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लीज होल्ड से फ्री होल्ड हों वाणिज्यिक संपत्तियां

संपत्ति को फ्री होल्ड करने की मांग जोर-शोर से उठती रही है। लीज होल्ड व्यवस्था में किसी व्यक्ति के पास संपत्ति तय अवधि के लिए होती है।

Last Updated- February 04, 2024 | 9:47 PM IST
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जब शहरीकरण के शुरुआती वर्षों पर नजर डालते हैं तो पता चलता है कि निरपवाद रूप से शहरी विकास और औद्योगीकरण की प्रक्रिया साथ-साथ चलती दिखती है। बड़ी संख्या में रोजी-रोटी की तलाश में भटकते लोगों को उद्योगों और कारखानों ने अपनी ओर आकर्षित किया।

उद्योगों-कारखानों में काम करने वाले ये लोग आसपास ही बस गए। नतीजतन नए शहर विकसित हुए। बढ़ती आबादी के साथ इन तथाकथित औद्योगिक शहरों ने अपने निवासियों के लिए अस्पताल, स्कूल और नगर पालिका जैसी बुनियादी सेवाओं की स्थापना के लिए प्रेरित किया।

जैसे-जैसे विकास की गति बढ़ी, इन शहरों में बड़े-बड़े शॉपिंग कॉम्प्लेक्स खड़े होते गए, जिनमें मनोरंजन और सुख-सुविधाओं के सभी साधन उपलब्ध थे। इस तरह और अधिक लोग इन शहरों की तरफ आकर्षित हुए। इससे आबादी में वृद्धि के साथ-साथ शहरों में उद्योगों और कारखानों से अलग हटकर वाणिज्यिक क्षेत्रों की मांग भी बढ़ने लगी।

जैसे-जैसे काम की प्रकृति बदली, उसी हिसाब से जगह की मांग बढ़ती और बदलती गई। दुकानों तथा कार्यालयों के पारंपरिक इस्तेमाल से आगे जाकर जगह का नवोन्मेषी उपयोग होने लगा और इसने दुकानों-कार्यालयों के को-वर्किंग यानी सह-उपयोग (जहां कई कंपनियों या व्यक्तियों को एक साथ काम करने की सुविधा हो) के रूप में मिली-जुली संस्कृति को बढ़ावा दिया।

नतीजतन, शहरी क्षेत्रों में वाणिज्यिक संपत्तियों की कीमतों में बहुत तेजी से वृद्धि हुई। इसने निवेशकों की आंखें खोल दीं, जिन्होंने अभी तक उपयोग से अछूते रहे इस शहरी कमर्शियल रियल एस्टेट क्षेत्र में छुपी संभावनाओं को ताड़ लिया।

संपत्तियों की लगातार बढ़ती कीमतों या बाहरी कारकों से आकर्षक रियल एस्टेट हमेशा एक गतिशील क्षेत्र रहा है। जहां कार्यालयों के हिसाब से जगह अधिक अनुकूल हुई, उसके आसपास के क्षेत्र रिहायश, सुख-सुविधाओं और परिवहन संपर्क आदि के लिहाज से पहली पसंद बनते गए। यहां तक कि इनके आसपास और अधिक ऑफिस स्पेस (कार्यालयी उपयोग की जगह) विकसित होती गई।

देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियों और निगमों के कार्यालय खुलने के साथ विशेष तौर पर शहरों के प्रमुख हिस्सों में वाणिज्यिक संपत्तियों की मांग बढ़ी तो इससे इन संपत्तियों के महत्त्व और आसपास गतिविधियां बढ़ने के मद्देनजर प्रॉपर्टी ट्रांसफर, इस्तेमाल, मालिकाना हक और बिक्री जैसे पहलुओं से सुव्यवस्थित तरीके से निपटने के लिए नियम-कानूनों की संख्या बढ़ती गई।

रियल एस्टेट के मालिकाना हक जैसे मुद्दों को हल करने के लिए भारत में सबसे शुरुआती कानूनों में ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी ऐक्ट है, जो 1882 में अस्तित्व में आया। इस कानून में संपत्ति के बिक्री, पट्टे, गिरवी या तोहफे के माध्यम से मालिकाना अधिकार संबंधी प्रावधान हैं। रियल एस्टेट सेक्टर में उपभोक्ताओं के हितों को सुरक्षित रखने के लिए सन 2016 में भू-संपदा (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2016 बना। इस कानून के माध्यम से ही इस उद्योग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने को रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण बनाया गया।

