ट्रेलिंग रिटर्न खुदरा निवेशकों के लिए सबसे आम प्रदर्शन मापदंड (performance metric) होता है। लेकिन निवेशकों को समय-समय पर रिटर्न की ‘पीरियॉडिक टेबल’ भी देखनी चाहिए, जो यह दिखाती है कि लंबे समय में (जैसे कि पिछले 10 वर्षों) हर कैलेंडर वर्ष में अलग-अलग एसेट क्लास ने कैसा प्रदर्शन किया। ऐसा करने से निवेशकों को यह समझने में मदद मिलती है कि एसेट एलोकेशन में डायवर्सिफिकेशन रखना, उस पर टिके रहना और समय-समय पर पोर्टफोलियो को री-बैलेंस करना क्यों जरूरी है।
पीरियॉडिक टेबल यह बताती है कि एसेट क्लासेज की लीडरशिप समय के साथ बदलती रहती है।
…और इसी तरह हर साल अलग-अलग एसेट क्लास आगे निकलता रहा।
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मोतीलाल ओसवाल एएमसी में पैसिव बिजनेस के हेड प्रतीक ओसवाल कहते हैं, “लीडरशिप में लगातार होने वाला यह फेरबदल साफ तौर पर इस धारणा को चुनौती देता है कि कोई भी एसेट हमेशा जीतने वाला रह सकता है।”
रिटर्न अलग-अलग आर्थिक दौर (Regime) पर निर्भर करते हैं। द वेल्थ कंपनी म्युचुअल फंड की इक्विटी की चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर अपर्णा शंकर कहती हैं, “किसी भी एसेट क्लास की स्थायी लीडरशिप नहीं होती, क्योंकि बाजार चक्रीय (cyclical) होते हैं। वे ब्याज दरों, जीडीपी ग्रोथ, महंगाई जैसे बदलते मैक्रो-आर्थिक कारकों और वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं पर प्रतिक्रिया करते हैं।”
किसी एसेट का लंबी अवधि का पॉइंट-टू-पॉइंट रिटर्न भले ही मजबूत दिखे, लेकिन उसके बीच लंबे समय तक कमजोर प्रदर्शन के दौर छिपे हो सकते हैं। पीरियॉडिक टेबल यह दिखाती है कि अलग-अलग एसेट क्लास के शॉर्ट-टर्म रिटर्न असमान, उतार-चढ़ाव वाले और अप्रत्याशित होते हैं।
यह टेबल मीन रिवर्जन (Mean Reversion) को भी दर्शाती है यानी जो एसेट हाल के समय में बेहतर प्रदर्शन करता है, वह आगे चलकर कमजोर भी पड़ सकता है। और जो कमजोर रहा है, वह आगे बेहतर कर सकता है।
| वर्ष | निफ्टी 50 | निफ्टी 50 मिडकैप | निफ्टी स्मॉलकैप 250 | सोना | चांदी | S&P 500 | 10-वर्षीय G-Sec |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| 2016 | 3.01% | 5.41% | 1.08% | 8.14% | 15.02% | 9.54% | 6.52% |
| 2017 | 28.65% | 54.34% | 57.28% | 13.53% | 6.34% | 19.42% | 7.33% |
| 2018 | 3.15% | -13.33% | -26.80% | -1.56% | -8.52% | -6.24% | 7.37% |
| 2019 | 12.02% | -0.28% | -8.27% | 18.31% | 15.21% | 28.88% | 6.56% |
| 2020 | 14.90% | 24.38% | 25.09% | 25.12% | 47.89% | 16.26% | 5.87% |
| 2021 | 24.12% | 46.81% | 61.94% | -3.64% | -11.72% | 26.89% | 6.45% |
| 2022 | 4.33% | 2.96% | 3.65% | -0.28% | 2.77% | -19.44% | 7.33% |
| 2023 | 20.03% | 43.68% | 48.10% | 13.10% | -0.66% | 24.23% | 7.17% |
| 2024 | 8.80% | 23.80% | 26.43% | 27.22% | 21.46% | 23.31% | 6.76% |
| 2025 | 10.51% | 5.37% | -6.01% | 64.58% | 147.95% | 16.39% | 6.59% |
स्रोत: Bloomberg | संकलन: बिज़नेस स्टैंडर्ड रिसर्च ब्यूरो
