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Modi 3.0: पीएम मोदी के अगले कार्यकाल में खेती में सुधार की उम्मीद, नियम- कानून को लेकर खाका तैयार

उर्वरकों की सब्सिडी पर समुचित ढंग से निगरानी होगी। सब्सिडी के अनुचित इस्तेमाल की खामियों और कमियों को दूर किया जाएगा।

Last Updated- April 17, 2024 | 10:39 PM IST
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कृषि अधिनियम वापस लिए जाने के बाद सरकार संभवत: कृषि क्षेत्र की लागत की निगरानी के क्षेत्र में सुधार करेगी। इसमें मुख्य तौर पर बीज, रसायन और संयंत्र उर्वरक क्षेत्रों से जुड़े विनियमन और कानून (regulations and rules) होंगे। सूत्रों के मुताबिक इसका खाका तैयार हो गया है। इस खाके का ध्येय भारत के किसानों की जीवन को आसान बनाने के लिए गुणवत्ता से समझौता किए बिना त्वरित मंजूरियां देना है। यह मोदी के 3.0 (तीसरे कार्यकाल) के 100 दिन के एजेंडे का हिस्सा हो सकती है।

उर्वरकों की सब्सिडी पर समुचित ढंग से निगरानी होगी। सब्सिडी के अनुचित इस्तेमाल की खामियों और कमियों को दूर किया जाएगा। इस क्रम में उर्वरकों के मामलों में नीम लेपित यूरिया की सफलता पर विचार किया जाएगा।

कुछ साल पहले यह विचार पेश किया गया था कि देश के चुनिंदा जिलों में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के बेहतर वर्जन लाया जाए। इस क्रम में जमीन का मालिकाना हक रखने वालों और पोषक तत्त्वों की खपत में कुछ संबंध स्थापित किया गया था। अभी प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) के तहत पाइंट ऑफ सेल (पीओएस) डिवाइस से उर्वरक खरीदने वाले किसानों को आधार प्रमाणन की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इससे उर्वरक की बोरी खरीदने वाले व्यक्ति की पहचान सुनिश्चित हो पाती है।

हालांकि किसानों के कितने भी बोरी उर्वरक खरीदने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। इससे उर्वरक के बेजा इस्तेमाल और अनुचित प्रयोग की आशंका रहती है। सूत्रों के मुताबिक बीज और संयंत्र की खाद के मामले में देश में विनियमन और मंजूरी प्रक्रिया को कई स्तरों से लेने के कारण अधिक समय लगता है और इसलिए इस क्षेत्र में कई सुधार तत्काल किए जाने की जरूरत है।

सूत्रों के मुताबिक सरकार एग्रोकेमिकल क्षेत्र के लिए अनुकूल नीति का वातावरण बना सकती है। इस क्रम में एग्रोकेमिकल्स निर्यात को बढ़ावा दिया जाएगा। विदेशी निवेश के लिए भारत को आकर्षक स्थान बनाया जाएगा। इस उद्योग में कार्यरत छोटे व क्षेत्रीय कंपनियों के हितों की रक्षा होगी।

अभी भारत में नई एग्रोकेमिकल्स मोलेक्यूल के पंजीकरण की हालिया प्रक्रिया में आमतौर पर अधिक समय लेती है। यह महंगी और जटिल भी है। लिहाजा चुनिंदा बहुराष्ट्रीय कंपनियां और नामचीन घरेलू कंपनियां ही नए मोलेक्यूल को विकसित करने के लिए शोध व विकास कर सकती हैं और वे इसके निर्माण व बिक्री के लिए पंजीकरण हासिल कर सकती हैं।

इस जटिल प्रक्रिया के कारण भारत में केवल 280 मोलेक्यूल और 800 फॉर्मूले (कांबिनेशन सहित) ही पंजीकृत हैं। भारत की तुलना में यूरोपियन यूनियन में यह संख्या दोगुनी है जबकि जापान में तीन गुनी है।

उद्योग यह चाहता है कि केंद्रीय कीटनाशक प्रयोगशाला (सीआईएल) और नए आवेदनों की मंजूरी के समय और लंबित सूची को कम करने के मामले में सुधार किए जाएं। भारत के कृषि निर्यातकों को कीटनाशकों के अधिशेष से जुड़े मामलों में प्रमुख तौर पर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जैसे इस मामले में ईयू के नियम।

इस उद्योग से लंबे समय से जुड़े व्यक्ति ने बताया, ‘अधिकतम अवशेष सीमा (एमआरएल) के मानदंडों का पालन करने के लिए प्रमुख आयातकों द्वारा सुरक्षित समझे जाने वाले मोलेक्यूल को पंजीकृत करना नीतिगत बदलाव है। इससे दीर्घावधि में कृषि निर्यात को बढ़ावा मिल सकता है।’

बीजों के मामले में नकली बीज समस्या है। नकली बीज पर निगरानी रखने के लिए समुचित निगरानी किए जाने की जरूरत है।

First Published - April 17, 2024 | 10:39 PM IST

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