) को प्रमुख प्रस्तावक के रूप में रखता है।

स्पष्ट है कि उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 (1) के एक विशेष प्रावधान, जो उसे कानून बनाने की शक्ति प्रदान करता है, का उपयोग कर स्वयं को न्यायाधीशों के मुख्य नियोक्ता की भूमिका में गढ़ा है। अनुच्छेद 142 (1) के अनुसार, ‘उच्चतम न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्रों के प्रयोग में ऐसी डिक्री पारित कर सकता है या ऐसा आदेश दे सकता है, जो किसी भी लंबित मामले या मामले में पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक हो, और इस तरह से पारित कोई भी डिक्री या आदेश पूरे भारत के क्षेत्र में इस तरह से लागू किया जा सकता है, जैसा कि संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून द्वारा उसके तहत निर्धारित किया जा सकता है।

यह उपबंध उच्चतम न्यायालय को न केवल कानून की व्याख्या करने, बल्कि अपने कानून बनाने की गुंजाइश भी प्रदान करता है, भले ही संविधान उनके विषय में जो कहे। इस प्रकार यदि संसद कोई संविधान संशोधन करती है तो शीर्ष अदालत उसे खारिज कर सकती है। एक तरह से उच्चतम न्यायालय जो कहे, वही संविधान है।

हाल के वर्षों में विधि-निर्माण के मोर्चे पर अदालत ने अपनी पैठ बहुत गहरी की है। जीन संवर्धित सरसों पर सरकारी फैसले की वैधता से लेकर वैक्सीन नीति, दिल्ली में प्रवेश करने वाली एसयूवी गाड़ियों पर अतिरिक्त कर से लेकर राफेल विमान की सही कीमत का निर्धारण करना और हाईवे पर बार आदि जैसे तमाम मामलों पर उच्चतम न्यायालय सक्रिय रहा है। हाल में उसने पूछा है कि क्या चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तीन सदस्य पैनल द्वारा नहीं की जानी चाहिए, जिस पैनल में मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हों। स्मरण रहे कि चुनाव आयोग भी एक संवैधानिक संस्था है और कतिपय खामियों के बावजूद उसने हमारे चुनावों को निष्पक्ष एवं पारदर्शी बनाए रखा है।

यदि यह सिलसिला इसी प्रकार कायम रहा तो भविष्य में तब किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए यदि उच्चतम न्यायालय राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति प्रक्रिया में भी स्वयं को यह कहकर शामिल कर ले कि उसकी मंशा ऐसे संस्थानों के राजनीतिकरण को रोकने की है। वह जिस धड़ल्ले से लगभग हर तरह की कथित ‘जनहित याचिकाओं’ की सुनवाई को लेकर तत्पर है, उससे यही लगता है कि वह किसी भी ऐसे मामले में दखल दे सकता है, जो अभी विधायिका या कार्यपालिका के दायरे में आता है।
भारत में कार्यपालिका और नेताओं को दोष देने की एक परिपाटी है कि उन्होंने अपने हाथ में हद से ज्यादा शक्ति ले रखी है, लेकिन भारत में यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि उच्चतर न्यायपालिका निरंतर निरंकुश एवं गैर-जवाबदेह होती जा रही है।

अनुच्छेद 142 की समाप्ति के साथ ही अनुच्छेद 124 को संशोधन करने के पक्ष में दमदार दलीलें हैं, ताकि न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका और संसद की तार्किक भूमिका मुखरित हो सके। इस मामले में सरकार को सभी राजनीतिक धड़ों से संपर्क साधकर संसदीय सर्वानुमति बनानी चाहिए।

न्यायपालिका द्वारा विधि-निर्माण एवं शासन वाली व्यवस्था लोकतंत्र न होकर किटार्की कहलाती है। वस्तुतः, लोकतंत्र को अक्षुण्ण रखने वाली नियंत्रण एवं संतुलन की नाजुक व्यवस्था को न्यायपालिका ने किनारे कर दिया है। न्यायपालिका को लुई षष्ठम सरीखे अपने ढर्रे को निश्चित ही तिलांजलि दे देनी चाहिए।

(लेखक स्वराज्य पत्रिका के संपादकीय निदेशक हैं)

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First Published - December 13, 2022 | 11:23 PM IST

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