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एक लंबी अवधि के पोर्टफोलियो में अलग-अलग एसेट क्लास का मिक्स होना चाहिए। ओसवाल कहते हैं, “ग्रोथ के लिए इक्विटी (सभी मार्केट कैप में), स्थिरता और लिक्विडिटी के लिए डेट, मैक्रो और करेंसी रिस्क से बचाव के लिए गोल्ड और भौगोलिक व आर्थिक डायवर्सिफिकेशन के लिए ग्लोबल एसेट्स को शामिल करना चाहिए।” निवेशक इसमें रियल एस्टेट इनवेस्टमेंट ट्रस्ट (REITs) को भी जोड़ सकते हैं।
निवेशकों को डेट इंस्ट्रूमेंट्स को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, भले ही अधिकांश वर्षों में उनके रिटर्न सिंगल डिजिट में रहते हों। इंडियाबॉन्ड्स डॉट कॉम के को-फाउंडर विशाल गोयनका कहते हैं, “जब शेयर बाजार में गिरावट आती है, तब डेट इंस्ट्रूमेंट आमतौर पर पोर्टफोलियो को स्थिर रखने और पूंजी की रक्षा करने का काम करते हैं। हाई क्वालिटी वाले डेट में तेज बाजार गिरावट के दौरान प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत कम होती है।”
ग्लोबल मार्केट में निवेश उन वर्षों में पोर्टफोलियो को सहारा दे सकता है, जब भारतीय बाजार कमजोर प्रदर्शन करता है। सैंक्टम वेल्थ के इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट के हेड अलेख यादव कहते हैं, “2019 में, जब भारतीय शेयर बाजार संघर्ष कर रहा था, तब अमेरिका के S&P 500 ने करीब 29 फीसदी का रिटर्न दिया था।”
इक्विटी पोर्टफोलियो के भीतर 15 से 20 फीसदी का आवंटन विदेशी शेयरों में पर्याप्त माना जा सकता है। हालिया प्रदर्शन के आधार पर जरूरत से ज्यादा निवेश करने से बचना चाहिए। आनंद राठी वेल्थ के ज्वाइंट सीईओ फिरोज अजीज कहते हैं, “अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूत ग्रोथ और टेक्नोलॉजी आधारित तेजी के कारण हालिया प्रदर्शन को जरूरत से ज्यादा महत्व देने की प्रवृत्ति (recency bias) साफ दिखाई देती है।”
हालिया मजबूत प्रदर्शन के कारण गोल्ड और सिल्वर फंड्स तथा एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETFs) के एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) में तेज बढ़ोतरी हुई है।
यादव कहते हैं, “2024–25 में महंगाई और टैरिफ से जुड़े जोखिमों के कारण बनी अनिश्चितता ने सोने और चांदी को सहारा दिया। इसी तरह 2020 में कोविड से पैदा हुई उथल-पुथल के दौरान कीमती धातुओं ने बेहतर प्रदर्शन किया था, जबकि 2021 में अनिश्चितता कम होने पर इक्विटी बाजार में तेजी आई और निवेशकों ने सोने-चांदी में मुनाफावसूली की।”
हालांकि, अजीज चेतावनी देते हैं कि कमोडिटीज मांग-आपूर्ति पर आधारित होती हैं, बेहद उतार-चढ़ाव वाली होती हैं और लंबे समय में उनका अनुमान लगाना मुश्किल होता है। अधिकांश निवेशकों के लिए करीब 10 फीसदी सोने में और 5 फीसदी चांदी में निवेश पर्याप्त माना जाता है।
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कई नए निवेशक बाजार का सही समय पकड़ने (market timing) या हालिया प्रदर्शन के पीछे भागने की कोशिश करते हैं। वे उस एसेट क्लास में निवेश कर देते हैं जिसने हाल ही में अच्छा रिटर्न दिया हो, इस उम्मीद में कि ट्रेंड पर सवार होकर चक्र पलटने से पहले बाहर निकल जाएंगे। पीरियॉडिक टेबल बताती है कि यह रणनीति क्यों असफल हो जाती है।
