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कोरोना के बाद वायु प्रदूषण सबसे बड़ा स्वास्थ्य संकट! डॉक्टरों का दावा: फेफड़ा-दिल को हो रहा बड़ा नुकसान

डॉक्टरों का मानना है कि पिछले दस सालों में दिल की बीमारियां बढ़ने का बड़ा कारण मोटापा नहीं, बल्कि शहरों में गाड़ियों और हवाई जहाजों से निकलने वाला जहरीला धुआं है

Last Updated- December 26, 2025 | 11:49 AM IST
Air Pollution Crisis
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

Air Pollution Crisis: देश में कोरोना महामारी के बाद अब हवा का प्रदूषण सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्या बनकर उभर रहा है। ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय मूल के एक फेफड़ों के स्पेशलिस्ट डॉक्टर ने चेतावनी दी है कि अगर जल्दी कदम नहीं उठाए गए तो ये हर साल और खराब होता जाएगा। उन्होंने कहा कि फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां चुपके से बढ़ रही हैं, जिनका पता ही नहीं चल रहा और इलाज भी नहीं हो रहा। ब्रिटेन के कई बड़े डॉक्टरों ने न्यूज एजेंसी PTI से बताया कि ये अनदेखी बीमारियां एक बड़ी लहर की तरह आ रही हैं, जो लोगों की जान और स्वास्थ्य व्यवस्था पर भारी पड़ेंगी।

डॉक्टरों का मानना है कि पिछले दस सालों में दिल की बीमारियां बढ़ने का बड़ा कारण मोटापा नहीं, बल्कि शहरों में गाड़ियों और हवाई जहाजों से निकलने वाला जहरीला धुआं है। ये समस्या भारत, ब्रिटेन और दूसरे देशों की बड़ी शहरों में ज्यादा देखी जा रही है।

डॉक्टरों की सख्त चेतावनी

लिवरपूल में काम करने वाले कंसल्टेंट फेफड़ों के डॉक्टर मनीष गौतम, जो भारत की स्वास्थ्य मंत्रालय की कोविड सलाहकार समिति के पूर्व सदस्य भी रह चुके हैं, ने PTI से कहा कि उत्तर भारत में करोड़ों लोग पहले ही इस प्रदूषण से प्रभावित हो चुके हैं। उन्होंने चिंता जताई कि जो बीमारियां दिख रही हैं, वो सिर्फ हिमशैल की नोक हैं। नीचे एक बड़ी अनदेखी समस्या पनप रही है, जो फेफड़ों की गंभीर बीमारियां पैदा कर रही है। गौतम के मुताबिक, सालों की गंदी हवा से फेफड़ों का संकट बढ़ रहा है। उन्होंने सरकार से अपील की कि नीति बनाने वाले लोग जल्दी पता लगाने और इलाज पर ध्यान दें। साथ ही, तुरंत एक “लंग हेल्थ टास्क फोर्स” बनाने का सुझाव दिया।

गौतम के पास ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा में 20 से ज्यादा सालों का अनुभव है। उन्होंने कहा कि प्रदूषण रोकने के कदम जरूरी हैं, लेकिन अब ये अकेले काफी नहीं। भारत ने टीबी जैसी बीमारी पर काबू पाने के लिए बड़े स्तर पर काम किया है, जहां जल्दी जांच और सही इलाज से काफी फर्क पड़ा। अब फेफड़ों की बीमारियों के लिए भी वैसी ही तेजी और पैसा लगाने की जरूरत है। दिसंबर में दिल्ली के अस्पतालों में सांस की समस्या वाले मरीजों में 20 से 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई। इनमें कई ऐसे युवा थे जो पहली बार ऐसी दिक्कत का सामना कर रहे थे।

लंदन के सेंट जॉर्जेस यूनिवर्सिटी अस्पताल में मानद हृदय रोग विशेषज्ञ राजय नारायण ने कहा कि विज्ञान के मजबूत सबूत हैं जो हवा के प्रदूषण को दिल, सांस, दिमाग और पूरे शरीर की बीमारियों से जोड़ते हैं। अगर इसे नजरअंदाज किया गया तो स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर बोझ और बढ़ेगा। उन्होंने बताया कि छोटे-मोटे कदम तुरंत असर दिखा सकते हैं, लेकिन असली हल लंबे समय की नीतियां हैं जो साफ हवा पर जोर दें, कमजोर लोगों की रक्षा करें और सभी जिम्मेदारों को जवाबदेह बनाएं।

