facebookmetapixel
Advertisement
फॉरेस्ट एसेंशियल्स का अधिग्रहण करेगी एस्टी लॉडर कंपनीज, ब्रांड भारत में बनेगा नेतृत्व केंद्रFY27 के लिए इंडिया रेटिंग्स का अनुमान, यात्री वाहनों की बिक्री होगी नरमयूनिक्लो इंडिया का FY26 में 44% वृद्धि का लक्ष्य, भारत को ग्लोबल सोर्सिंग हब बनाएगीजीएसटी 2.0 के बाद फरवरी में वाहनों की खुदरा बिक्री रही टॉप गियर में, कुल बिक्री 24.1 लाखFMCG बाजार में ग्रामीण-शहरी अंतर घटा, तिमाही वृद्धि 7.8% पर धीमीरुपया डॉलर के मुकाबले 0.6% चढ़ा, आरबीआई के हस्तक्षेप से सुधारतीन दिन की गिरावट के बाद शेयर बाजार में जोरदार वापसी, सेंसेक्स 900 अंक चढ़ाअमेरिका से व्यापार करार में एशियाई प्रतिद्वंद्वियों से कम शुल्क दर पर भारत का जोरप​श्चिम ए​शिया में टकराव का असर: औद्योगिक क्षेत्र को गैस आवंटन में होगी कटौती!Editorial: टाटा संस की सूचीबद्धता पर फिर बढ़ा फोकस

Year Ender 2025: तमाम चुनौतियों के बीच सधी चाल से बढ़ी अर्थव्यवस्था, कमजोर नॉमिनल जीडीपी बनी चिंता

Advertisement

किसी को इस बात की उम्मीद नहीं थी कि भारतीय अर्थव्यवस्था चालू कैलेंडर वर्ष के पहले नौ महीनों में 7.4 से 8.2 फीसदी की वृद्धि दर से आगे बढ़ेगी

Last Updated- December 26, 2025 | 11:09 PM IST
GDP Growth Rate

साल 2025 के पहले 9 से11 महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था ने अमेरिकी शुल्कों सहित तमाम बाहरी चुनौतियों का डट कर मुकाबला करने के साथ दमदार प्रदर्शन भी किया है। हालांकि, आने वाला समय देश की अर्थव्यवस्था के लिए उतार-चढ़ाव भरा रह सकता है। आगे हालात खराब भले ही न हो मगर बहुत अच्छे रहने के आसार भी नहीं दिख रहे।

किसी को इस बात की उम्मीद नहीं थी कि भारतीय अर्थव्यवस्था चालू कैलेंडर वर्ष के पहले नौ महीनों में 7.4 से 8.2 फीसदी की वृद्धि दर से आगे बढ़ेगी। खासकर, 50 फीसदी अमेरिकी शुल्कों के पूरी तरह प्रभावी होने के साथ जुलाई-सितंबर तिमाही में अर्थव्यवस्था के तेजी से उछाल भरने की उम्मीद तो किसी को बिल्कुल नहीं रही होगी।

जब दुनिया की अन्य अर्थव्यवस्थाओं का दम फूल रहा था तब भारत की अर्थव्यवस्था ने न केवल अपनी रफ्तार तेज कर ली बल्कि सारी आशंकाओं को भी धूल चटा दी। नवंबर में वस्तुओं के निर्यात में 38 फीसदी वृद्धि से पता चलता है कि भारत ने दुनिया के अन्य बाजारों में अपने लिए गुंजाइश बनाकर ट्रंप के शुल्कों का मजबूती से मुकाबला किया है।

पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद् प्रणव सेन कहते हैं, ‘ट्रंप द्वारा लगाए शुल्कों का अल्प अवधि में भारत पर अधिक असर नहीं हुआ है।’ हालांकि, आंकड़ों की पड़ताल करने पर चुनौतियां साफ नजर आती हैं। भारत की वास्तविक आर्थिक वृद्धि दर (स्थिर कीमतों पर) ने विशेषज्ञों को जरूर चौंका दिया है मगर नॉमिनल जीडीपी को लेकर डंका पीटने का कोई कारण मौजूद नहीं है।

चालू कैलेंडर वर्ष में लगातार दो तिमाहियों के दौरान नॉमिनल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर दो अंक से नीचे आ गई। चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही (अप्रैल से सितंबर) में नॉमिनल जीडीपी वृद्धि दर महज 8.8 फीसदी दर्ज हुई है। यह आंकड़ा इसलिए निराशाजनक है क्योंकि यह पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के लिए बजट में अनुमानित 10.1 फीसदी दर से काफी नीचे है।

कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि नॉमिनल जीडीपी की तुलना में वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर अधिक मायने रखती हैं। ऐसे लोगों को इस तथ्य पर जरूर गौर करना चाहिए कि जीडीपी आंकड़ों की गणना पहले मौजूदा मूल्य पर की जाती है। इसके बाद जीडीपी डिफ्लेटर (प्रत्येक खंड में मूल्य में अंतर, थोक और खुदरा दोनों मिलाकर) के जरिये नॉमिनल आंकड़े निर्धारित कर वास्तविक आंकड़े प्राप्त किए जाते हैं। इसके अलावा, नॉमिनल जीडीपी या अर्थव्यवस्था का आकार कर संग्रह के साथ-साथ राजकोषीय घाटा जैसे प्रमुख अनुपातों का निर्धारण करता है।

