भारत के टेक्सटाइल और कपड़ों के एक्सपोर्ट में अमेरिका के लिए अगले वित्त वर्ष 2026-27 में तेज उछाल आने की उम्मीद जताई जा रही है। इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि भारत और अमेरिका के बीच हुए इंटरिम ट्रेड डील फ्रेमवर्क से ये बढ़ोतरी दहाई अंकों में हो सकती है।
पिछले दो सालों में अमेरिका के 80 अरब डॉलर वाले अपैरल इम्पोर्ट बाजार में भारत की हिस्सेदारी 5 फीसदी से बढ़कर लगभग 7 फीसदी तक पहुंच गई थी। नवंबर में ये थोड़ा कम होकर 5 फीसदी से नीचे चली गई, लेकिन एक्सपर्ट्स इसे सिर्फ अस्थायी दिक्कत बताते हैं, कोई गहरी समस्या नहीं।
इंडियन टेक्सप्रेन्योर्स फेडरेशन के कन्वीनर प्रभु धामोदरन ने कहा कि नई ट्रेड व्यवस्था से भारत को बाकी देशों पर बढ़त मिल गई है। इसलिए इंडस्ट्री को भरोसा है कि मार्केट शेयर जल्द ही 6-7 फीसदी पर लौट आएगा। साथ ही आने वाले वित्त वर्ष में एक्सपोर्ट में दोहरे अंकों की ग्रोथ देखने को मिलेगी।
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इंडस्ट्री में एक सामान्य गणना है कि अमेरिकी बाजार में 1 फीसदी हिस्सेदारी करीब 7,000 करोड़ रुपये के एक्सपोर्ट के बराबर होती है। FY27 की शुरुआत से अपैरल और होम टेक्सटाइल के एक्सपोर्ट में हर महीने दहाई अंकों की बढ़ोतरी हो सकती है। इससे मासिक अपैरल एक्सपोर्ट का स्तर मौजूदा 1.27 अरब डॉलर से बढ़कर 1.5 से 1.6 अरब डॉलर तक जा सकता है।
FY25 में भारत ने अमेरिका को टेक्सटाइल और अपैरल प्रोडक्ट्स करीब 11 अरब डॉलर के भेजे, जो इस कैटेगरी के कुल एक्सपोर्ट का लगभग 28 फीसदी था। ये ट्रेड डील 2030 तक टेक्सटाइल और अपैरल सेक्टर के 100 अरब डॉलर एक्सपोर्ट के लक्ष्य में भी अहम भूमिका निभा सकती है। FY25 में ये आंकड़ा 37.7 अरब डॉलर रहा था।
अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन ए. सक्थिवेल ने बताया कि ये सेक्टर देश में सबसे ज्यादा नौकरियां देता है। ट्रेड डील से मौजूदा रोजगार सुरक्षित रहेंगे और नए जॉब्स पैदा होंगे, खासकर महिलाओं और लेबर-इंटेंसिव कामों में। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा अपैरल मार्केट है। बेहतर ट्रेड शर्तों से भारतीय कपड़ों की प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, वैल्यू चेन में नई पूंजी आएगी और भारत ग्लोबल सोर्सिंग का मजबूत केंद्र बनेगा।
गौरतलब है कि 27 अगस्त 2025 से शुरू हुए 50 फीसदी अमेरिकी टैरिफ ने भारतीय कंपनियों को भारी नुकसान पहुंचाया था। तिरुपुर जैसे निटवियर केंद्र में 2025 में अनुमानित 15,000 करोड़ रुपये का घाटा हुआ। इससे सेक्टर में काम करने वाले लाखों लोगों की नौकरियां खतरे में पड़ गई थीं।