सेबी में रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार और SahajMoney.com के फाउंडर अभिषेक कुमार कहते हैं, “रिटर्न की पीरियॉडिक टेबल ‘मीन रिवर्जन’ को साफ तौर पर दिखाती है यानी जो एसेट एक साल सबसे अच्छा प्रदर्शन करता है, वह अगले साल अक्सर सबसे खराब प्रदर्शन करने वालों में शामिल हो जाता है। यह ऐसा पैटर्न है, जिसका पहले से अनुमान लगाना लगभग असंभव है।”
हाल में बेहतर प्रदर्शन करने वाले एसेट्स में जरूरत से ज्यादा निवेश करने के अलावा, रिकेंसी बायस निवेशकों को हाल में कमजोर प्रदर्शन करने वाले एसेट्स से बाहर निकलने के लिए भी मजबूर कर देता है। हाल के महीनों में स्मॉल कैप फंड्स से निवेशकों का निकलना इसका एक आम उदाहरण है। रिटर्न की पीरियॉडिक टेबल, जो यह दिखाती है कि अच्छा और खराब दोनों तरह का प्रदर्शन अस्थायी होता है, निवेशकों को इस ट्रेंड से बचने में मदद करती है।
यह निवेशकों को सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) बंद करने की गलती से भी बचाती है। अजीज कहते हैं, “यही वे दौर होते हैं, जब SIP रुपी कॉस्ट एवरेजिंग (rupee-cost averaging) के जरिए सबसे अच्छा काम करती हैं। इन्हें रोक देना लंबी अवधि के कंपाउंडिंग को नुकसान पहुंचाता है।”
यह टेबल भीड़ का हिस्सा बनने वाली मानसिकता (herd behaviour) के खिलाफ भी काम करती है, जो निवेशकों को लोकप्रिय और तेजी से चढ़ रहे एसेट्स में धकेल देती है। शंकर कहती हैं, “जब तक कोई एसेट बहुत लोकप्रिय बनता है, तब तक उसका सबसे बढ़िया प्रदर्शन अक्सर पीछे छूट चुका होता है।”
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पीरियॉडिक टेबल एक साफ संदेश देती है कि निवेशकों को डायवर्सिफाइड मल्टी-एसेट पोर्टफोलियो बनाना चाहिए। कुमार कहते हैं, “डायवर्सिफिकेशन पीरियॉडिक टेबल में दिखने वाले उतार-चढ़ाव को एक ज्यादा स्थिर रिटर्न स्ट्रीम में बदल सकता है। यह निवेशकों को हर साल के कुछ बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले एसेट्स से फायदा दिलाता है और किसी एक कमजोर एसेट में जरूरत से ज्यादा फंसने से बचाता है।”
डायवर्सिफिकेशन रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न को भी बेहतर बनाता है। ओसवाल कहते हैं, “डायवर्सिफिकेशन रिटर्न पर बोझ नहीं है, बल्कि यह जोखिम को संभालने का एक जरिया है। भारतीय निवेशक अक्सर तेजी के दौर में इक्विटी में जरूरत से ज्यादा निवेश कर लेते हैं और डेट व गोल्ड जैसे डाइवर्सिफायर को कम तवज्जो देते हैं, जिसका उन्हें गिरावट के समय पछतावा होता है।”
एसेट एलोकेशन पर टिके रहना भी बेहद जरूरी है। यादव कहते हैं, “तय की गई सीमा के भीतर ही आवंटन में मामूली बदलाव करने चाहिए।”
अंत में, नियमित रूप से री-बैलेंसिंग करना बेहद जरूरी है। बाजार की चाल समय के साथ पोर्टफोलियो का संतुलन बिगाड़ देती है। उदाहरण के तौर पर, 80:20 का इक्विटी-डेट पोर्टफोलियो अगर इक्विटी में तेजी आ जाए तो 84:16 तक खिसक सकता है, जिससे वह अपने मूल उद्देश्य से दूर हो जाता है। अजीज कहते हैं, “नियमित समीक्षा और री-बैलेंसिंग इस असंतुलन को ठीक करती है और पोर्टफोलियो को उसकी तय की गई संरचना में वापस लाती है।” वे सालाना या हर छह महीने में एक बार पोर्टफोलियो रिव्यू करने की सलाह देते हैं।