facebookmetapixel
Q3 Results: DLF का मुनाफा 13.6% बढ़ा, जानें Zee और वारी एनर्जीज समेत अन्य कंपनियों का कैसा रहा रिजल्ट कैंसर का इलाज अब होगा सस्ता! Zydus ने भारत में लॉन्च किया दुनिया का पहला निवोलुमैब बायोसिमिलरबालाजी वेफर्स में हिस्से के लिए जनरल अटलांटिक का करार, सौदा की रकम ₹2,050 करोड़ होने का अनुमानफ्लाइट्स कैंसिलेशन मामले में इंडिगो पर ₹22 करोड़ का जुर्माना, सीनियर वाइस प्रेसिडेंट हटाए गएIndiGo Q3 Results: नई श्रम संहिता और उड़ान रद्द होने का असर: इंडिगो का मुनाफा 78% घटकर 549 करोड़ रुपये सिंडिकेटेड लोन से भारतीय कंपनियों ने 2025 में विदेश से जुटाए रिकॉर्ड 32.5 अरब डॉलरग्रीनलैंड, ट्रंप और वैश्विक व्यवस्था: क्या महा शक्तियों की महत्वाकांक्षाएं नियमों से ऊपर हो गई हैं?लंबी रिकवरी की राह: देरी घटाने के लिए NCLT को ज्यादा सदस्यों और पीठों की जरूरतनियामकीय दुविधा: घोटालों पर लगाम या भारतीय पूंजी बाजारों का दम घोंटना?अवधूत साठे को 100 करोड़ रुपये जमा कराने का निर्देश 

राजकोषीय-मौद्रिक सख्ती से बाजार पर दबाव, आय सुधरी तो विदेशी निवेशक लौटेंगे: नीलकंठ मिश्र

वित्त वर्ष 2025 में एक साथ राजकोषीय और मौद्रिक सख्ती देखी गई। राजकोषीय सख्ती लगभग 130 आधार अंक की थी, जबकि क्रेडिट वृद्धि में तेजी से गिरावट आई थी

Last Updated- December 26, 2025 | 10:14 PM IST
Neelkanth Mishra
ऐक्सिस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री और ऐक्सिस कैपिटल के वैश्विक शोध प्रमुख नीलकंठ मिश्र

ऐक्सिस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री और ऐक्सिस कैपिटल के वैश्विक शोध प्रमुख नीलकंठ मिश्र का कहना है कि राजकोषीय और मौद्रिक सख्ती पर एक साथ जोर ने अर्थव्यवस्था और बाजार पर दबाव डाला है। सुब्रत पांडा और समी मोडक के साथ साक्षात्कार में मिश्र ने कहा कि जब वृद्धि की रफ्तार अधिक स्पष्ट हो जाएगी, तो ऐसे विदेशी निवेशक लौट सकते हैं, जिन्होंने भारत में अपना निवेश कम कर दिया था। प्रमुख अंश:

इस साल भारतीय शेयरों ने वैश्विक बाजार की तुलना में खराब प्रदर्शन क्यों किया?

वित्त वर्ष 2025 में एक साथ राजकोषीय और मौद्रिक सख्ती देखी गई। राजकोषीय सख्ती लगभग 130 आधार अंक की थी, जबकि क्रेडिट वृद्धि में तेजी से गिरावट आई थी, जिससे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर लगभग 2 प्रतिशत अंक का दबाव आया। इसने विकास की गति को तोड़ दिया और 12 महीनों में आय में लगातार गिरावट आई। आय संशोधन के मामले में भारत सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला प्रमुख बाजार था, जिससे पता चलता है कि इक्विटी सूचकांक गिरावट के बजाय ज्यादातर स्थिर क्यों रहे।

Also Read: ETF Top Picks: मिरे असेट शेयरखान की पसंद बने ये 10 ईटीएफ, 3 साल में 25% तक की कमाई कराई

आय में गिरावट का बाजार प्रदर्शन पर क्या असर हुआ?

