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India-US Trade Deal: डीडीजीएस और सोयाबीन तेल पर शुल्क कटौती से बढ़ी घरेलू उद्योग की चिंता

भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते में DDGS और सोयाबीन तेल पर संभावित शुल्क राहत से भारतीय पशु आहार, खाद्य तेल बाजार और किसानों पर असर को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं।

Last Updated- February 07, 2026 | 12:08 PM IST
soyabean meal imports
Representative Image

भारत और अमेरिका के बीच घोषित अंतरिम व्यापार समझौते के तहत भारत ने कई कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क घटाने या समाप्त करने पर सहमति जताई है। इस सूची में ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स (DDGS), पशु आहार में इस्तेमाल होने वाला रेड सोरघम, ट्री नट्स, ताजे व प्रोसेस्ड फल, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स समेत कुछ अन्य उत्पाद शामिल हैं।

हालांकि, सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इस समझौते से पहले ही अमेरिका से भारत में कृषि आयात तेज़ी से बढ़ रहा था। कैलेंडर वर्ष 2024 में अमेरिका ने भारत को करीब 2.4 अरब डॉलर के कृषि उत्पाद निर्यात किए, जबकि इसी अवधि में भारत से अमेरिका को होने वाला कृषि निर्यात 6.2 अरब डॉलर से अधिक रहा।

प्रस्तावित शुल्क राहत में सोयाबीन तेल और DDGS को सबसे अहम माना जा रहा है, क्योंकि इनका सीधा असर खाद्य तेल बाजार और पशु आहार उद्योग पर पड़ता है। वहीं, फलों की श्रेणी में किन-किन उत्पादों को शुल्क छूट मिलेगी, इसे लेकर अभी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। खास तौर पर सेब जैसे उत्पादों को लेकर उद्योग जगत में स्पष्ट घोषणा का इंतजार किया जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शुल्क में यह ढील लागू होती है, तो घरेलू बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और कुछ उत्पादों की कीमतों पर असर दिख सकता है। आने वाले दिनों में समझौते के विस्तृत प्रावधान सामने आने के बाद इसके वास्तविक प्रभावों की तस्वीर और साफ होगी।

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भारत में सेब पर करीब 50 फीसदी आयात शुल्क लागू होने के बावजूद साल 2024 में सेब का आयात बड़े स्तर पर हुआ। सरकारी सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि इस दौरान भारत ने लगभग 5 लाख टन सेब विदेशों से मंगाए।

आंकड़ों के मुताबिक, कुल आयात में ईरान की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही, जहां से करीब 26 फीसदी यानी लगभग 1.33 लाख टन सेब आए। तुर्किये से लगभग 23 फीसदी (करीब 1.16 लाख टन) सेब का आयात हुआ, जबकि अफगानिस्तान से 8.2 फीसदी यानी लगभग 42,700 टन सेब भारत पहुंचे।

खाद्य तेलों के मोर्चे पर भी स्थिति कुछ ऐसी ही रही। बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार, सोयाबीन तेल पर कच्चे रूप में लगभग 27.5 फीसदी और रिफाइंड किस्म पर करीब 36 फीसदी आयात शुल्क लगता है। इसके बावजूद 2024-25 के खाद्य तेल वर्ष में भारत ने करीब 48 लाख टन कच्चा सोयाबीन तेल आयात किया।

इसमें अमेरिका की हिस्सेदारी सीमित रही। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका से लगभग 1.8 लाख टन सोयाबीन तेल आया, जो कुल आयात का करीब 3.7 फीसदी है। भारत की जरूरतों का बड़ा हिस्सा अर्जेंटीना, ब्राजील और रूस जैसे देशों से पूरा हुआ।

व्यापार से जुड़े जानकारों ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि अमेरिकी सोयाबीन तेल आमतौर पर अर्जेंटीना और ब्राजील के मुकाबले महंगा होता है, इसलिए भारतीय बाजार में इसकी मांग अपेक्षाकृत कम रहती है। हालांकि, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के अंतरिम ढांचे के लागू होने के बाद हालात बदल सकते हैं।

