प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
गुरुवार को संसद में पेश आर्थिक समीक्षा 2026 में भारत में दीर्घ अवधि की पूंजी जरूरतों को आसान बनाने के लिए कई उपायों का आह्वान किया गया है। इन उपायों में ऋण (डेट) योजनाओं पर कराधान को युक्तिसंगत बनाना, वित्तीय नियामकों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना और निवेशकों के बीच विश्वास बढ़ाने के लिए ऋण शोधन अक्षमता ढांचे में सुधार शामिल हैं। समीक्षा में कहा गया है कि भारतीय परिवार शेयरों में तेजी से निवेश कर रहे हैं जिसे देखते हुए उनके आत्मविश्वास को ऋण बाजारों तक ले जाना एक मजबूत पोर्टफोलियो और परिपक्व वित्तीय प्रणाली बनाने के लिए जरूरी है।
मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने समीक्षा में कहा कि भारत का कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार अभी भी अल्प विकसित है जो जीडीपी का लगभग 16-17 प्रतिशत है जबकि इक्विटी बाजार का पूंजीकरण जीडीपी का 130 प्रतिशत से अधिक है। उन्होंने कहा कि इसके विपरीत अमेरिका और चीन में कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार 2024 तक क्रमशः जीडीपी का लगभग 40 प्रतिशत और 36 प्रतिशत हैं।
समीक्षा में इस बात पर खास जिक्र किया गया है कि‘पूरे तालमेल के साथ चरणबद्ध तरीके से सुधार की जरूरत है। इनमें नियामकों में जिम्मेदारियों को स्पष्ट करने वाले संयुक्त परिपत्रों के माध्यम से विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय सुव्यवस्थित करना और जारीकर्ताओं के लिए सिंगल-विंडो कॉन्टैक्ट सिस्टम स्थापित करना शामिल है।’
निवेशकों का आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए समीक्षा में वसूली प्रक्रिया तेज करने के लिए इंसॉल्वेंसी फ्रेमवर्क की प्रभावशीलता में सुधार करने के साथ-साथ यूनिफाइड ट्रेडिंग फ्रेमवर्क के माध्यम से बाजार व्यवस्था में सुधार का आह्वान किया गया है।
इसमें कहा गया है कि‘दीर्घ अवधि के संरचनात्मक विकास को एकीकृत कारोबारी प्लेटफॉर्म और उच्च बाजार-निर्धारण क्षमताओं के माध्यम से बाजार ढांचे में सुधार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके अलावा बॉन्ड के लिए सरलीकृत कराधान ढांचा और पेंशन फंड एवं बीमा कंपनियों के लिए मध्यम-रेटिंग प्राप्त प्रतिभूतियों में निवेश करने के लिए नियामकीय लचीलापन सहित लक्षित प्रोत्साहनों के माध्यम से निवेशकों की संख्या में इजाफा करना चाहिए।’
म्युचुअल फंड उद्योग से ऋण योजनाओं पर कर लाभ से जुड़ी पुरानी मांग रही है जिसमें ऐसी योजनाओं के लिए दीर्घकालिक इंडेक्सेशन लाभ की व्यवस्था दोबारा बहाल करना भी शामिल है। यह व्यवस्था 2024 में पेश बजट में वापस ले ली गई थी।
एसोसिएशन ऑफ म्युचुअल फंड्स इन इंडिया (एम्फी) ने इस साल के बजट सुझावों में उन लाभों की बहाली का आह्वान किया है जिनके कारण पिछले तीन वर्षों में डेट म्युचुअल फंड में शुद्ध निवेश में तेज गिरावट आई है।
इसमें कहा गया है कि इंडेक्सेशन की बहाली से दीर्घ अवधि की फिक्स्ड-इनकम सेविंग को प्रोत्साहन मिलेगा और अन्य दीर्घकालिक परिसंपत्तियों के साथ समानता सुनिश्चित होगी। एम्फी ने कहा कि है कि घरेलू बचत कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार में निवेश में लाने में भी मदद मिलेगी।
एम्फी ने इक्विटी-लिंक्ड सेविंग्स स्कीम (ईएलएसएस) के समान एक डेट-लिंक्ड सेविंग्स स्कीम (डीएलएसएस) शुरू करने का भी आह्वान किया है जिसमें पांच साल का लॉक-इन और आयकर अधिनियम की धारा 80 सी से इतर एक अलग प्रावधान होगा।
आर्थिक समीक्षा में जिन चिंताओं का जिक्र किया गया उनमें कॉरपोरेट बॉन्ड बाजारों में कम कारोबार, शीर्ष रेटिंग प्राप्त जारीकर्ताओं का प्रभाव और सीमित प्रतिभूतिकरण गतिविधियां शामिल हैं।
सेबी और आरबीआई द्वारा किए गए उपायों को स्वीकार करते हुए समीक्षा में कहा गया है कि और अधिक तालमेल वाले कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।
समीक्षा में कहा गया है कि ‘सेबी द्वारा एफपीआई निवेश नियमों में छूट और भारत-अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ता ट्रेड द्वारा समर्थित भारत के बॉन्ड बाजार में एफपीआई निवेश के लिए परिदृश्य सकारात्मक बना हुआ है।’
नीति आयोग की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए समीक्षा में कहा गया है कि‘सेबी, आरबीआई और कंपनी मामलों के मंत्रालय के बीच जिम्मेदारियों के मिश्रण से भी समस्या बढ़ती है। खुलासा से जुड़े अधिक सख्त नियम से भी कम रेटिंग प्राप्त बॉन्ड जारीकर्ता हिचकते हैं। संस्थागत निवेशकों के लिए सख्त कानून उनके निवेश उच्च रेटिंग प्राप्त प्रतिभूतियों तक ही सीमित रखते हैं।’