आमतौर पर, रोल-फॉरवर्ड इफेक्ट्स के कारण 12-महीने का आगामी आय अनुमान ऊपर की ओर जाता है। लेकिन पिछले एक साल में आय में कटौती ने इन फायदों को खत्म कर दिया जिससे आय की राह लगभग सपाट हो गई। आय में कोई वृद्धि न होने से बाजार भी खास ऊपर नहीं जा पाए। अब ऐसा लग रहा है कि यह दौर खत्म हो रहा है जो इक्विटी के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है।

विदेशी पूंजी की निकासी इतनी तेज क्यों थी?

अधिकांश वैश्विक बाजारों में तेजी के दौरान भारत का प्रदर्शन खराब रहा। इस कारण वैश्विक सूचकांकों में इसका भार कम हो गया। इससे पूंजी की निकासी बढ़ गई, खासकर पैसिव फंडों की वजह से। इसके अलावा भारत को ‘एआई में विफलता’ के तौर पर माना गया, जो कि गलत था। इसलिए भी कुछ निवेशकों ने भारत में कम निवेश किया और चीन, ताइवान और कोरिया जैसे एआई लाभार्थी देशों पर आवंटन बढ़ा दिया।

विदेशी निवेश में फिर से बहाली कैसे हो सकती है?

आय वृद्धि में सुधार अहम है। भारत की 12 महीने की आगामी आय में वित्त वर्ष 2026 में लगभग 14 प्रतिशत की बढ़ोतरी की उम्मीद है जो दुनिया भर में सबसे मजबूत में से एक है। इससे इंडेक्स भार बढ़ना चाहिए। जैसे-जैसे एआई के बारे में प्रचार संतुलित होगा और वृद्धि की रफ्तार स्पष्ट होगी, तो वे निवेशक वापस आ सकते हैं जिन्होंने भारत में निवेशघटाया था।

वित्त वर्ष 2026 और उसके बाद के लिए वृद्धि का क्या अनुमान है?

वृद्धि का रुझान फिर सामान्य हो रहा है। हमने इस उम्मीद से वित्त वर्ष 2026 के लिए 7 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया था कि राजकोषीय और मौद्रिक बाधाओं के कम होने से रफ्तार बहाल होगी। अगले साल राजकोषीय सख्ती लगभग 20 आधार अंकों तक कम होने की संभावना है। क्रेडिट वृद्धि – जो लगभग 12 प्रतिशत तक वापस आ गई है, को एक अनुकूल परिस्थिति के रूप में कार्य करना चाहिए। यह रुझान या रुझान से थोड़ा ऊपर की वृद्धि का समर्थन करता है।

Also Read: Year Ender: ग्लोबल बैंक के लिए बैंकिंग सेक्टर में फिर बड़ा मर्जर? क्या और घटेगी सरकारी बैंकों की संख्या

क्या इक्विटी मूल्यांकन मौजूदा स्तर से बढ़ सकते हैं?

मूल्यांकन पहले से ही ऊंचे हैं। इसलिए मल्टीपल में भारी बढ़त को सही ठहराना मुश्किल है। लेकिन, वैश्विक बाजारों की तुलना में भारत का वैल्यूएशन प्रीमियम अपने ऐतिहासिक दायरे के निचले स्तर पर है। अगले साल लगभग 7 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित इक्विटी मांग के साथ (जो संभावित रूप से आपूर्ति से अधिक है) एफपीआई के निवेश के बिना भी बाजार मजबूत बने रहने चाहिए। अगर एफपीआई वापस आते हैं औऱ डीआईआई भी रहते हैं तो मूल्यांकन को समर्थन और बेहतर हो सकता है।

Also Read: 2026 में कैसी रहेगी बाजार की चाल, निवेशक किन सेक्टर्स पर रखें नजर? मोतीलाल ओसवाल ने दिया न्यू ईयर आउटलुक

रुपये पर अल्पावधि में दबाव किस वजह से है?

दबाव काफी हद तक चक्रीय और प्रवाह-संचालित है। अल्पावधि में हम एफपीआई की बिक्री, वैश्विक स्तर पर जोखिम घटने और एफडीआई प्रत्यावर्तन में तेज वृद्धि देख रहे हैं। मजबूत इक्विटी बाजारों ने रणनीतिक निवेशकों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल फंड को आकर्षक मूल्यांकन पर निकलने में सक्षम बनाया है।

First Published - December 26, 2025 | 10:10 PM IST

संबंधित पोस्ट