राज्यों को हस्तांतरण के बाद केंद्र का कर राजस्व चालू वित्त वर्ष के पहले सात महीनों में 12.7 लाख करोड़ रुपये रहा, जो 2024-25 की इसी अवधि से 2.3 फीसदी कम है। माल एवं सेवा कर (जीएसटी) की दरों में कमी और नई आयकर व्यवस्था के अंतर्गत छूट की सीमा बढ़ाने के बाद अगर मांग नहीं बढ़ती है तो राजस्व और कम रह सकता है।

अगर सरकार चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा 15.69 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर रोकने में सफल रहती है तो भी नॉमिनल जीडीपी कम रहने के कारण इसे बजट में तय लक्ष्य 4.4 फीसदी पर समेट पाना मुश्किल हो जाएगा।

जुलाई से सितंबर तिमाही में चालू खाते का घाटा 1.3 फीसदी के स्तर पर कम जरूर है और मौजूदा तिमाही में भी इसके कम रहने की उम्मीद है मगर देश से पूंजी का निकलना रुपये पर अतिरिक्त दबाव डाल रहा है, जो हाल में अमेरिकी मुद्रा डॉलर की तुलना में काफी फिसल चुका है।

पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद् प्रणव सेन का कहना है कि देश से निर्यात के आंकड़ों पर फिलहाल ट्रंप के शुल्कों का असर इसलिए नहीं पड़ा है क्योंकि ऑर्डर (निर्यात के) पहले ही दे दिए गए थे और बाद में कुछ दूसरे बाजारों के द्वार भी खुल गए। हालांकि, सेन को लगता है कि आने वाले समय में यह रुझान शायद ही जारी रह पाएगा और वैश्विक मंदी के बीच अमेरिकी बाजार के नुकसान की भरपाई नए निर्यात बाजारों से नहीं हो पाएगी। वह कहते हैं, ‘ट्रंप शुल्क अब असर डालना शुरू कर देंगे।’

इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडीज इन कॉम्प्लेक्स चॉयसेस (आईएएससीसी) के सह-संस्थापक अनिल सूद का कहना है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौता होने में देरी से हुए नुकसान की निर्यात बढ़ाने के एहतियाती कदमों से भरपाई हो गई। शुल्क पूरी तरफ प्रभावी होने से पहले ये निर्यात बढ़ाने के उपाय शुरू हो गए थे।

सूद कहते हैं, ‘अगर इस महीने व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए तो हमें अगली कुछ तिमाहियों में शुल्कों के असर की पड़ताल करने की जरूरत महसूस होने लगेगी।’

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने अमेरिकी शुल्कों के बाद राज्य के निर्यात पर आश्रित उद्योगों को संकट से उबारने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिखा है। स्टालिन ने केंद्र से तत्काल द्विपक्षीय समाधान करने का आग्रह किया है और आगाह किया है कि अगर यह मुद्दा अनसुलझा रहता है तो इसके गंभीर आर्थिक एवं सामाजिक परिणाम होंगे।

उन्होंने कहा कि अकेले तिरुपुर में निर्यातकों को मिले 15,000 करोड़ रुपये के ऑर्डर रद्द हो गए हैं और उत्पादन भी 30 फीसदी तक कम हो गया है। उन्होंने कोयंबटूर, तिरुपुर, इरोड और करूर जैसे राज्य के पश्चिमी हिस्सों के प्रमुख संकुलों में लगभग 60 करोड़ रुपये के संयुक्त दैनिक राजस्व नुकसान की आशंका जताई है। अगर यही नौबत आगे भी रही तो कर्मचारियों के वेतन पर भी असर पड़ सकता है, खासकर बाह्य व्यापार से जुड़े लोगों के लिए हालात मुश्किल हो सकते हैं। वर्ष 2023-24 (जुलाई-जून) के दौरान अंशकालिक कामगारों के नॉमिनल वेतन में केवल 3.7 फीसदी की वृद्धि हुई थी।

सेन का मानना है कि वेतन में ठहराव या मामूली वृद्धि से कम मुद्रास्फीति के बावजूद खपत कम रह सकती है जिससे आर्थिक प्रगति बाधित हो सकती है। मुद्रास्फीति में गिरावट आ रही है और नवंबर में खुदरा महंगाई 3 फीसदी से नीचे और थोक मूल्य के मामले में यह ऋणात्मक (अपस्फीति) रही।

सूद कहते हैं, ‘इस अपस्फीति की वजह जिंसों की कीमतों में कमी रही है या उत्पादकता में महत्त्वपूर्ण सुधार या मांग में कमी? अगर हम इसकी वजह खाद्य वस्तुओं की कीमतों में गिरावट मानते हैं तो शहरी परिवारों के लिए कम कीमतों के असर का आकलन किसानों की शुद्ध कमाई में कमी के संदर्भ में करना चाहिए। वह कहते हैं कि फिलहाल मांग में अपेक्षाकृत कम वृद्धि के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था एक मुश्किल दौर से गुजर रही है।

Advertisement
First Published - December 26, 2025 | 11:02 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement