प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
मौद्रिक नीति समिति बैठक के फैसलों की घोषणा के बाद सरकारी बॉन्ड की यील्ड में तेजी आई। इसकी वजह नकदी के लिए किसी अतिरिक्त उपाय की घोषणा नहीं होना और साप्ताहिक नीलामी में लंबी अवधि की प्रतिभूतियों का उम्मीद से अधिक कट-ऑफ होना था। इसके अलावा स्थिर वृद्धि और महंगाई दर उम्मीद के मुताबिक स्थिर रहने से नीतिगत दर में कटौती का चक्र अब करीब-करीब समाप्त होने की ओर है। इस वजह से यील्ड और बढ़ी है। शुक्रवार को 10 साल के बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड पर यील्ड 9 आधार अंक बढ़कर 6.74 प्रतिशत पर बंद हुई।
एक प्राइमरी डीलरशिप के डीलर ने कहा, ‘बाजार में एक वर्ग ओएमओ घोषणा की उम्मीद कर रहा था और स्थिर वृद्धि और महंगाई दर में तेजी की संभावना जता रहा था। लेकिन अब दर में कटौती चक्र समाप्त होता दिख रहा है। इस कारण लंबी अवधि की प्रतिभूतियों पर कट-ऑफ अधिक रहा।’ उन्होंने कहा, ‘6.75 प्रतिशत (10 साल के बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड पर यील्ड) पर कुछ खरीदारी हो सकती है।’
2065 की प्रतिभूतियों कट-ऑफ यील्ड 6.49 प्रतिशत तय की गई थी, जबकि बाजार को 6.47 प्रतिशत की उम्मीद थी। आगामी वित्त वर्ष के लिए सकल उधारी योजना उम्मीद से ज्यादा होने के कारण सरकारी बॉन्ड की यील्ड अधिक बनी हुई है।
मौद्रिक नीति के बाद संवाददाता सम्मेलन में डिप्टी गवर्नर टी रवि शंकर ने बढ़ी हुई उधारी पर कहा कि आगामी वित्त वर्ष में उच्च सकल आपूर्ति के प्रबंधन के लिए रिजर्व बैंक ने 2.5 लाख करोड़़ रुपये की स्विच ऑक्शन की योजना बनाई है।
उन्होंने कहा कि रिजर्व बैंक बाई बैक ऑक्शन भी आयोजित करेगा, हालांकि अभी इसकी राशि तय नहीं की गई है। रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक गुरुवार को बैंकिंग व्यवस्था में शुद्ध नकदी 2.11 लाख करोड़ रुपये अधिशेष थी। इसकी वजह से ओवरनाइट भारित औसत कॉल दर 5.06 प्रतिशत और ट्राई-पार्टी रीपो रेट शुक्रवार को 4.33 प्रतिशत रही। आपूर्ति के दबाव के कारण रिजर्व बैंक द्वारा नकदी डाले जाने के बावजूद सरकार की बॉन्ड यील्ड में मजबूती बनी हुई है, वहीं 2026 में अब तक ओवरनाइट भारित औसत कॉल दर और टीआरईपी दर क्रमशः 50 आधार अंक और 28 आधार अंक घटी है।
रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने संवाददाता सम्मेलन के दौरान कहा कि अर्थव्यवस्था की उत्पादक जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त और उचित नकदी सुनिश्चित करना रिजर्व बैंक का दायित्व है।
उन्होंने कहा कि सभी सेगमेंट में मौद्रिक नीति के असर को सुनिश्चित करना मकसद है, न कि सिर्फ ओवरनाइट और मनी मार्केट में। सरकारी प्रतिभूतियों, कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट और बड़े क्रेडिट मार्केट में भी इसका असर नजर आना चाहिए। इसलिए नकदी से जुड़ी सभी कार्रवाई इन्हीं प्रमुख बातों को ध्यान में रखकर की जाती है।
इस बीच रिजर्व बैंक की स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (एसडीएफ) में बैंक ज्यादा फंड रख रहे हैं। ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि गुरुवार को बैंकों ने एसडीएफ में 3.57 लाख करोड़ रुपये रखे हैं।