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उपभोक्ता धारणा में सुस्ती बरकरार रहने की उम्मीद

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Last Updated- April 27, 2023 | 11:54 PM IST
Consumer sentiments improve

मार्च 2023 में उपभोक्ता धारणाओं में वृद्धि धीमी हो गई थी। जनवरी और फरवरी के दौरान 4-5 प्रतिशत की वृद्धि दर दर्ज करने के बाद उपभोक्ता धारणाओं में मार्च में 1.2 प्रतिशत की धीमी वृद्धि देखी गई। अप्रैल के पहले तीन हफ्ते के आंकड़ों से पता चलता है कि मार्च की तुलना में उपभोक्ता धारणाओं में 2-3 प्रतिशत अधिक वृद्धि हो सकती है।

23 अप्रैल को 30 दिनों का गतिशील औसत उपभोक्ता धारणा सूचकांक मार्च के स्तर से 2.8 फीसदी अधिक था। हालांकि यह एक अलग सुधार की तरह दिखता है लेकिन जनवरी और फरवरी की तुलना में वृद्धि काफी कम है। हम बाद में देखेंगे कि यह वृद्धि पूरी तरह से आश्वस्त करने वाली नहीं है।

अप्रैल 2022 से मार्च 2023 के दौरान उपभोक्ता धारणाओं में औसत मासिक वृद्धि 2.68 प्रतिशत थी। इस अवधि के दौरान कोई गंभीर झटका नहीं लगा। फिर भी, उपभोक्ता धारणाओं में मासिक बदलाव कुछ हद तक अस्थिर था। यह बदलाव नवंबर के -1.7 प्रतिशत से लेकर सितंबर में 7.1 प्रतिशत तक था। अप्रैल 2023 में अपेक्षित वृद्धि वर्ष 2022-23 में देखी गई और यह औसत मासिक वृद्धि के करीब होगी।

अप्रैल में उपभोक्ता धारणाओं में अपेक्षित वृद्धि से संकेत मिलता है कि उपभोक्ता धारणाओं में कोई तेजी नहीं आई है जैसा कि 2023 की शुरुआत में लग रहा था। सीएमआईई के उपभोक्ता धारणा सूचकांक (आईसीएस) द्वारा मापी गई उपभोक्ता धारणाएं अब भी अपने महामारी पूर्व स्तर से नीचे ही है और यह तर्क दिया जा सकता है कि उपभोक्ता धारणाएं धीमी गति से बढ़ रही हैं। उपभोक्ता धारणाओं में धीमी और अस्थिर वृद्धि का मतलब है कि आईसीएस में महामारी से पहले के स्तर जितना सुधार होने में अभी कई महीने लगेंगे।

मार्च 2023 में आईसीएस 89.18 के स्तर पर था। सितंबर-दिसंबर 2015 में इसका आधार 100 है। फरवरी 2020 में आईसीएस 105.3 के स्तर पर था, लेकिन कोविड-19 प्रतिबंधों ने इसे बुरी तरह पस्त कर दिया। मार्च 2023 का आईसीएस कोविड से पहले के स्तर से 15.3 प्रतिशत कम था। अगर आईसीएस 2.68 प्रतिशत प्रतिमाह की दर से बढ़ता रहा जैसा कि यह पिछले 12 महीनों में औसतन वृद्धि करता रहा है तब उपभोक्ता धारणाएं सितंबर-अक्टूबर 2023 तक कोविड-पूर्व के स्तर पर वापस आ जाएंगी। यह भारत में त्योहारों के मौसम के समय पर होगा।

उपभोक्ताओं धारणाओं के लिए चुनौतियां इस साल मॉनसून के साथ अल नीनो के आसार बनने से खड़ी होंगी और इसके अलावा भारत में निजी निवेश में निरंतर सुस्ती का रुझान है। वर्ष 2023 में कई राज्यों में चुनाव होने वाले हैं और इसके चलते तेजी से मतदाताओं को लुभाने के लिए अतिरिक्त नकदी हस्तांतरित की जा सकती है जिससे संभवतः उपभोग का स्तर बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

लेकिन, इससे उपभोक्ता धारणाओं में तेजी लाने में मदद मिलने की संभावना नहीं है। एक बार के नकद हस्तांतरण से खाद्य पदार्थों और शराब की खपत बढ़ने की उम्मीद की जा सकती है। पैसे का उपभोग जल्दी ही कर लिया जाता है और इसका कोई स्थायी प्रभाव भी नहीं दिखता है। परिवारों को इन नकदी हस्तांतरण से आमदनी में वृद्धि होने की संभावना नहीं है। इसके अलावा इसकी संभावना भी कम ही है कि इस तरह के नकदी हस्तांतरण से परिवार बचत करने और उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं को खरीदने के लिए प्रेरित होंगे।

