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2047 का सपना और बॉन्ड मार्केट की हकीकत: विकसित भारत के लिए उधारी की लागत घटाना है बड़ी चुनौती

आर्थिक समीक्षा में इस बात पर जोर दिया गया है कि बेहतर ढंग से विकसित कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार देश की वित्तीय प्रणाली और साल 2047 तक विकसित भारत बनने की राह के लिए अहम है

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सुब्रत पांडा   
Last Updated- January 29, 2026 | 10:44 PM IST

आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि अपेक्षाकृत हल्के कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार, संस्थागत निवेशकों के सीमित निवेश, सॉवरिन जोखिम के प्रीमियम और पूंजी प्रवाह पर नियामकीय प्रतिबंधों के कारण देश में पूंजी की अधिक लागत निजी निवेश और दीर्घकालिक विकास में बाधा है। 

समीक्षा में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि बेहतर ढंग से विकसित कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार देश की वित्तीय प्रणाली और साल 2047 तक विकसित भारत बनने की राह के लिए अहम है, क्योंकि जीवंत बॉन्ड बाजार प्रतिस्पर्धी मूल्य निर्धारण और बेहतर तरलता के जरिये उधारी की लागत कम करने में मदद करता है।

साल 1995 से 2025 के बीच पिछले तीन दशकों के दौरान देश के भारांकित औसत की दीर्घावधि ब्याज दरें औसतन 7.61 प्रतिशत रहीं, जो कनाडा (3.13), इटली (2.94) और स्विट्जरलैंड (1.04) की औसत दीर्घावधि दरों से कहीं अधिक है।

समीक्षा में बताया गया है, ‘बेहतर ढंग से काम करने वाला डेट बाजार पूंजी की लागत कम करेगा, बचत को कुशलता से जुटाएगा और परिवारों को विश्वसनीय आय सृजन करने वाले साधन प्रदान करेगा। भारत के परिवारों ने इक्विटी को अपनाया है और उस विश्वास को डेट मार्केट तक बढ़ाना वास्तव में दमदार पोर्टफोलियो और परिपक्व वित्तीय प्रणाली बनाने के लिए अगला कदम है।’

इसमें यह भी कहा गया है कि रिटर्न प्रोफाइल, जोखिम मूल्यांकन, नियामकीय प्रोत्साहन और बाजार में नकदी की स्थिति से प्रभावित होकर संस्थागत निवेशक कॉरपोरेट बॉन्ड की तुलना में इक्विटी और सरकारी प्रतिभूतियों को ज्यादा पसंद करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार की वृद्धि और विकास बाधित हो रहा है।

समीक्षा में इस बात पर जोर दिया गया है कि देश को निरंतर विकास में वित्त उपलब्ध कराने के लिए दीर्घावधि पूंजी बाजार मजबूत करना होगा। वर्तमान में भारत का कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार हल्का और कम तरलता वाला है, जिसमें शीर्ष रेटिंग वाले इश्यू जारी करने वाले हावी हैं। इसके अलावा सिक्योरिटाइजेशन सीमित है, म्युनिसिपल बॉन्ड कम विकसित हैं तथा पेंशन और बीमा फंड नियामकीय और परंपरागत निष्क्रियता के कारण रूढ़िवादी निवेशक बने हुए हैं।

समीक्षा में इस बात पर प्रकाश डाला गया है, ‘भारत का कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार अब भी कम विकसित है, जो जीडीपी का लगभग 16 से17 प्रतिशत है, जबकि इक्विटी बाजार का पूंजीकरण जीडीपी का 130 प्रतिशत से अधिक है। यह प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं जैसे अमेरिका और चीन की तुलना में काफी कम है, जहां साल 2024 तक कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार जीडीपी का क्रमशः करीब 40 प्रतिशत और 36 प्रतिशत है।’

First Published : January 29, 2026 | 10:44 PM IST