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GIC RE के निजीकरण की अभी संभावना नहीं: CMD रामास्वामी नारायणन

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हर्ष कुमार के साथ बातचीत में नारायणन ने कहा कि आने वाले दिनों में कंपनी का गिफ्ट सिटी में कारोबार उल्लेखनीय रूप से बढ़ेगा।

Last Updated- April 12, 2024 | 11:08 PM IST
CMD Ramaswamy Narayanan

जनरल इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (GIC RE) के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक रामास्वामी नारायणन को उम्मीद है कि सार्वजनिक क्षेत्र की पुनर्बीमाकर्ता में 10 फीसदी हिस्सेदारी बेचने संबंधी गतिविधियां आम चुनाव के बाद ही शुरू होंगी, हालांकि इसका वक्त तय नहीं किया गया है। हर्ष कुमार के साथ बाचतीत में नारायणन ने कहा कि आने वाले दिनों में कंपनी का गिफ्ट सिटी में कारोबार उल्लेखनीय रूप से बढ़ेगा। प्रमुख अंश…

बैंकों व बीमा कंपनियों के निजीकरण पर आपका क्या रुख है?

इसमें दो मसले हैं। पहले हम सूचीबद्धता के हिसाब से देखें कि GIC RE और न्यू इंडिया एश्योरेंस के मामले में क्या होगा। यह बेहतर रहेगा, क्योंकि इससे काम करने के तरीके में बहुत अनुशासन आएगा। पहले हम एक सरकारी कंपनी थे, अब अल्पांश शेयरधारक हैं। आप उनके बारे में सोचना शुरू करें, आप यह सोचना शुरू करें कि निवेशक आपसे क्या उम्मीद कर रहे हैं। और अगर आप कारोबार करते हैं तो निश्चित रूप से अनुशासित होंगे। इसलिए मुझे लगता है कि सूचीबद्धता फायदेमंद है।

अब निजीकरण पर आते हैं, जब सरकार संभावित रूप से 100 फीसदी हिस्सेदारी बेच देगी, जैसाकि एयर इंडिया के मामले में हुआ। मैं इसे भी बेहतर पहल मानूंगा। सरकार चाहती है कि हर क्षेत्र में प्रतिनिधित्व हो। ऐसे में अगर आप बीमा कंपनी पर विचार करें तो वे एक या दो बीमा कंपनी चाहते हैं, और यही स्थिति बैंक के मामले में है और वे संभवतः दो या तीन का मालिकाना और शेष का निजीकरण चाहते हैं। यही मेरी भी राय है।

क्या आपको लगता है कि भविष्य में GIC RE का पूर्ण निजीकरण हो सकता है?

अगर सवाल यह है कि सरकार क्या हमारा निजीकरण करना चाहती है, तो मुझे नहीं लगता कि ऐसा होगा क्योंकि हम इस क्षेत्र में एकमात्र कंपनी हैं। यहां तक कि दूसरा कोई भारतीय पुनर्बीमाकर्ता नहीं है। अगले 2 दशक में बीमा कारोबार दो अंकों की वृद्धि दर दर्ज करने को है। अगर ऐसा होता है तो आपको मजबूत पुनर्बीमा की जरूरत होगी, जिससे इस बाजार का कारोबार हो सके और यह सुनिश्चित हो सके कि बीमा कंपनियों के पास पर्याप्त क्षमता है।

मुझे नहीं लगता कि वे इस अवस्था में GIC RE का निजीकरण करना चाहते हैं। बाद की स्थिति में वे हिस्सेदारी (सरकार की) घटा सकते हैं। लेकिन मुझे नहीं लगता है कि निकट भविष्य में ऐसा कुछ होने जा रहा है, दरअसल वे हिस्सेदारी घटाकर 51 प्रतिशत से नीचे किसी स्तर पर लाएंगे।

GIC RE के रोड शो से आपको क्या प्रतिक्रिया मिली?10 फीसदी हिस्सेदारी बेचने का काम कब तक हो सकता है?

प्रतिक्रिया बहुत उत्साहजनक थी। हम कभी सौदे के लिए रोड शो नहीं चाहते थे, यह गैर सौदा वाला रोड शो था। हम बड़े निवेशकों व विश्लेषकों से मिले। दीपम के अधिकारी हमारे साथ थे, साथ ही GIC RE के हमारे सहयोगी भी इस दौरान रहे।

कब तक 10 फीसदी हिस्सेदारी बिकेगी, यह अभी पता नहीं है। अभी चुनाव की तिथियां घोषित हो गई हैं। ऐसे में चुनाव खत्म होने के पहले कुछ नहीं होने जा रहा है। मुझे लगता है कि चुनाव के बाद गतिविधियां शुरू होंगी। हमसे ज्यादा सरकार को इस पर फैसला करना है।

वित्त वर्ष 2025 में GIC RE किस बाजार पर ध्यान केंद्रित कर रही है?

