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राज्यों का पूंजीगत व्यय

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Last Updated- January 17, 2023 | 9:39 PM IST

महामारी के कारण मची उथलपुथल के बाद राज्य सरकारों की वित्तीय स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने राज्य सरकारों की वित्तीय स्थिति पर जो वार्षिक रिपोर्ट पेश की है उसके मुताबिक राज्यों का समेकित सकल राजकोषीय घाटा 2020-21 के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.1 फीसदी से कम होकर 2021-22 में 2.8 फीसदी रह गया। ध्यान रहे 4.1 फीसदी का घाटा 2004-05 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर था।

घाटे में यह कमी इसलिए आई क्योंकि अर्थव्यवस्था महामारी से उबर रही थी जिसके चलते कर राजस्व में इजाफा हुआ था। चालू वित्त वर्ष की बात करें तो समेकित स्तर पर राज्यों ने घाटे के जीडीपी के 3.4 फीसदी रहने का अनुमान जताया है जो केंद्र द्वारा तय दायरे के भीतर नजर आता है। राजस्व की स्थिति देखें तो राज्यों को अपना लक्ष्य हासिल कर लेना चाहिए। उन्होंने घाटे के प्रबंधन में अच्छा काम किया है लेकिन कर्ज को कम करने के लिए निरंतर प्रयास करने होंगे।

उल्लेखनीय सुदृढ़ीकरण के अलावा यह देखना भी उत्साहवर्द्धक है कि राज्यों के स्तर पर भी व्यय की गुणवत्ता में सुधार आया है। अनुमान है कि राज्यों का समेकित पूंजीगत आवंटन 2021-22 में 31.7 फीसदी बढ़ा है। इस वित्त वर्ष में इसके 38 फीसदी से अधिक बढ़ने का अनुमान है। अगर इसे दूसरी तरह से देखा जाए तो राज्यों का पूंजीगत आवंटन 2021-22 के जीडीपी के 2.3 फीसदी से बढ़कर चालू वर्ष में 2.9 फीसदी हो जाने का अनुमान है। पूंजीगत व्यय और राजस्व का अनुपात भी सुधरा है।

वृद्धि की संभावनाएं बढ़ाने में पूंजीगत व्यय की भूमिका को लेकर जहां जरूरत से अधिक जोर नहीं दिया जा सकता है वहीं राज्य स्तर पर उच्च आवंटन अहम है क्योंकि आम सरकारी पूंजीगत व्यय में उनकी हिस्सेदारी अधिक होती है। रक्षा पर केंद्र सरकार के पूंजीगत व्यय के समायोजन के बाद राज्यों की हिस्सेदारी कुल पूंजीगत आवंटन में करीब 70 फीसदी रहती है। इसके अलावा राज्यों के पूंजीगत व्यय का गुणक भी केंद्र की तुलना में अधिक होने का अनुमान है।

हालांकि राज्यों ने हाल के वर्षों में व्यय की गुणवत्ता में सुधार किया है लेकिन इस गति को बरकरार रखना एक चुनौती होगी। राज्यों ने चालू वर्ष में पूंजीगत व्यय में अच्छी खासी वृद्धि होने का अनुमान जताया है लेकिन आंकड़े बताते हैं कि वास्तविक व्यय कम रहा है। बीते कुछ वर्षों से यह देखा गया है कि करीब एक चौथाई पूंजीगत व्यय वित्त वर्ष के अंतिम महीने में होता है। इस रवैये का असर हमारे व्यय की किफायत पर भी पड़ता है।

राज्य अगर अधिक ढांचागत रुख अपनाएं तो अच्छा होगा। व्यय के स्तर और क्षमता के अलावा राज्यों को राजस्व के मोर्चे पर भी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। सांकेतिक जीडीपी वृद्धि अगले वर्ष थोड़ा कम हो सकती है क्योंकि मुद्रास्फीति तथा वास्तविक वृद्धि में कमी आएगी। इसका असर कर संग्रह पर भी पड़ेगा।

कुछ राज्यों को राजस्व के दबाव का सामना भी करना पड़ सकता है क्योंकि वस्तु एवं सेवा कर संग्रह में कमी की भरपाई बंद हो गई है। कई राज्य मसलन पंजाब, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली में जीएसटी क्षतिपूर्ति ने कर राजस्व में 10 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी की थी। राज्यों के लिए अल्पावधि में अन्य स्रोतों से राजस्व बढ़ाना आसान नहीं होगा। दीर्घावधि की राजकोषीय चुनौतियों की बात करें तो रिजर्व बैंक ने पुरानी पेंशन योजना की वापसी से जुड़े जोखिमों को रेखांकित करके सही किया है।

कुछ राजनीतिक दलों की राज्य सरकारें जानबूझकर चुनावी लाभ के लिए इस अहम सुधार को पलट रही हैं। भारत एक व्यस्त चुनावी समय में प्रवेश कर रहा है। ऐसे में जोखिम यह है कि कई अन्य राज्य भी उनका अनुकरण कर सकते हैं।

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First Published - January 17, 2023 | 9:39 PM IST

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