अगर इस समझौते के तहत कच्चे और रिफाइंड सोयाबीन तेल पर आयात शुल्क में कटौती होती है, तो अमेरिकी तेल की कीमतों में गिरावट आ सकती है। इससे भारतीय खरीदारों को नए विकल्प मिलेंगे और घरेलू बाजार में कीमतों पर भी कुछ राहत मिलने की संभावना जताई जा रही है।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के संदर्भ में सोयाबीन तेल से अधिक बड़ी चिंता अब ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स विद सॉल्युबल्स (DDGS) के संभावित आयात को लेकर सामने आ रही है। DDGS, एथेनॉल उत्पादन की प्रक्रिया से निकलने वाला पोषक तत्वों से भरपूर उप-उत्पाद है, जिसका उपयोग बड़े पैमाने पर पशु आहार में किया जाता है।

अमेरिकी ग्रेन्स काउंसिल के अनुसार, अमेरिका के एथेनॉल संयंत्र हर साल 15 अरब गैलन से अधिक एथेनॉल और लगभग 4.4 करोड़ मीट्रिक टन DDGS उत्पादन की क्षमता रखते हैं। अमेरिकी आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2009 में जहां DDGS का निर्यात करीब 50 लाख टन था, वहीं 2022-23 तक यह बढ़कर 1 करोड़ मीट्रिक टन से अधिक हो गया है, जो 58 देशों को भेजा गया।

इस दौरान मेक्सिको अमेरिका का सबसे बड़ा आयातक रहा, जिसने कुल DDGS निर्यात का 20 प्रतिशत से अधिक हिस्सा खरीदा। दक्षिण कोरिया दूसरे स्थान पर रहा, जबकि वियतनाम, इंडोनेशिया और कनाडा शीर्ष पांच आयातक देशों में शामिल रहे।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिकी DDGS बड़ी मात्रा में भारत पहुंचता है, तो इसका सीधा असर देश में उत्पादित DDGS की कीमतों पर पड़ेगा। भारत में अनाज आधारित एथेनॉल उत्पादन तेजी से बढ़ा है, जिसके चलते घरेलू DDGS की उपलब्धता भी काफी बढ़ चुकी है।

इतना ही नहीं, इसका असर सोयामील और सोयाबीन की कीमतों पर भी पड़ सकता है। बीते कुछ वर्षों में पशु आहार में DDGS के बढ़ते उपयोग के कारण सोयामील की मांग और कीमतों में तेज गिरावट देखी गई है। सोयाबीन की कीमतें भी लंबे समय से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से नीचे बनी हुई हैं, क्योंकि सोयाबीन प्रोसेसिंग में केवल लगभग 18 प्रतिशत तेल निकलता है, जबकि शेष हिस्सा मील के रूप में रहता है।

व्यापार समझौते के तहत जिन अन्य उत्पादों पर शुल्क में राहत की बात कही गई है, उनमें नट्स और बादाम जैसे उच्च-मूल्य वाले उत्पाद शामिल हैं, जिनका असर आम किसानों पर सीमित माना जा रहा है।

इस बीच, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हाल ही में स्पष्ट किया कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के अंतर्गत देश के प्रमुख कृषि उत्पादों को बाजार के लिए नहीं खोला गया है। उन्होंने कहा कि मोटे अनाज (मिलेट्स), मुख्य खाद्यान्न, फल और डेयरी उत्पाद इस समझौते के दायरे से बाहर रखे गए हैं।

कृषि मंत्री ने मीडिया से बातचीत में कहा, “यह समझौता पूरी तरह राष्ट्रीय हित और किसानों की चिंता को ध्यान में रखते हुए किया गया है। किसानों के हितों से किसी भी तरह का समझौता नहीं किया गया है।”

First Published - February 7, 2026 | 12:07 PM IST

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