नारायण ने चेताया कि शुरुआती लक्षण जैसे सिरदर्द, थकान, हल्की खांसी, गले में जलन, पेट की दिक्कत, आंखों की सूखापन, त्वचा पर चकत्ते और बार-बार संक्रमण को लोग मामूली समझकर टाल देते हैं। लेकिन ये गंभीर लंबी बीमारियों के शुरुआती संकेत हो सकते हैं।

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Air Pollution में ट्रांसपोर्ट सेक्टर का बड़ा हाथ

केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने मंगलवार को माना कि दिल्ली में प्रदूषण का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा परिवहन क्षेत्र से आता है, क्योंकि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता ज्यादा है। उन्होंने साफ विकल्पों की जरूरत पर जोर दिया और जैव ईंधन अपनाने को बढ़ावा देने की बात कही।

बर्मिंघम के मिडलैंड मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी अस्पताल में हृदय रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर डेरेक कोनॉली ने कहा कि साफ दिखने वाले दिनों में भी प्रदूषित शहरों के लोग दिल के अनदेखे खतरों से घिरे रहते हैं। उन्होंने बताया कि दिल की बीमारियां धीरे-धीरे बढ़ती हैं, लेकिन कभी-कभी तेजी से बिगड़ जाती हैं। ये एक चुपके से मारने वाला खतरा है। ज्यादातर लोग अपनी जोखिम नहीं समझते क्योंकि महीन कण (PM) दिखाई नहीं देते और इन्हें ब्लड प्रेशर या कोलेस्ट्रॉल की तरह आसानी से नहीं नापा जा सकता। हम सब इससे प्रभावित हैं, यहां तक कि उन दिनों जब प्रदूषण कम लगता है।

कोनॉली ने पिछले दस सालों में दिल की बीमारियों के बढ़ने का कारण मोटापा बताने पर सवाल उठाया। उनका मानना है कि गाड़ियों और हवाई जहाजों से निकलने वाले जहरीले पदार्थों का इसमें बड़ा रोल है।

सरकारी बयान और आंकड़े

संसद के हालिया शीतकालीन सत्र में सरकार ने कहा कि हवा की गुणवत्ता सूचकांक (AQI) के ऊंचे स्तर और फेफड़ों की बीमारियों के बीच सीधा संबंध साबित करने वाला कोई पक्का डेटा नहीं है। हालांकि, उन्होंने माना कि हवा का प्रदूषण सांस की दिक्कतों और इससे जुड़ी बीमारियों को ट्रिगर करता है।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने संसद में दिए आंकड़ों में बताया कि दिल्ली में पिछले तीन सालों में सांस की तीव्र बीमारियों के दो लाख से ज्यादा मामले दर्ज हुए, जिनमें से करीब 30 हजार लोगों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा।

2025 की ‘द लांसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज’ रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में भारत में PM2.5 प्रदूषण से 17 लाख से ज्यादा मौतें हुईं। इनमें सड़क परिवहन के लिए इस्तेमाल होने वाले पेट्रोल से 2 लाख 69 हजार मौतों का योगदान था।

मई में इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन की वैश्विक स्टडी ने खुलासा किया कि सड़क परिवहन से निकलने वाले उत्सर्जन पर काबू पाने वाली नीतियां 2040 तक दुनिया भर में 19 लाख जानें बचा सकती हैं और बच्चों में 14 लाख नए अस्थमा के मामलों को रोक सकती हैं।

मेडिकल एक्सपर्ट ने बार-बार चेताया है कि हवा के प्रदूषण का जन स्वास्थ्य पर व्यापक असर पड़ रहा है और तुरंत हस्तक्षेप की जरूरत है। गौतम ने कहा कि सरकार का प्रदूषण नियंत्रण पर नया जोर जरूरी और देरी से आया है, लेकिन अब सिर्फ रोकथाम से काम नहीं चलेगा।

(PTI के इनपुट के साथ)

First Published - December 26, 2025 | 11:49 AM IST

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