अगर परिवारों को आमदनी में वृद्धि नहीं दिखाई देती है या भविष्य की आमदनी में वृद्धि या उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं का उपभोग करने का रुझान नहीं समझ आता है तब भी उपभोक्ता धारणाओं में सुधार नहीं देखा जा सकता है।

वस्तु और सेवा प्रदाता चुनावों के दौरान पूंजी बनाते हैं। निश्चित रूप से इससे कुछ लोगों की आमदनी में वृद्धि हो सकती है और टिकाऊ उपभोक्ता सामान खरीदने के उनके रुझान में तेजी देखी जा सकती है। यकीनन, ये मध्यस्थ बड़े निर्वाचन क्षेत्र की तुलना में चुनाव के लाभार्थियों का एक छोटा सा हिस्सा हैं। इसलिए चुनाव केवल मामूली रूप से धारणाओं में सुधार लाने में मददगार हो सकते हैं लेकिन इससे अलनीनो के प्रभावों की भरपाई होने की संभावना नहीं है, यदि प्रभाव उतने ही गंभीर रहते हैं जितना कि उनके होने का खतरा है।

इस बात की संभावना अधिक है कि चुनाव और अलनीनो उपभोक्ता धारणाओं की अस्थिरता को बढ़ाएंगे। निजी निवेश में तेजी की कमी से उपभोक्ता धारणाओं में वृद्धि समान रह सकती है या प्रतिमाह लगभग 2.7 प्रतिशत से कम हो सकती है। अप्रैल के दौरान आईसीएस का प्रदर्शन 2023 के अपेक्षित रुझानों का एक अच्छा संकेतक है।

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यह कर्नाटक में चुनाव से पहले का महीना है। राज्य की 224 सीटों पर एक ऐसा चुनाव लड़ा जाएगा, जिसकी ज्यादातर रिपोर्टों के अनुसार इस चुनाव के नतीजों की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है। चुनावी मुकाबला काफी सख्त हो सकता है। कर्नाटक कोई छोटा राज्य नहीं है। फिर भी, आईसीएस में अब तक सुस्ती के रुझान बने हुए हैं। 9 अप्रैल को समाप्त सप्ताह में आईसीएस में 0.19 प्रतिशत और फिर 16 अप्रैल को समाप्त सप्ताह में 4.8 प्रतिशत की गिरावट आई। 23 अप्रैल तक आईसीएस के 30 दिनों के गतिशील औसत में देखी गई 2.8 प्रतिशत की वृद्धि मार्च के अंत तक आईसीएस की उच्च स्थिति को दर्शाती है।

जैसे-जैसे यह प्रभाव कम होता जाएगा, पहले दो हफ्तों की गिरावट महीने के सूचकांक पर हावी होगी। इससे अप्रैल का आईसीएस अब की तुलना में छोटा दिख सकता है।

जनवरी और फरवरी 2023 में उपभोक्ता धारणाओं में एक मजबूत बदलाव भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मजबूत वृद्धि दर्ज करने के लिए महत्वपूर्ण है। आईसीएस में बदलाव से पता चलता है कि परिवारों के पास उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं जैसी गैर-आवश्यक वस्तुओं पर खर्च करने के लिए क्या कीमत चुकानी होती है। इन पर खर्च करने का निर्णय न केवल आमदनी के प्रभाव को दर्शाता है बल्कि एक अमूर्त विश्वास को भी दर्शाता है कि भविष्य में आमदनी को लेकर भरोसा है और भविष्य में आर्थिक वातावरण निरंतर वृद्धि के अनुकूल है।

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संकट के समय या चुनाव के समय हस्तांतरण के माध्यम से आमदनी बढ़ाने से धारणाओं में सुधार नहीं हो सकता है। शायद, उपभोक्ताओं की धारणा को मजबूती देने का एकमात्र साधन रोजगार पैदा करने वाले निवेश को बढ़ावा देना है। हालांकि अब तक, इसमें तेजी के कोई संकेत नहीं हैं।

(लेखक सीएमआईई प्रा. लि. के एमडी और सीईओ हैं)

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First Published - April 27, 2023 | 10:43 PM IST

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