वाणिज्यिक संपत्तियां दो प्रकार की यानी लीज होल्ड और फ्री होल्ड होती हैं। शहरी गतिशीलता और आर्थिक वृद्धि वाणिज्यिक संपत्ति क्षेत्र को आकार देती है। संपत्ति को फ्री होल्ड करने की मांग जोर-शोर से उठती रही है। लीज होल्ड व्यवस्था में किसी व्यक्ति के पास संपत्ति तय अवधि के लिए होती है। बस, वह सरकार को उस संपत्ति के इस्तेमाल के बदले किराया देता रहता है। ऐसे मामले में संपत्ति का हस्तांतरण एक व्यक्ति से दूसरे को नहीं किया जा सकता। पट्टेदार पर सरकार का नियंत्रण रहता है।

दूसरी ओर, फ्री होल्ड व्यवस्था में संपत्ति या भूमि पर मालिक का पूरा हक होता है। इस प्रकार की जमीन पर मालिक व्यक्ति का पूरी तरह नियंत्रण रहता है और वह इसका किसी भी तरह इस्तेमाल या उसमें बदलाव करने के लिए स्वतंत्र होता है। मौजूदा समय में हमारे शहरों में लीज होल्ड और फ्री होल्ड दोनों तरह की व्यवस्था चल रही है।

चंडीगढ़ में तो 6,000 वाणिज्यिक संपत्तियां और 1,500 औद्योगिक प्लॉट लीज पर हैं यानी इन संपत्तियों के मालिकाना हक सरकार के पास हैं और मौजूदा कब्जेदार एक सीमित अवधि के लिए ही उनका इस्तेमाल कर सकते हैं। हालांकि केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन ने संपत्तियों को लीज होल्ड से फ्री होल्ड में बदलने का कड़ा विरोध किया है।

यही कारण है कि कई बार नीलामी और कीमतों में 30 फीसदी तक कमी होने के बावजूद बहुत सी वाणिज्यिक संपत्तियां बिकी ही नहीं हैं और करोड़ों रुपये की संपत्तियां खाली पड़ी हैं। इस स्थिति ने कई वाजिब कारणों से एक बार फिर संपत्तियों को लीज होल्ड से फ्री होल्ड में बदलने की जरूरत पर बल दिया है।

लीज होल्ड प्रॉपर्टी के पट्टेदार को कानूनी बाध्यताओं, गिरवी रखने में परेशानी और संपत्ति की खरीद-बिक्री प्रक्रिया में अड़चनों जैसी बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसके उलट कोलकाता में राज्य सरकार ने संपत्तियों को फ्री होल्ड में बदलने का सकारात्मक कदम उठाया है। सरकार के इस कदम की खूब सराहना की जा रही है, क्योंकि इससे औद्योगिक परियोजनाओं और सुविधाओं को व्यवस्थित तरीके से लागू करने में आसानी होगी और बैंकों से ऋण लेने में भी दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ेगा।

शहरीकरण के बीच वाणिज्यिक संपत्तियों का विकास यह दर्शाता है कि आर्थिक मांग, कार्य स्थिति और नियामकीय ढांचे का उभार परस्पर गतिशील बना हुआ है। उच्च कीमत, निवेशकों के आकर्षण, लंबी अवधि के लिए सुरक्षा भाव और किसी भी तरह के बदलाव की अधिक आजादी के चलते फ्री होल्ड संपत्तियों को लोग ज्यादा पसंद करते हैं।

इससे भी बढ़कर इस प्रकार की संपत्तियां लचीलापन,अधिक लाभ और लंबी अवधि के लिए वित्तीय स्थिरता देती हैं। कुछ इन्हीं फायदों के चलते फ्री होल्ड संपत्तियां लीज होल्ड पर भारी पड़ती हैं। इसलिए सरकार और स्थानीय प्रशासन को सक्रियता दिखाते हुए संपत्तियों को फ्री होल्ड में बदलने की प्रक्रिया को मंजूरी देनी चाहिए।

(कपूर इंस्टीट्यूट फॉर कंपीटिटिवनेस इंडिया के अध्यक्ष और स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी, यूएसएटीएमसी के लेक्चरर हैं। देवरॉय प्रधानमंत्री की आ​र्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन हैं। आलेख में जेसिका दुग्गल का भी योगदान)

First Published - February 4, 2024 | 9:47 PM IST

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