वित्त वर्ष 2025 में ज्यादा ध्यान भारत के बाजार पर होगा। जब आप पुनर्बीमा के कारोबार को देखते हैं तो यह बड़े पैमाने पर होता है। उदाहरण के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार के बड़े हिस्से में समझौतों का नवीकरण 1 जनवरी को होता है और 1 जनवरी 2024 बीत चुका है। हमने लगभग उतना ही बिजनेस किया, जितना पिछले साल किया था।

हमने इसमें बढ़ोतरी नहीं की क्योंकि हम अंतरराष्ट्रीय बाजार में ज्यादा कारोबार के पहले क्रेडिट रेटिंग में सुधार चाहते थे। लेकिन घरेलू मोर्चे पर हमने उल्लेखनीय रूप से शानदार काम किया है। हमने यह समझने की कोशिश की है कि भारतीय बाजार किस क्षेत्र में सहयोग चाह रहा है और वे किस क्षेत्र में समर्थन चाहते हैं। हमने इसी के मुताबिक समर्थन किया। इस तरह से अगर आप हमारा कारोबार देखें तो 30 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय और 70 प्रतिशत घरेलू कारोबार है।

गिफ्ट सिटी में कामकाज कैसा चल रहा है?

गिफ्ट सिटी में हम थोड़ा कारोबार कर रहे हैं। शुरुआत में हमने वहां से मध्य यूरोप का कुछ कारोबार किया। अब हमारा पश्चिम एशिया का कारोबार उस शाखा में डाल दिया गया है। हमारी दुबई में शाखा थी। आगे चलकर यह कारोबार गिफ्ट सिटी से बाहर होगा। गिफ्ट सिटी से हम जितना कारोबार करेंगे, कारोबार में बढ़ोतरी होगी। हमने वहां एक बड़ी यूनिट ली है।

भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीआई) सीमा पार पुनर्बीमाकर्ताओं (सीबीआर) के साथ पुनर्बीमा लेनदेन के लिए कोलेटरल पेश करने की योजना बना रहा है। भारत के बीमा बाजार को इसका क्या लाभ होगा?

भारत में इस समय पुनर्बीमा की तीन श्रेणियां हैं, भारतीय पुनर्बीमाकर्ता, विदेशी पुनर्बीमाकर्ता शाखाएं और सीमा पार पुनर्बीमाकर्ता। तीसरी श्रेणी उन पुनर्बीमाकर्ताओं की है, जिनकी भारत के बाजार में कोई मौजूदगी नहीं है, लेकिन वे भारत के बाजार में कारोबार कर रहे हैं। आज कोई पुनर्बीमाकर्ता अगर विश्व में कहीं भी है, वह किसी भी बीमा कंपनी के साथ कारोबार कर सकता है, केवल उनके पास आईआरडीAI का फाइल रेफरेंस नंबर (एफआरएन) होना चाहिए।

आईआरडीAI अब पुनर्बीमाकर्ताओं से ज्यादा प्रतिबद्धता, ज्यादा जुड़ाव चाहता है। साथ ही इस बात की भी चिंता है कि अगर पुनर्बीमाकर्ता दावे का भुगतान करने से इनकार कर देता है तो आईआरडीAI किस तरह की सुरक्षा व्यवस्था इसके लिए कर सकता है, जिससे भुगतान सुनिश्चित हो सके। कोलेटरल की व्यवस्था करने के पीछे यह अवधारणा है।

जो भी कारोबारी भारत के साथ कारोबार करेगा, उसे किसी तरह का कोलेटरल मुहैया कराना होगा। पुनर्बीमा के बाजार में यह कोई नई चीज नहीं है। अभी तमाम बाजारों में कोलेटरल की व्यवस्था है। जैसे जब GIC RE अमेरिका में कारोबार करती है तो हम कोलेटरल देते हैं, क्योंकि उस देश में हमारी मौजूदगी नहीं है। मुझे लगता है, आईआरडीAI इसे 2025 से बाजार में लाना चाहता है।

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First Published - April 12, 2024 | 11:07 PM IST

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